Avinash Kumar   (अविनाश “कर्ण”)
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Joined 14 July 2017


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27 AUG AT 21:39

ये कैसी उदासी फ़लक में बसर है
सितारों, कहो चाँद मेरा किधर है

न जाने बेचैनी ये, क्यों हो रही है
मेरी जाँ यकीनन बड़ी बे-ख़बर है

कभी तो मिरे पास भी चाँद आये
बताये भला, दूर क्यूँ इस कदर है

जिधर से ये संगीत सा आ रहा है
पुकारा हमीं ने, तुम्हें जाँ उधर है

ये किस्सा वफ़ा का रहेगा हमेशा
कहानी हमारी, कहाँ मुख़्तसर है

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15 AUG AT 10:14

हैं राज्य अलग अलग
अलग सब लोग हैं
जाति अलग है
वर्ण अलग अलग
हैं खान-पान अलग
अलग सबके परिधान है

एक क्या है एक देश में
क्या इसकी शान है,
है सवाल कठिन बहुत
पर जवाब सरल है
है तिरंगा शान अपनी
बस एक वही पहचान है।

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21 JUL AT 12:14

ये कैसी उदासी फ़लक में बसर है
सितारों, कहो चाँद मेरा किधर है

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20 JUN AT 8:49

दीवारें बताती हैं कि
एक घर को
घर होने के लिए,
दीवारों के ऊपर
छत का होना जरूरी है

बताती है शहर की
गतिमान ज़िंदगी,
भरम है ये चमक,
सुकून के लिए
गाँव का होना जरूरी है।

( पूरी रचना अनुशीर्षक में )

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20 MAY AT 23:37

“ इंसान बनाम सरकार ”

( रचना अनुशीर्षक में पढ़ें )

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9 MAY AT 10:53

ये मकां मेरा, कभी घर भी न होगा
माँ तेरा आँचल मेरे सर जो न होगा

दूर कितना भी रहूँ तुम साथ रहना
तू रहे तो, खोने का डर तो न होगा

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8 MAY AT 23:54

हर चीज़ के
होते हैं दो पहलू,
दोनो के होते हैं
क़ायदे अलग अलग
अलग अलग महत्व,

अंधेरा हमेशा
बुरा नहीं होता,
और
न होती है
सदा रौशनी अच्छी,

लाज़िम है कि
चाँद के
दीदार को
बहुत जरूरी है
रौशनी का छट के
अंधेरा हो जाना।

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6 MAY AT 19:12

लाज़मी है चाँद को यूँ रश्क होना
चाँद के बदले, तुम्हें सब देखते हैं

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29 MAR AT 7:49

फाग के राग की है बस ये कहानी
रंग खोजे केवल, चेहरा और पानी

रंग के संग दिल भी मिलते रहें तो
पूर्ण हो प्रेम की प्यारी सी निशानी

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11 MAR AT 10:09

जहां तैयार है जिस शिव के दर्शन को
वो शंभू हैं आज आतुर गौर दर्शन को

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