14 FEB 2025 AT 23:40

चाहता हूंँ संँवारना,
पर बिगड़ जाती है।
न जाने ये जिंदगी,
लेकर किधर जाती है?
प्रतीत होती है,
आती हुई,खुशी!
पर ऐन मौके पर
मुकर जाती है।
कभी सोचता हूंँ,
वक्त थम जाए,
दो पल तो
मिले फुर्सत के।
पर ये टिक-टिक करती,
हर पल ही गुजर जाती है।
जी!समझ से परे है,
यह कुदरती फितरत,
कि झुक वही सकता,
जो जिंदा हो ।
मुर्दों से कहांँ
अकड़ जाती है!
और आना-जाना
व्यवस्था है, नैसर्गिक।
पर लगाव से अलगाव हो,
तो आंँखें भर आती हैं।
किंतु,व्यथित होना उचित है,
रहना नहीं।
भले काली,अंँधेरी
रात हो, अमावस की।
प्रातः,पुनः रौशनी बिखर जाती है।।

- AJ ✍️