बारिश
मन की सतह पर बहोत से ख़्यालो की भीड़ जम जाती है,
कुछ उलजी कुछ सुलजी तस्वीरे आँखो के सामने आ जाती है,
ख़्वाबो के आशियाने में तुजे ये मन ढूंढने लगता है,
कभी कभी एक भारी सांस और भारी हो जाती है,
वो तेरा जूठा चाय का कप आज भी मेे ने संभाल कर रख्खा है,
शायद फिर एक और बारिश में तुम्हारे कदमों की गती मंद हो जाये,
ओर भूले हुए तुम्हारे कदम मेरी ओर तुम्हें ले आए.
हेमांगी-
4 SEP 2021 AT 11:52