Anubhav Bajpai   (अनुभव)
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Writer | Director
Joined 6 December 2016


Writer | Director
Joined 6 December 2016
13 JUN AT 17:33

जीवन इतना जटिल कभी नहीं था। अभी तक मन उदास था। अब जीवन उदास लगता है। अंजान दुःख घेरे हुए हैं। जैसे, किसी ने एक जगह खड़ा करके बॉक्स से ढक दिया है। और उस बॉक्स पर बड़ा सा पत्थर रखकर भूल गया है। मैं बॉक्स हटा रहा हूँ, सारी कोशिशें व्यर्थ हैं। उस अंधेरे बॉक्स में दम घुट रहा है। काश हमें, हमारे दुःख और उनके कारण पता होते। हम सब ठीक कर सकते।

(शेष अनुशीर्षक में)

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26 MAY AT 15:57

हम तुम्हें न्योत रहे हैं
बुद्ध, हमारे आँगन आ सकोगे

अभी-अभी आँगन बुहारा है
अभी-अभी काटी गई है, कोनों में लगी दूब
बस अभी गोबर से लीपी गयी है यहाँ की ज़मीन
आज ही बाँधा गया है मण्डप
आज ही दरी गयी है नयी-नयी दाल

हम तुम्हें न्योत रहे हैं
बुद्ध, हमारे आँगन आ सकोगे

तुम्हें किसी और ने न न्योता हो तो आओ
भोजन करो हमारे साथ
अपने जूठे हाथों से हमें खिलाओ
वही दाल वाला हाथ माथे पर फिराकर
हमें सदा के लिए जूठा कर दो

(पूरी कविता अनुशीर्षक में)

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16 MAY AT 12:12

यह दौर, मौतों का दौर है। इस दौर में संवेदनशीलता बचा ले जाना सबसे कठिन है। हर दिन कोई न कोई जा रहा है। हर जाने वाला थोड़ी संवेदनशीलता ले जा रहा है। मैं देख पा रहा हूँ वो मुझसे मेरा कुछ छीन रहा है। मैं उसे रोक नहीं रहा। रोकना नहीं चाहता या शायद रोक नहीं सकता। 

यह ऐसा दौर है जहाँ आँसू सूख गए हैं। इंसान के रोने की भी सीमा होती है। आख़िर वह कितना रोएगा। क्या हर घण्टे रोएगा?  इंसान के दुःखी होने की भी एक सीमा है। वह हर क्षण दुःखी नहीं रह सकता। पूरे दिन कैसे दुःखी रहा जाए? ये मौतें दुःख छीने लिये जा रही हैं। 

(पूरा पढ़ने के लिए अनुशीर्षक की सैर करें)

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22 APR AT 11:52

मृत्यु आज का बड़ा सच है
जीवन
सदा से सबसे बड़ा सच है

मरने से ज़्यादा लोग जी रहे हैं
दूसरे को जीने में मदद कर रहे हैं

मदद के लिए उठे हाथों के सामने
ईश्वर हारेगा
हमारा जीवन वापस करेगा

मानव ने सदा ही ईश्वर को पूजा है
और ईश्वर सदा ही मानव से हारा है

[अनुभव]

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6 APR AT 21:16

याद मन बाँध देती है। जब आती है, मन में और कुछ नहीं आता। सिर्फ़ याद आती है। पहले मन के कोरे कागज पर याद का एक बिंदु उभरता है। धीरे-धीरे कागज बिंदुओं से भरता जाता है। एक समय बाद बिंदुओं की सघनता में पहला बिंदु खोजना मुश्किल हो जाता है। जिस याद ने सैकड़ों यादों को जन्म दिया, खो जाती है। जननी का खोना कितना कष्टप्रद होता है। मन जननी की खोज में निकलता है। किन्तु पहली याद से जुड़ी यादें जननी को सोख लेती हैं। जननी याद कौन सी थी, किसी व्यक्ति की, वस्तु की या स्थान की याद; यह तक खो जाता है? यदि मन में उभरी यादों के नोट्स बनाये जाएँ, और बिंदुवार अलग-अलग यादों को लिखा जाए। शायद सम्भव है, पहली याद तक पहुँचा जा सके। इसमें एक ख़तरा है, रातें ख़राब होने का। क्योंकि सिर्फ़ अच्छी यादों के नोट्स बनाये जाएंगे, इसका आश्वासन देना सम्भव नहीं है। नोट्स बनेंगे तो मन का मैल भी शामिल होगा। इसलिए भावनात्मक रूप से यह बहुत कठिन और निचोड़ने वाला होगा। यादों के उद्गम तक पहुँचा कैसे जाए? अगर जल्दबाजी न की जाए और मन को उसके हाल पर छोड़ दिया जाए। तब मन खुद उस पहली याद को फिल्टर करके आप तक पहुँचाएगा। इसके लिए धैर्य चाहिए। क्या ऐसा सम्भव है कि मन को उसके हाल पर छोड़ दिया जाए। थोड़ा मुश्किल है। ऐसा एक बार में नहीं होगा। इसके लिए कई महीने लग सकते हैं। क्या हम इस भागदौड़ में, इतना समय ख़ुद को परिष्कृत करने के लिए खर्च सकते हैं।

