Faizan alam siddiqui   (Faizan Siddiqui فیضان صدیقی)
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Joined 1 May 2017


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Faizan alam siddiqui 3 DEC 2018 AT 23:32

There are two lives, one what they see and other what u Feel.

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Faizan alam siddiqui 3 AUG 2018 AT 1:46

कश-म-कश में कश्ती तूफ़ान से बेखबर।
लंगर जो डाले तो साहिल बेनज़र।
खामोशियों में डूबा सारा लश्कर।
मुकम्मल यकीं न हुआ हुईं दुआएं बेअसर।
भहलाया बहुत दिल सुबह की रंगीनियों से।
गुरूब आफ़ताब हुआ कब तक रहे सहर।
शुग्ल कुछ न था फिर भी मशगूल रहे।
महफ़िल भी तन्हा हुई न बाकि रहा पहर।
कसीर आरज़ू है फ़रेब ज़िन्दगी।
गर्क गुरूर हुआ जो चले कुदरत का कहर।
आदाबे ज़िंदगी है दस्तूरे ज़िंदगी बना ।
है फ़ना न बना सद्दाद केे ख्वाहिशों का शहर।

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Faizan alam siddiqui 4 MAY 2018 AT 23:09

To enjoy the water one must have to more thirsty.

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Faizan alam siddiqui 21 APR 2018 AT 17:49

सुख दुख का है ये जीवन ।
कामना ज्योति सा हो द्विपन।
स्वयं में क्यों न हो अँधियारा ।
पर करना है सब में उजियारा।

कुछ खेतों से हरे हैं।
कुछ कष्टो से भरे हैं।
कुछ कर पाना संकल्प है जीवन ।
फिर तो यह सोने से भी खरे हैं।

कितनो की है जालिम जीवन ।
और कितने मजलूम बने।
बातों से प्रेम झलकाते ।
और हाथ है सारे खून सने।

राष्ट्र का चादर ओढ़े ।
सत्य पर पर्दा डाले।
राष्ट्र के शत्रू हैं
अब राष्ट्र के रखवाले ।

कुछ पंछियों सा है जीवन ।
चाह न कोई जीवन दर्शन ।
भक्ति में डूबे।
निरोग है सारा तन मन।

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Faizan alam siddiqui 3 APR 2018 AT 22:53

क्या बताएं कुछ बताएंगे तो वो माज़ी हो जाएगा । ख्वाब लिखेंगे तो उम्मीदें हो जाएंगी । चलो अब मिलके अपनी ज़िंदगी लिखते हैं उस पार तक एक साथ एक सफ़र एक राह और एक रूह बनके।यूं तो आधी ज़िन्दगी बीत चुकी है पर चलो हर एक पल को एक ज़िन्दगी की तरह जियें। जिस तरह से एक परिंदा एक नन्ही सी जान हर रोज़ अपने दो पंखो से बुलंदियों को जीता है।
आओ इन खली अवराको को मुहब्बत से सफकत से यकीन से और उन सुकूनो से भर दे जो हमे आपसे मिलती है

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Faizan alam siddiqui 21 MAR 2018 AT 16:15

Jo muhabbat kaid hai dil k paimaane me.
Husn-o-naaz-o-ada yu milta nahi ham-nashi Jamane me.
Raaz-e-muhabbat arz-e-tamanna hai lajjat-e-visaal ki.
Ye ishq-e-Kamal ki ishq hai zindagi gawane me.


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Faizan alam siddiqui 1 JAN 2018 AT 22:25

हो ज़ईफ़ रिश्ते तो हवाएँ बिखेर देती है।
मुहब्बत खुद हर पल इम्तेहान लेती है।
कांटे तो मिलेंगे ही मंज़िल की जानिब।
काँटों से गुजर जाना इश्क़ की पहचान होती है।

सफ़र का आगाज़ बाकी है
ज़िन्दगी का इम्तेहान बाकी है।
रेत के ज़र्रो सा ये यकीं नहीं ।
चलने को जमीन छूने को आसमान बाकी है।

भला जख्म से भी कोई शहीद होता है।
ज़िंदगी जीतना है अभी तो जंग का मैदान बाकी है।
इतने भी कमजोर नहीं की संभालना भूल गए ।
वक़्त की तालीम थी वरना जिस्म में अभी जान बाकी है।

वहमें गुमान भी न था हक़ीक़त कैसे कह दे।
बेलोश मुहब्बत की अभी शान बाकी है।
ऐ दिल तू जितना भी बेरुखी कर यकीं तो बुलंदियों पे ही रहेगा ।
ऐ मुखातिब जिस्म में अभी रूह की पहचान बाकी है।

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Faizan alam siddiqui 22 OCT 2017 AT 15:32

BARISH ke qatron ki zad se SHAZAR bhi bhige SHAHAR bhi bhige
GULISTAAN-E-SAHER tere TABASSUM-E-GUL-E-SHABNAM ko salam.

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Faizan alam siddiqui 24 SEP 2017 AT 13:01

The person who gets upset may get peace sometimes, But the troublemakers are always looking for comfort.

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Faizan alam siddiqui 9 SEP 2017 AT 17:29

घन से गिरा सीप में की एक पहचान बन जाऊँ।
खोलूँ आँखें जग में उमीदों का इंसान बन जाऊँ।
सपनों का बादल तानू जज़्बों का मुस्कान बन जाऊँ।
ख्वाहिशों को कैद में डालू नफ़्स का शैतान बन जाऊँ।
दरिया की गहराई नापू मंशो को जानू।
कश्ती को मोडू और साहिल का इम्कान बन जाऊँ।
कदम से कदम बढ़ाऊ पर्वत को छू लू।
दीप से दीप जलाऊँ बिखरे मोती की शान बन जाऊँ।
मन प्रेरित कर जीवन का अभिमान बन जाऊँ।
साँझ को डूबे सूरज का अभियान बन जाऊँ।
थके कदम चलते चलते अब कंधो पे चलना है।
मिट्टी से बना मिट्टी में मिलू और मिट्टी की जान बन जाऊँ।

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