Bharat Borana  
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Joined 13 December 2017


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Joined 13 December 2017
Bharat Borana 30 MAR AT 16:18

हर रात तुझे ढूंढ़ने तन्हा रास्तों पर निकल जाता हूँ मैं
हर रात तारों सा टूटकर कहीं बिखर जाता हूँ मैं

तुझ से मिलने के लिए भटकती रहती हैं नज़रें
हर रोज ये घर से निकलकर कहाँ जाता हूँ मैं

किस्सों और कहानियों सी उलझी पड़ी है ज़िन्दगी
यह कैसा एक ही किरदार हर रोज़ निभाता हूँ मैं

दिन ढलते ही उदासी घर करने लगती है मुझ पर
हर दिन शाम होते ही ये कहाँ गुम हो जाता हूँ मैं

नींद और बिस्तर से बगावत का आलम है 'भरत'
रातों को उठ-उठकर खुद से क्या बड़बड़ाता हूँ मैं

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Bharat Borana 26 MAR AT 8:45

क़ुदरत ने यूँ ही इंसानों को कैद नहीं रखा 'भरत'
ज़रूर उस पर भी सितम की कोई इंतहा हुई होगी

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Bharat Borana 24 MAR AT 15:53

तेरे याद की शामें यमुना सी है,
तेरे बातों की खुश्बू गंगा सी है,
तुम कोई घाट हो प्रयागराज के संगम सा,
या फिर कोई सरस्वती हो मुझमें छुपी हुई,
जो अक्षयवट की तरह मुझ पर,
अपनी छाव बिखेर रही हो,
आखिर तुम कौन हो ?
तुम नदियों सी हो या हवाओं सी
जो बहती है मुझमें,
छूती है मुझको।
या तुम किसी पेड़ की कोई डाल हो,
जिसकी पत्तियां मुझ पर गिरकर,
तुम्हारा आभास करा रही हो,
या तुम किसी घाट की कोई शाम हो,
और मैं तुम्हें नदी किनारे बैठकर,
देख रहा हो,
और ऐसा लग रहा हो जैसे,
त्रिवेणी का घाट हो,
जैसे तुम मेरी प्रयागराज हो।
जैसे तुम मेरी प्रयागराज हो।

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Bharat Borana 15 MAR AT 1:27

आरज़ू नहीं कि तुम मुझे, मेरी ही तरह प्यार करो,
मेरी ख्वाहिश है कि जितना भी करो, बस मुझ ही से प्यार करो।

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Bharat Borana 5 MAR AT 22:35

कविताएं, जो तुम तक पहुंच न सकी,
शब्द, जो उंगलियों में दबे रहे,
कोई बात, जो तुम को कहनी थी मगर,
वो बात, बातों में गुम सी गई।
खैर ! मगर, वो कोई बात नहीं,
ख़्वाबों का एक पुलिंदा था,
भेजा था मैंने ग़ज़लों में रखकर,
तेरे-मेरे कल का हिस्सा था।
उस हिस्से में एक किस्सा था,
जो तर्कों की राह में बह गया,
तुम प्रेम में तर्क ढूंढती रही,
मैं प्रेम में व्याकरण भूल गया।
फिर शब्दों की संधि टूट गई,
तर्कों में प्रेम उलझ गया,
सारी बातें मुझ तक ठहर गई,
और ये एक बात नई निकल गई,
कि एक आवाज़ जो तुम तक जानी थी,
तेरे रास्ते में ही बिखर गई।
एक बात जो दिल से निकली थी,
तुझे छूते-छूते निकल गई।
खैर ! मगर, वो कोई बात नहीं,
दिल की छोटी सी आशा थी,
दुनिया की बातों से परे,
मेरे प्रेम की परिभाषा थी।

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Bharat Borana 5 MAR AT 22:33

कविताएं, जो तुम तक पहुंच न सकी,
शब्द, जो उंगलियों में दबे रहे,
कोई बात, जो तुम को कहनी थी मगर,
वो बात, बातों में गुम सी गई।
खैर ! मगर, वो कोई बात नहीं,
ख़्वाबों का एक पुलिंदा था,
भेजा था मैंने ग़ज़लों में रखकर,
तेरे-मेरे कल का हिस्सा था।
उस हिस्से में एक किस्सा था,
जो तर्कों की राह में बह गया,
तुम प्रेम में तर्क ढूंढती रही,
मैं प्रेम में व्याकरण भूल गया।
फिर शब्दों की संधि टूट गई,
तर्कों में प्रेम उलझ गया,
सारी बातें मुझ तक ठहर गई,
और ये एक बात नई निकल गई,
कि एक आवाज़ जो तुम तक जानी थी,
तेरे रास्ते में ही बिखर गई।
एक बात जो दिल से निकली थी,
तुझे छूते-छूते निकल गई।
खैर ! मगर, वो कोई बात नहीं,
दिल की छोटी सी आशा थी,
दुनिया की बातों से परे,
मेरे प्रेम की परिभाषा थी।

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Bharat Borana 28 FEB AT 14:03

बेमंज़िल रास्तों पर सफ़र ज़ारी है,
खुद को समझाने की ये कैसी बीमारी है।
मुझे मालूम है मैं राह में अकेला पड़ जाऊंगा,
इसी राह पर चलते जाने की अजब खुमारी है।

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Bharat Borana 17 FEB AT 16:10

पहाड़ों से आवाज़ आ रही हो जैसे,
एक अरसे से कोई बुला रहा हो जैसे ।

आसमान को तकती रहती है यें आंखें,
एक दरिया बह के सूख गया हो जैसे ।

एक ही दर्द को बार-बार समेटता हूँ मैं,
कोई मैं ही हर बार गुनहगार हो जैसे ।

किसी को सुनने के लिए बेताब रहता हूँ,
सारे जहां में वो एक ही आवाज़ हो जैसे ।

खुद को ढूंढते-ढूंढते इतनी उम्र निकल गई,
बचपन में खुद को कहीं भूल गया हो जैसे ।

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Bharat Borana 11 JAN AT 18:36

झील है, शाम है, पहाड़ है और आबू भी है
खैर, जो तुम होते तो बात कुछ और होती।

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Bharat Borana 7 JAN AT 2:03

वक़्त की तरह खुद से निकल कर चला जाता हूँ मैं,
तुझे ढूंढते-ढूंढते अक्सर तुझ में खो जाता हूँ मैं ।

एक तुझ ही के लिए संभाल रखी है कई शिकायतें,
तुझ से मिलते ही हर एक बात भूल जाता हूँ मैं ।

एक आग लेकर चलता हूँ मैं अपने साथ ऐसी,
कोई तुझे देखें, बात करे तो भी जल जाता हूँ मैं ।

ख़्वाहिश कि तू मुझे अपने में समेट ले हमेशा के लिए,
ख़्वाब के टूटते ही कांच की तरह टूट जाता हूँ मैं ।

तेरे होने से होती है जीने की तमन्ना पूरी,
तेरे साथ जीता, तेरे बिन मर जाता हूँ मैं ।

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