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15 MAR AT 11:13

इस जीवन यात्रा की रेलगाड़ी मनुष्य रूपी स्टेशन से छूटती है, कई छोटे-बड़े स्टेशन जैसे- मानवता, नम्रता, वात्सल्य, सम्बन्ध, भाव, संघर्ष आदि से गुजरते हुए मानव रूपी गन्तव्य पर आकर खत्म होती है।

(पूरा निबन्ध अनुशीर्षक में पढ़ें)

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25 FEB AT 21:25

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11 JAN AT 14:26

मानव आता भी अकेला है और अंत में जाता भी अकेला है।किन्तु इस आदि और अंत के मध्य जीवन है। और जीवन सिर्फ़ क्लाइमैक्स के लिए नहीं जिया जाता। 

क्या फ़िल्म सिर्फ़ क्लाइमैक्स के लिए बनायी जाती है? यदि फ़िल्म क्लाइमैक्स के लिए बनायी जाती तो इसे कौन देखता! या जिस फ़िल्म की शुरुआत अच्छी हो और आगे वह बाँधकर न रख सके, तो क्लाइमैक्स से पहले ही दर्शक उठ खड़े होते हैं। 

जिस फ़िल्म में बाँधने की कला नहीं वह फ़िल्म अच्छी नहीं मानी जाती। मानव जीवन भी ठीक ऐसा ही है। सहज और स्वीकारे गये बन्धनों के बिना जीवन एक असफल और बेकार फ़िल्म है। 

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2 JAN AT 14:39

धूप सर्दियों की ऊर्जा है। इसलिए सर्दियों की धूप के लिए भी एक आंदोलन होना चाहिए। आंदोलन तो होते रहेंगे। दबाये जाते रहेंगे। किन्तु धूप मुझे आंदोलित करती है। धूप के आते ही इस; बड़े जाड़ का पाला है, हाड़ कपाने वाला है; वाली ठण्ड में शिथिल पड़े बदन में जोश भर जाता है। सूनी सड़कें, वीरान बाज़ार आबाद हो जाते हैं। शीत निद्रा से निकलकर लोग खुले में चहलक़दमी करने लगते हैं।

पीले और सफ़ेद के बीच में कहीं धूप का अपना एक रंग होता है। पर सर्दियों की धूप बहुरंगी होती है। सड़कों पर रंग बिखेर देती है। धूप के आते ही रंग-बिरंगे परिधान पहने हुए लोग सड़क पर छिटक जाते हैं। जैसे काली सड़क पर एक झटके में तमाम अलग-अलग रंग के फूल खिल गये हों।

(शेष अनुशीर्षक में)

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23 DEC 2020 AT 13:23

तुमने मेरे मन पर
प्रेम की कई थापें लगायीं
दो थापें मैं बचाता गया
एक प्रथम चुम्बन की थाप
दूसरी गीले आलिंगन की थाप

तुम्हारे जाने के बाद
उन थापों के ऊपर
अनगिनत थापें लगीं
हर पुरानी थाप नयी थाप के पीछे छिप गयी
किन्तु मेरे मन में 
तुम्हारी थापों का आकार जस का तस रहा

इन थापों ने कई बसन्त देखे
हर बसन्त के साथ इनका रंग और गाढ़ा होता गया

कई थापें पतझड़ों में झड़ गयीं
कितनों को बारिश ने धो डाला
किन्तु मेरे मन में 
तुम्हारी थापें और उभरती गयीं 

कई हाथों ने इन थापों को पोछना चाहा
मैंने उन हाथों को हर बार रोका
हर बार मन पर लगीं 
तुम्हारी थापों को बचाया

इन्हें बचाते हुए मैंने जाना 
मैं तुम्हारी थापें नहीं
अपना मन बचा रहा था

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