Avinash Kumar   (अविनाश “कर्ण”)
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Joined 14 July 2017


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Joined 14 July 2017
Avinash Kumar 11 NOV AT 13:35

मैं जब भी रात लिखूं तुम महताब लिखना
हर इक बे-जवाब ख़त का जवाब लिखना

हर किसी ने लिखा बस चाँद का चमकना
हो सके तो तुम चाँद का अज़ाब लिखना

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Avinash Kumar 7 NOV AT 19:13

अंधेरा हो चुका है ये चाँद को बताता कौन होगा
प्रेम कितना है करना, कायदे बनाता कौन होगा

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Avinash Kumar 4 NOV AT 13:19

ख़्याल तेरा, है दिल से जाता नहीं
इश्क़ है मगर, जताया जाता नहीं

कब तलक यूँ, करता रहूँ मैं इशारे
बात अब और छुपाया जाता नहीं

सुनाई थी जो तुमने कहानी कभी
वो कहानी अब कोई सुनाता नहीं

जाने कितने गए, गली को तुम्हारे
लौट कर वापस, कोई आता नहीं

रफ़्ता-रफ़्ता चाँद निकल आएगा
किसी के बुलाने से,ये आता नहीं

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Avinash Kumar 30 OCT AT 20:11

चाँद के
ललाट पर
इक रोज़ किसी ने
बहुत ही प्रेम से
लेप दिया था
हल्का सा
चंदन
.
.
फिर चाँद ने
कभी मिटाया ही नहीं
प्रेम का वो निशां,
और ये दुनिया
उसे आज तक
समझती है
"दाग चाँद का "

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Avinash Kumar 27 OCT AT 9:17

घर गली अंगना, आज जन्नत बना रक्खा है
हर छत की मुंडेर पर, सितारा सजा रक्खा है

हर मकां ही नहीं, हर मन भी हो जाए रौशन
चिरागों से ये पूरा, जहान जगमगा रक्खा है

फिर न आ सके कुछ राम घर अपने वापिस
माँओं ने उनके ख़ातिर दिया जला रक्खा है

कुछ के खत आए हैं, कुछ की है खबर नहीं
बाकी ने अगले साल का मन बना रक्खा है

महताब से आसमां में रोज़ होता है उजाला
इस दफा हमने उसे, ज़मीं पे बुला रक्खा है

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Avinash Kumar 25 OCT AT 14:01

रात की आधी कहानी सुबह पूछते हैं
चाँद से उसके दाग की वजह पूछते हैं

मैं क्या-क्या बताऊँ और क्या छुपा लूँ
तुझसे इश्क़ करने की वजह पूछते हैं

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Avinash Kumar 20 OCT AT 15:53

दरिया के उस पार कुछ भी नहीं है
गर इश्क़ चाहिए, तो डूबना पड़ेगा

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Avinash Kumar 17 OCT AT 12:27

ख़्याल तेरा, है दिल से जाता नहीं
इश्क़ है मगर, जताया जाता नहीं

कब तलक यूँ, मैं करता रहूँ इशारे
बात अब और छुपाया जाता नहीं

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Avinash Kumar 13 OCT AT 13:50

जहाँ चाँद है अब वहीं जाना है
जो मुमकिन नहीं वही पाना है

बारहा इश्क़ में टूटते हैं सितारे
इक रोज़ मुझे भी टूट जाना है

इरादतन, दाग दिखाता है चाँद
जाने उसे किसको चिढ़ाना है

एक चाँद पे सब हक जताते हैं
वाजिब चाँद का छिप जाना है

बढ़ा दो अब रातें अमावस की
रिवाज़ इक रात का पुराना है

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Avinash Kumar 11 OCT AT 9:59

दिन-ब-दिन ये देश डूबता रहा, चौकीदार जी मूक रहे
सावन तो कब का बीत चुका, क्या अब तक फूंक रहे

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