Anubhav Dwivedi   (अनुभव द्विवेदी)
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Joined 10 November 2019


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Joined 10 November 2019
26 JAN AT 4:04

था सुरूर कुछ चढ़ा यूं ऐसा , दुनियादारी भूल गया ,
तेरी बातें याद रह गई , सारी बातें भूल गया

बिखरा था मैं टूट टूट कर , जुड़ना भी मैं भूल गया ...
तेरे दिए हुए ज़ख्मों को , भरना भी था भूल गया

हारा भी तो हारा ऐसे , जीत क्या होती ? भूल गया ,
तू ही तू बस याद रह गई , ख़ुद को मैं तो भूल गया

आगे क्या हो ? आज क्या करना ? , ये सब मैं तो भूल गया ,
अपने कल के आगे मैं तो , कल का सब कुछ भूल गया

इश्क़ , इबादत , ख़ुदा या जन्नत , क्या है ये सब भूल गया ,
तेरा चेहरा याद रह गया , बाकी सब कुछ भूल गया !

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23 AUG 2024 AT 9:01

हो शख़्स न कोई, जो सुने दर्द तेरा तो ,
ख़ुद को ही अपना दर्द सुना , अश्क पोंछ ले ...

क्यों चाहता है तू , हो कोई हमसफ़र तेरा
ख़ुद हाथ पकड़ , तू ही अपने साथ अब चल ले ,

औरों के वास्ते है तूने कर लिया सब कुछ ,
अब मोल ख़ुद को दे ज़रा , ख़ुद के लिए कर ले ,

मर-मर के जी रहा था तू , मरना बहुत हुआ ,
कुछ पल तू अब जी ले , आज़ाद हो, जी ले !

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9 MAR 2024 AT 0:44

इन आंसुओं को रोकूं ...
या अब इनको बह जाने दूं ?

ज़र्रा - ज़र्रा जो ज़ख्म मिला ,
उस ख़ून को बाहर आने दूं?

जो दिल टूटा , था मैं टूटा ...
क्या फिर इसको जुड़ जाने दूं ?

थे दर्द भरे , दिल में मेरे ,
चाहा था की बह जाने दूं ....

हो सख्स कोई जो साथ रहे ,
जब उनको बाहर आने दूं ।

पाया खुद को तन्हा ही था,
मैं क्यों इनको बह जाने दूं !

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26 APR 2023 AT 16:18

दो पल की ख़ुशी और ग़म के साल दे गए ,
सिर्फ तोड़ा नहीं .... वो बरबाद कर गए !


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30 SEP 2022 AT 13:03

तमस रात्रि में ज्वलित
एक दीप हूंँ , मैं सूर्य हूँ ,
अल्प हूं पर पूर्ण हूँ ,
अल्प हूं .... पर पूर्ण हूँ !

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19 JUL 2022 AT 10:59

बस इतना क़रीब अपने पाना है तुम्हे ,
जो न छूटे वो आदत बनाना है तुम्हे ...
मोहब्बत में डूबे यूं तो आशिक़ बहुत है ,
नाता दोस्ती का तुमसे निभाना है हमें !



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16 JUN 2022 AT 15:46

तो अर्ज़ किया है ,

ख़यालों में जो बसी हो तुम (2)
ज़िंदगी में उतर आओ तो जाने ...

चाहत हो तुम तो कईयों की (2)
महबूब हमारी हो जाओ तो जाने ।

ख़ुद पे बड़ा गुरूर है तुमको (2)
हुस्न से हमें भी जलाओ तो जाने ।

हमदर्द हो तुम फिक्रमंदों की (2)
हमें दर्द अपना बताओ तो जाने ।

प्यार भरा जो तेरे उस दिल में है (2)
उस दिल को इस दिल से लगाओ तो जाने !
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जुस्तजू करते तुम्हारी , आरजू भी तुम ही हो (2)
आरजू से आबरू तक तुम बदल जाओ तो जाने ।

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4 JUN 2022 AT 17:54

मैं तन्हा हूं तन्हाई का साथ है ..... क्यों करनी किसी से मुलाक़ात है ?

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17 MAY 2022 AT 18:18

टूटना और बिखरना बहुत हो चुका ,
बस अब जीने की मुझको वजह चाहिए !
इम्तिहानों की रातों से डरते नहीं ,
इत्मीनानो भरी वो सुबह चाहिए ...

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17 MAY 2022 AT 1:13

क्या थी क़ीमत तेरे मेरे इकरार की ,
क्या क़दर थी तुझे भी मेरे प्यार की ?

एक पल में था तूने पराया किया ,
दिल को मेरे ज़खम से था छल्ली किया ...

मैं टूटा वफ़ा कर , मतलबी यार की
क्या ही अब वास्ते , क्या ही अब दिल्लगी ,

क्या ही अब आशिक़ी , क्या ही दीवानगी !

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