8 FEB 2022 AT 21:43

आरज़ू थी एक.
ख्वाहिशो का सिलसिला कहां ख्त्म होता है!
एक पूरी हो या ना हो नई ख्वाहिश का जन्म होता है,
पाँवो में पड़े छाले अब नहीं दर्द देते,
जितनां दिल का सूनापन दे जाता है,
आरज़ू थी एक की डोली में बैठ कर तेरी चोखट पर आउँगी,
बैठूंगी साथ तेरे और थोड़ा शरमा कर ईतराउंगी,
पर इश़्क की नजर ही खूब लगी जो राह पर साथ चले थे,
अब वो राह छोटी गली सी लगनें लगी है,
इश़्क की दूहाई देतेदेते अब साँस फूलने लगी है,
अब हकीकत के शहर में ख्बाहिशे टूटने लगी है.
हेमांगी— % &

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