Avinash Kumar   (अविनाश कर्ण)
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Joined 14 July 2017


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20 NOV AT 18:02

छठ जे बरस भइर के बाद अबई छै
सूरज तखैन, समय के बाद उगई छै

जाईब नै सकलियै घर जे इ बेर हम
घर, घाट अंगना सब यादि अबई छै

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19 NOV AT 19:44

मेरा तुमसे प्रेम करना
सितारों की
कभी न
खत्म होने वाली,
चाँद छू लेने की
ख़्वाहिश जैसा है ॥

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14 NOV AT 8:38

~ शुभ दीपावली ~

यथास्थान को लौटती हुई
चीजें सदैव अच्छी लगती है,

( पूरी रचना अनुशीर्षक में )

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8 NOV AT 13:41

रात है गर तो महताब होना चाहिए
नींद में तेरा ही ख़्वाब होना चाहिए

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20 OCT AT 20:30

मुझी से रूठती है, बात करती है
दरीचे बैठ दिन को, रात करती है

अकेला मैं कभी तन्हा नहीं रहता
सदा तस्वीर उसकी साथ रहती है

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15 OCT AT 9:47

जिन्हें हासिल है सत्ता वे काबिल हैं क्या
मतदाता भी उनके सारे जाहिल हैं क्या

आँखों के आगे ही, सब होती है गड़बड़
बस्ती के ये सारे आदम ग़ाफ़िल हैं क्या

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11 OCT AT 11:59

अब तेरे ख़त
नहीं आते हैं जानाँ,
न आते हैं कबूतर
छत की मुंडेर पे,

ये कैसी बेरुख़ी है तेरी
मेरी जाँ मुझसे,
तेरे संग संग
कबूतर भी ख़फ़ा हैं क्या?

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5 OCT AT 9:31

हे ईश्वर! मुझे संदेह है कि,
तुम्हें अब
आदत पड़ चुकी है
एक शिला बने रहने की,
अभी एक अरसा लगेगा
तुम्हें कुछ महसूस करने में ।

( पूरी रचना अनुशीर्षक में )

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20 SEP AT 11:40

इश्क़ है तो फिर इजहार करना पड़ेगा
चाँद की ख़ातिर इंतज़ार करना पड़ेगा

कब तलक बैठोगे, आप इस पार ऐसे
आग का दरिया तो पार करना पड़ेगा

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7 SEP AT 12:07

किसी की याद में,
जो आँखों से टपकता है
प्रेम का मोती,
वो अक्सर
लबों को चूमकर जाता है
.
.
बेवजह कुछ भी
नहीं होता प्रेम में,
मिठास प्रेम में
खारेपन के बाद ही आता है।

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