जहां परोपकार है,
वहां शिव हैं।
सेवा है सत्कार है,
तो शिव हैं।
आस्था की पुकार है,
तो शिव हैं।
प्रेम का व्यवहार है,
तो शिव हैं।
क्रोध है, हुंकार है,
तो शिव हैं।
सृजन है,संहार है,
तो शिव हैं।
शून्य आकार है,
तो शिव हैं।
या अनंत तक विस्तार है,
तो शिव हैं।
कर्म हो धर्म हो,
जीवन-मरण का मर्म हो।
करुणा हो,वेदना हो,
अचैतन्य या चेतना हो,
यत्र तत्र सर्वत्र,
शिव ही शिव हैं ।।
- AJ ✍️
15 FEB AT 7:26