27 APR 2020 AT 16:34

अपने अंदर झाँक के देखा
बहुत कुछ बिखरा बिखरा सा पडा था,
कुछ खवाहिशे रो रही थीं,
तो कहीं अपनो की खवाहिशो पर खरे ना उतरने का दर्द सिसकियाँ ले रहा था,
तो कहीं तूटे सपनों का दामन उड रहा था,
तो कहीं ठहरा हुआ वो वक्त था जिसकी बांहों में थमा हूआ वो ऐक पल था,
कहीं मीठा दर्द था, तो कहीं गम का सैलाब,
इन सब के बिच मैं हस्तां हूआ बचपन था.
हेमांगी

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