पूछता है तू धर्म मेरा ,मैं आज तुझे बतलाता हूं।
शठता का जो तूने काम किया है , तुझे शठता का अंजाम बतलाता हूं ।।
तूने पूंछकर धर्म जो बहाया है लहू , उसी लहू में नहलाकर तुझे सिंदूर की कीमत बतलाता हूं ।
तेरी फितरत है श्वान की पूंछ सी , तेरी पूंछ काटकर तुझे पुंछकट्टा बनाता हूं ।।
तूने सिंदूर उजाड़ा है मेरी मां-बहनों का , तेरे टुकड़े - टुकड़े करके देख कैसे तेरी नस्लें मिटाता हूं ।
तूने विष का बीज बोकर दुनियांभर में है ज़हर फैलाया , देखेगी अब सारी दुनियां तोड़कर विषदन्त तेरे कैसे तुझको दन्तहीन बनाता हूं ।।
तू करता है टू नेशन थ्यौरी की बात , देखेगा जमाना अब धरती से तेरा कैसे अस्तित्व मिटाता हूं।
पूछता है तू धर्म मेरा , मैं आज तुझे बतलाता हूं।। डा० राम कृष्ण मिश्र ( क़लम )
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लौ कुछ मद्धम हुई ,
श्वास कुछ घट गई ,
लो करीब और मंजिल आ गई ।
खुद से खुद के वस्ल की घड़ी ,
कुछ और पास आ गई ।।
सहेज कर पूर्ण अंकों की सम्पूर्णता ,
2025 = 2 + 0 + 2 + 5 ( 9 )
शुभ नववर्ष की घड़ी आ गई ।।
Happy New Year 2025-
ज़िन्दगी जी रहे थे अपने ही ख्वाबों -ख्यालों में ,
न जाने क्या हुआ जहनियत कुछ यूं बदल गई ,
मिलाई तो थी निगाह पल भर के लिए उस फकीर ने ,
पर असर कुछ हुआ यूं ,
तरबियत उम्र भर के लिए बदल गई ।
कुछ यूं ही बदल रहा है दस्तूर जमाने का ,
कुछ तो ऱजा शामिल है परवरदिगार की ,
यूं ही नहीं बरसती हैं रहमतें ,
यूं ही नहीं टूटती हैं सितम की बिजलियां,
कुछ तो बदल रहा है खास जमाने में ।।
जहनियत (मानसिकता), तरबियत (तालीम), ख्याल (विचार),रहमत (कृपा) ,सितम(जुल्म), दस्तूर (कायदा), परवरदिगार (परमेश्वर)-
मान जा रे मन मेरे ,
क्यूं भटकता है इधर-उधर ?
विश्राम है कहीं नहीं ,
सिर्फ माया का छल है इधर ।।
माया ने रची है मृग मरीचिका भोग की ,
पास जाओ जितना बेचैनी बढ़ाती है जोर की ।
मन जो रमा लोगे चरणों में श्री गोविन्द के ,
सजल हो नयन मुस्कुराएंगे ,
स्फुरित हो आनन्द से ,
डोलेंगे रोम-रोम तन के ।।
भूख मिटती नहीं भोग की न पिपासा कहीं ,
किसी से भी न पूरी होगी ,
मन की आशा कहीं ।
मन का तो बस एक है अन्तिम ठिकाना ,
प्रीतम में बसा लो इसको , इसमें प्रीतम बसाना ।
फिर बावरा मन तेरा हो जाएगा ,
जपेगा राधा -राधा ,
रात-दिन श्री गोविन्द गायेगा
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अमावस का है घना अंधेरा ,
दीप है प्रज्वलित हो रहा उजाला ,
घर की डेहरी पर जल रहा माटी का दियाला ।
भीतर है घुप्प अंधेरा ,
बाहर झिलमिलाता है उजाला ।
पूछता है कौन यहां सच्ची राह कोई ,
जोहता है कौन खुद से मिलन की बाट कोई ?
भटक रहा है इंसान यहां ,
पीकर मय का प्याला ।
फैल रहा है अंतस् में तिमिर चतुर्दिक ,
क्या अन्तर्चक्षु खोल सकेगा बनावटी उजाला ?
