Avinash Kumar   (अविनाश 'कर्ण')
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Joined 14 July 2017


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Joined 14 July 2017
Avinash Kumar 5 HOURS AGO

माना बे-मतलब है मोहब्बत में पाबंदी की बातें
मगर तेरी आँखों में कैद हो जाना भी हसरत है

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Avinash Kumar 4 APR AT 8:37

टूटता क्यूँ है तारा, ठहर क्यूँ नहीं जाता
ये चाँद आसमां से उतर क्यूँ नहीं आता

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Avinash Kumar 1 APR AT 8:59

जो छिप गए थे चंद रोज़ की ज़िंदगी कमाने
मौत ने ढूँढ लिया उनको मुफ़्लिसी के बहाने

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Avinash Kumar 27 MAR AT 10:41

सब कहते हैं, कू-ए-यार जाना छोड़ दूँ
बेमतलब है सब, दिल लगाना छोड़ दूँ

महताब देख, तेरी याद आती है बहोत
बेहतर है, कि छत पे ही जाना छोड़ दूँ

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Avinash Kumar 10 MAR AT 8:37

आज फिर मौसम-ए-बहार आया है
बीता बसंत फाल्गुन-फुहार आया है

जहां के हर राग में, फाग है शामिल
पानी को रंग पे आज प्यार आया है

मिलने को बेसब्र हैं एक रंग दूसरे से
मुद्दतों बाद फिर ये, त्योहार आया है

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Avinash Kumar 7 MAR AT 18:32

लगते हैं कई ज़माने मोहब्बत भुलाने में
हिज्र की बातें इस दिल को समझाने में

फक़त मैं ही जानता हूँ क्या गुजरती है
तस्वीर बना कर फिर उसको मिटाने में

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Avinash Kumar 21 FEB AT 7:36

माथे मुकुट चन्द्रमा जटा गंगा विराजत है
श्रृंगार भभूत भस्म, गले भुजंग शोभत है

काल,नक्षत्र,पंचभूत है सब जिसके हिस्से
वो शिवशंभू, बस गौर के हिस्से आवत है

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Avinash Kumar 18 FEB AT 15:44

शारीरिक क्षमता
के अनुकूल भार उठाने
के आदी मनुष्यों को,
ज़िंदगी नहीं देती है लाभ
कि वो चुन सके
अपने अनुकूल मानसिक भार,
और न ही दिया जाता है
इस अप्रत्याशित भार
को उठाने का
कोई विशिष्ट प्रशिक्षण,
स्वयं ही सीखना पड़ता है
अलग-अलग भार को
उठाने और खुद को
संभालने का तौर-तरीका,
.
मगर,
ऐसे सभी भारों में
मैंने सदैव ही सबसे कठिन
पाया है, संभालना,
किसी के चले जाने के बाद
उनकी यादों का
"भार"।

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Avinash Kumar 14 FEB AT 11:20

चाहा मैंने भी मोहब्बत में गुलाब होना
छूके लरज़ते होठों को तेरे शराब होना

जुगनू सारे के सारे हैं बन चुके सितारे
बाक़ी है तेरा पूनम का माहताब होना

तू रहे या ना रहे मैं इंतिज़ार में रहा हूँ
है मेरी चाहत है मुझे तेरा ख़्वाब होना

तुम्हें पाना मोहब्बत में है मक़ाम मेरा
नामंजूर है मुझे अब नाकामयाब होना

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Avinash Kumar 13 FEB AT 15:36

चाहा मैंने भी मोहब्बत में गुलाब होना
छूके लरज़ते होठों को तेरे शराब होना

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