Anubhav Bajpai   (चश्म)
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Writer | Director

Watch our short movie 'Buzzing Alarm'
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Joined 6 December 2016


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Anubhav Bajpai 23 JUN AT 12:10

कभी-कभी मुस्कराहट रो न पाने की मजबूरी से जन्म लेती है और मरीचिका बनकर सबको भ्रमित करती रहती है । ऐसी स्थिति में सिर्फ़ होंठ प्रसन्न होते हैं आँखे नहीं।

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Anubhav Bajpai 20 JUN AT 8:18

मॉब लिंचिंग
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मैं कल सड़क पर औरंगजेब ज़िंदाबाद के नारे लगा रहा था। मेरे साथ सब औरंगजेब ज़िंदाबाद के नारे लगाने लगे। कुछ देर में वहाँ किसी नेता के रोड शो जैसा माहौल हो गया। आसमान औरंगजेब ज़िंदाबाद के नारों से गूँज रहा था। इतने देर में बिजली की गति से कुछ लड़कों ने माइक का इंतज़ाम किया और माइक मुझे थमा दिया।
मैं भी जोश में आ गया कि इतना समर्थन किसी अनजान आदमी के लिए। मैंने बोलना शुरू किया, "दोस्तों मैं आप सबका समर्थन देखकर गदगद हूँ, मैं ख़ुशी से फूलकर बोतल से टंकी हो गया हूँ। तो एक बार फिर बोलो औरंगजेब ज़िंदाबाद।" सब ने जोरदार नारा लगाया नारे की ध्वनि तीव्रता से भूकम्प आते-आते बचा। मैंने आगे कहा, "औरंगजेब कितना महान था वो टोपी सिलकर और अनुवाद करके अपना..." मैं इतना ही कह पाया कि न जाने क्या हुआ? मुझे जिन लोगों ने कंधे पर उठा रखा था अचानक छोड़ दिया। बिन मौसम मुझ पर लात घूंसों की बरसात हो गई। किसी तरह मैं बचकर भागा; नहीं तो मेरा राम नाम सत्य हो गया होता। मुझे ये प्रश्न अब भी खाए जा रहा है कि अपार जनसमर्थन के बाद अचानक ऐसा क्या हुआ कि उस भीड़ ने मुझे कूट दिया?"

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Anubhav Bajpai 2 JUN AT 10:28

मैं जाता हूँ
जिसके भी पास
पाता हूँ एक लाश

दुविधा में हूँ
जलाऊँ
या दफ़्न करूँ

पूछना चाहता हूँ
उनका धर्म

हिचकता हूँ
पूछने में

उनके उत्तर की कल्पना
रोक लेती है मुझे

यदि वो नास्तिक हुआ
तो
क्या करूँगा लाश

छोड़ दूंगा
कम्युनिस्टों के पास

नहीं,
छोड़ दूंगा
रेगिस्तान में

गिद्ध नोचेंगे
खाएंगे

नहीं
गिद्ध अब नहीं होते

क्या करूँ
दुविधा में हूँ
बैठा उदास
लाश के पास

सोचता हूँ
ये मर क्यों नहीं जाती

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Anubhav Bajpai 18 MAY AT 22:49

मैं मोबाइल कैमरे से
तस्वीर उतारता हूँ

पक्की सड़क के
बीचोबीच

घास चरती
ऑफिस की घरेलू
नग्न स्त्रियों की

और उनकी
योनियाँ निहारते
तार्किक वैज्ञानिक
पुरुषों की

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Anubhav Bajpai 25 APR AT 10:32

बरामदे की रस्सी पर सूखते कपड़े
हफ़्तों से जमीन पर बिछे पत्ते

कार पर जमी कई दिनों की धूल
खण्डहर जैसा घर
घर के बाहर खड़ी मोटरसाइकिल

सब में कितना विरोधभास है
बिल्कुल तुम्हारे
और मेरे अंतर्मन जैसा

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Anubhav Bajpai 14 APR AT 12:35

आजकल लोग बांध दिये गये हैं। वो खुलकर हंसते भी नहीं। मुस्कुराने का भी पैमाना है कि कितने सेंटीमीटर मुस्कुराना है! जैसे रोबोट का एक अपग्रेडेड वर्जन आया हो और उसमें दो सेंटीमीटर मुस्कुराने का नया फीचर ऐड किया गया हो।

हम सॉफिस्टिकेटेड, परफेक्ट और सभ्य बनने के दिखावे में अपनी बेतरतीबी और अल्हड़पन पर रोज़ रोड रोलर चला रहे हैं।

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Anubhav Bajpai 10 APR AT 23:35

दो लोग एक-दूसरे के समानान्तर चलना शुरू करते हैं। कुछ दूर जाकर वो एक-दूसरे से छूटने लगते हैं। उन दोनों के समानान्तर कोई दूसरा चलने लगता है। कुछ दूर जाकर वो भी एक-दूसरे से छूटने लगते हैं। यही क्रम अनन्त तक चलता चला जाता है।

इस प्रक्रिया में समानान्तर चलने वाला हर दूसरा शख़्स पहले के लिए भीड़ बनता जाता है। इसी तरह सब एक-दूसरे के लिए भीड़ बनते जाते हैं।

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Anubhav Bajpai 31 MAR AT 20:24


सब कुछ छूट जाएगा

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Anubhav Bajpai 29 MAR AT 11:07

मैं कमरे के बाहर पड़े
बेचारे, लाचार
पायदान पर पैर पोछता हूँ

और सोचता हूँ
देश की नियति के बारे में

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Anubhav Bajpai 21 MAR AT 13:42

होरी खेल रहा है होरी
तुमको मालुम ओ री!

सब होरी के रंग लगायें
होरी लादे बोरी

बोरी लिए चढ़ा है ट्रक पर
होरी है भई होरी

दारू पिये पड़ा है मालिक
होरी मांगे होरी

होरी नहीं मिली, होरी अब
घर क्या जाये होरी

बच्चे घर में राह तक रहे
रंग तो लाये होरी

होरी भरी आंख से खेले
होरी है भई होरी

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