Gulshaad Khan   (Gulshaad dilse.....✍️)
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My instagram id -- gulshaad_khan

live in delhi, time pass writer.......
Joined 11 July 2019


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23 JUN AT 17:06

ज़िन्दगी का मंज़र

ना जाने क्यों ये बातें यूँ
रुख बदल जाती है
हर बार हथेली से क़िस्मत की
लकीरे फिसल जाती है
प्यास जितनी दरिया दूर उतनी
हलख सूख जाती है
आसमाँ और ज़मीं
गुलशाद कहा ढूँढू नमीं
ज़िन्दगी के मंज़र में
तपन बढ़ती जाती है
की ना जाने क्यों ये बातें यूँ
रुख बदल जाती है

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22 MAY AT 16:58

सुर लागे तो लागे सुरीला सब
ना लागे तो लागे सब धोखा
की जीवन राग अनोखा
जीलो जीवन का आनंद से हर क्षण
कब तक हावी रहेगा हम पर मन
कब तक कौन रुकेगा अधिक समय से
और भैय्या किसने किसको रोका
जीने का है अन्तिम मोका
की जीवन राग अनोखा
ये जीवन राग अनोखा

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8 MAY AT 17:41

सफर जारी है सबका

सुनता रहा सन्नाटों को बड़ी शिददत से मैं
सोया नहीं चैन से कई मुददत से मैं
कहीं शोर सुनाई देता है ख़ामोशी में भी
सफर जारी है हम सबका बेहोशी में भी
ढूँढने लम्हें सुक़ून के हर दरबदर
फिर भी बेचैन घूमूँ गुलशाद इस क़दर
जैसे समुन्दर के बीच प्यासा हूँ खड़ा
साँस अभी बाक़ी है पर बेजान हूँ पड़ा
की जी रहा हूँ दर्द में भी बड़ी दिक्कत से मैं
सोया नहीं चैन से कई मुददत से मैं

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6 MAY AT 18:28

तन्हाई ओ तन्हाई

खुशनुमां मौसम और उड़ती रूईयों के साथ
जिस्म को छूते थोड़े ठन्डे हवा के झोंके
घुल रही हो क़ुदरत मुझमे जैसे ,जैसे क़ायनात
की आवाज़ गुज़र रही हो मुझमे होंके
और तन्हाई ओ तन्हाई बेखबर मैं
ख़बर चीखते ख़ामोश सन्नाटों से ये ले आई
की गुलशाद ना जाने मैं कितना भरा हूँ,
कितना भरा हूँ फिर भी ज़रा हूँ
भागता फिर रहा बेवजह और वहीँ खड़ा हूँ
की मेरी रूह को है यक़ीन मैं हूँ ,हूँ मैं वही असीम
पर कोई शक करते मुसलसल
मेरे काफ़िर ख्यालों को रोंके
खुशनुमां मौसम और उड़ती रूईयों के साथ
जिस्म को छूते थोड़े ठन्डे हवा के झोंके

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1 MAY AT 23:52

बड़ा बेबस हुआ इन्सान ,पड़ी मुश्किल में ऐसी जान
दौर ऐसा आज आया बिकने लगी साँसे ,
हुक़ूमत के बस में नहीं रही बाँतें
रस्ते ,नज़ारे ,बज़ारे सब हुए सुनसान ,
बस आबाद हो रहे शमशान
बड़ा बेबस हुआ इन्सान , बड़ा बेबस हुआ इंसान
आए खुदा ये तेरा कैसा केहर ,
दूरियाँ बन गयी दवा ,हवाओं में घुल रहा ज़हर
और इन्सान ही लगा रहा बोली
इन्सानियत से बढ़ के दवाइयों के हर कतरे की
हर तरफ पड़ी है लाशें बेबसी का कफ़न लपेटे कचरे सी
की इन्सानियत तोड़ रही दम ,चेहरे पे नक़ाब ओहड़े खड़े हम
और सियासत चढ़ रही परवान ,बस आबाद हो रहे शमशान ,
बड़ा बेबस हुआ इन्सान , बड़ा बेबस हुआ इन्सान

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18 APR AT 2:56

ना कल का ज़िक्र
है ना कोई फ़िक्र है
सब कुछ मेरे खुदा
तुझपे डाल रखा है
दिन है तेरा शामें भी तेरी
रात को बिस्तर पे मैंने
अब सुकून ए चैन
बिछा रखा है
ये अर्ज़ी है मेरी
जो भी मर्ज़ी हो तेरी
तेरी रज़ा तेरी सज़ा
फ़र्ज़ भी तेरा तेरी क़ज़ा
हर हुक़्म तेरा क़ुबूल येही
हर एक साँस ने अपना
इमाने हाल बना रखा है
सब कुछ मेरे खुदा
तुझपे डाल रखा है

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13 APR AT 13:32

उम्मीदों की फसल

तक़दीर की सिलवटों को
गर्म इरादों से मिटाँ रहा हूँ
तेह कर के ख़्वाब सारे
फिर आँखो पे सजा रहा हूँ
मेरे उम्मीदों की फसल
देखो तान्ने लगी है सीना
शुकराना ख़ुदा का
सर सज़दे में झुका रहा हूँ
तक़दीर की सिरवटों को
गर्म इरादों से मिटाँ रहा हूँ

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24 DEC 2020 AT 16:11

अपनी तलाश है

गुनगुनाता हूँ जब भी तुझे ज़िन्दगी
रेहती ना जाने कैसी ख़राश है
ढूँढ रहा हूँ कबसे हर रुख़ खुद को
आज भी मुझे अपनी तलाश है
काई बार खुदके नज़दीक आया
झलक़ दिखी पर देख ना पाया
तसव्वुर में था कुछ कुछ और पाया
की हक़ीक़त से जुदा बना रखें मैंने
गुलशाद अपने ख़यालात हैं
ढूँढ रहा हूँ कबसे हर रुख़ खुद को
आज भी मुझे अपनी तलाश है

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29 NOV 2020 AT 14:05

है निशाँ कदमों के तेरे
आज भी देहलीज़ पे मेरे
और तुम कहते हो मुझे जानते नहीं
जो देता हूँ तुम्हें क़सम खुदा की
क्या खूब है तेरी ये अदा भी
कहते हो क़समों को हम मानते नहीं
हम तुम्हें गुलशाद जानते नहीं
फिर भी मनवा बेपरवाह होके तुझे पुकारे
हर पल रस्ता बस तेरा निहारे
मन मन्दिर में जलें दिए तेरी यादों के सहारे
और देख के नज़रे फेरते हो ऐसे जैसे हमें पहचानते नहीं
जो दूँ सदा पीछे से तो केहते हो मुझे जानते नहीं

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1 NOV 2020 AT 22:28

चुटकी भर ख़ुशी

उदासियों की अघोष में
उदास हूँ इस क़दर
ना खुशियों की है आहटें
ना ख़ुशी की कोई खबर
चुटकी भर ख़ुशी की चाह में
क्यूँ फिर रहा हूँ दरबदर
कितना हूँ अनजान मैं
गुलशाद खुदसे हूँ बेखबर
उदासियों की अघोष में
उदास हूँ किस क़दर

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