कोई प्रयत्न कर कपाट खोले तो उर का ,
अखिल कोटि ब्रह्माण्ड जगदीश्वर ,
अखिल कोटि सूर्य प्रभा आलोकित मुखमंडल,
बैठा भीतर बंशी वाला ।।-
अपनी तो राधे रानी ,
हम हैं राधे रानी के ।
सुख-दुख से क्या लेना-देना ,
जब दास हुए राधे रानी के ।।
जग के सब बन्धन झूठे ,
झूठी है सगरी ये नगरी ।
अपनी तो लगन लगी मोहन से ,
सच्ची राधा - रानी की छतरी ।।
काया झूठी , माया झूठी ,
झूठा सकल है संसार ।
भव सागर पार लगाये जो ,
सच्चा बस राधा रानी का प्यार ।।
अपनी तो निकल पड़ी ,
भस्म हुए सगरे पाप ।
राधा-राधा जपते-जपते पार हुयी ,
फंसी हुई थी नौका जो मझधार ।।
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राधा मेरी स्वामिनी ,
मिला दे मुझे श्याम ।
पुकारूं मैं राधा-राधा ,
पधारो मेरे घनश्याम ।
गोरे चरणों में नवाऊं मैं माथा ,
दर्शन दो मेरे श्यामल भगवान ।
राधा मेरी स्वामिनी ,
मिला दे मुझे श्याम ।
निहारूं मैं अधरों को मेरी स्वामिनी ,
छेड़ दे कान्हा बांसुरी की मधुर तान ।
देखूं मैं जब भी स्वरूप तेरा स्वामिनी ,
दिखे तू कभी राधा तो कभी श्याम ।
राधा मेरी स्वामिनी ,
मिला दे मुझे श्याम ।-
भीष्म हुए सत्ताधीश सभी ,
लुटती आबरु देख रहे मौन सभी ,
वक्त तुम्हारा भी आयेगा ,
इतिहास पुराना फिर दोहराया जायेगा ।
ख़ामोशी को जो तुमने ओढ़ लिया आज अभी,
अधर्म तुम्हारे हिस्से में भी लिखा जायेगा ,
चक्र उठेगा जब न्याय-धर्म की खातिर ,
भेदा फिर जिस्म तुम्हारा भी जायेगा ।।-
हे ! लाडली जू तेरी अनुकम्पा से हूं मैं अभिभूत ।
नयन द्रवित हैं मन सुख - सागर से है भरपूर ।।
विश्वास अडिग है मेरा तुम पर बड़ा ही अनूप ।
हे ! करुणा की देवी तुम्हारी कृपा-दृष्टि है मुझ पर अचूक ।।
पाप-पुण्य मिटाकर कर रही हो हर-पल जीवन-मुक्त ।
निज-धाम बुला रही हो पथ भी बना रही हो कंटक-विमुक्त ।।
अब एक ही चाहत है मेरी मिटा दो मेरा - तेरा रूप ।
मिला दो मुझको मेरे स्वरूप से हो जाऊं मैं तेरा ही रूप ।।
अपनी सेवा में स्वीकार कर लो यही जीवन का है ध्येय मूल ।
स्यामल-गौर चरणों में पड़ा रहूं बना रहूं सदा तेरे चरणों की धूल ।।
हे ! लाडली जू तेरी अनुकम्पा से हूं मैं अभिभूत ।।
नयन द्रवित हैं मन सुख - सागर से है भरपूर ।।
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मेरे प्रभु का रूप अलौकिक ,
कही न जाय सके महिमा दृष्टि वहीं बंध जात ।
सुन्दरता की छवि ऐसी मोहनी ,
मोह ले वैरागी-योगी मन स्वयं शंभू अति अकुलात ।
चरण पखारे कालिन्दी निर्मल ,
स्पर्श करत चरण-कमल चरणामृत कहलात ।
रूप सलोना श्यामल प्यारा ,
देख मेघ लज्जा से पानी - पानी हुई जात ।
मेरे प्रभु की अंखियों में है जादूगरी ,
नैन मिलत जैसे ही सगरी सुध-बुध बिसरात ।
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