आज अरसों के बाद उनकी आवाज़ सूनी हमनें,
बाते हूई, कुछ गूफेतगू भी हूई,
बहोत कुछ कहना ,सूनना भी था,
पर शायद कुछ अलग सा था,
मन के भीतर कुछ कश्मकश थी शायद,
कुछ पुरानी यादो के किस्से थे,
कुछ अनकहे अल्फाज़ भी थे,
कुछ कहते कहते रूक से जाते थे,
शायद दिल की चद्दर तले इश़्क की मीट्टी सूख सी गई थी,
वक्त के बहते पानी में हम बहतो चले थे,
पर शायद रूह आज भी उस वक्त में ही ठहरी हूई है.
हेमांगी-
13 AUG 2021 AT 17:18