Anubhav Bajpai   (चश्म)
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Writer | Director

Watch our short movie 'Buzzing Alarm'
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Joined 6 December 2016


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Anubhav Bajpai 14 APR AT 12:35

आजकल लोग बांध दिये गये हैं। वो खुलकर हंसते भी नहीं। मुस्कुराने का भी पैमाना है कि कितने सेंटीमीटर मुस्कुराना है! जैसे रोबोट का एक अपग्रेडेड वर्जन आया हो और उसमें दो सेंटीमीटर मुस्कुराने का नया फीचर ऐड किया गया हो।

हम सॉफिस्टिकेटेड, परफेक्ट और सभ्य बनने के दिखावे में अपनी बेतरतीबी और अल्हड़पन पर रोज़ रोड रोलर चला रहे हैं।

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Anubhav Bajpai 10 APR AT 23:35

दो लोग एक-दूसरे के समानान्तर चलना शुरू करते हैं। कुछ दूर जाकर वो एक-दूसरे से छूटने लगते हैं। उन दोनों के समानान्तर कोई दूसरा चलने लगता है। कुछ दूर जाकर वो भी एक-दूसरे से छूटने लगते हैं। यही क्रम अनन्त तक चलता चला जाता है।

इस प्रक्रिया में समानान्तर चलने वाला हर दूसरा शख़्स पहले के लिए भीड़ बनता जाता है। इसी तरह सब एक-दूसरे के लिए भीड़ बनते जाते हैं।

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Anubhav Bajpai 31 MAR AT 20:24


सब कुछ छूट जाएगा

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Anubhav Bajpai 29 MAR AT 11:07

मैं कमरे के बाहर पड़े
बेचारे, लाचार
पायदान पर पैर पोछता हूँ

और सोचता हूँ
देश की नियति के बारे में

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Anubhav Bajpai 21 MAR AT 13:42

होरी खेल रहा है होरी
तुमको मालुम ओ री!

सब होरी के रंग लगायें
होरी लादे बोरी

बोरी लिए चढ़ा है ट्रक पर
होरी है भई होरी

दारू पिये पड़ा है मालिक
होरी मांगे होरी

होरी नहीं मिली, होरी अब
घर क्या जाये होरी

बच्चे घर में राह तक रहे
रंग तो लाये होरी

होरी भरी आंख से खेले
होरी है भई होरी

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Anubhav Bajpai 15 MAR AT 19:24

मैं पानी का बहना देख रहा हूँ। पानी अपने साथ कितने सपने, यादें और न जाने कितनी गतियाँ बहाये लिये जा रहा है। इसके साथ मुझे भी बहना है, लेकिन डर है कहीं बह न जाऊँ।

आप सोचते हैं डूबने का डर है। नहीं, हो ही नहीं सकता क्योंकि मैं जानता हूँ, डूबकर नहीं मरूंगा। मैंने सैकड़ों लोगों को डूबते देखा है वो डूबकर नहीं मरते। इस डर से मरते हैं कि ज़िंदा बचने पर क्या होगा?

ज़िंदा बच जाने का भी मुझे डर नहीं क्योंकि मैं ये भी जानता हूँ, मेरे मरने पर कोई स्थानीय मेरी लाश देखकर पुलिस को सूचित नहीं करेगा और न ही पुलिस किसी गोताखोर से मेरी लाश निकलवाकर उसकी शिनाख़्त करवायेगी।

एक बार को मन में आता है आँखे बंद करके छलांग लगा दूँ और नदी के अंतिम छोर तक बहता चला जाऊँ। लेकिन फिर वही बह जाने का डर, न कि बहते जाने का डर।

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Anubhav Bajpai 15 MAR AT 19:03

जब दुनिया ख़त्म होने की कगार पर होगी तब कुछ गाँव के लोग साइकिल पर दुनिया बचाने निकलेंगे।

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Anubhav Bajpai 12 MAR AT 21:50

अगिया बुझाय द्यो आग लागि है
बप्पा छोड़ाय द्यो दाग लागि हैं

दाग बहुत अच्छे हैं
लरिकवा तौ सच्चे हैं
तबहूँ तौ झगड़ा है, बात लागि है
बप्पा बचाय ल्यो च्वाट लागि है

हाथन मा तखती है
मूछन मा सखती है
होरी मा सबके चिल्लास लागि है
चप्पल चलाय द्यो आस लागि है

रंग लेहे खेलि रहे
सबके दुई रेलि रहे
हमरे तौ हॉकी चलास लागि है
हमका न रोकौ पेलास लागि है

चारि पांच लौंडे हैं
पिये पाय औंधे हैं
माथे पा इशक का जिहाद लागि है
बप्पा छोड़ाय द्यो विवाद लागि है

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Anubhav Bajpai 6 MAR AT 1:37

मैं ख़ाली जगह भरने में उस्ताद हूँ। जहाँ भी ख़ाली जगह देखी, किसी न किसी सामान को उस जगह रख देता हूँ। ख़ाली जगहों से मुझे चिढ़ होती है। मैं तरह-तरह के सामान से हर जगह भरी हुई देखना चाहता हूँ, बशर्ते वो सामान मानव न हो। इसके विपरीत मन को मैं ख़ाली देखना चाहता हूं, किंतु मेरे मन में मानव भरे पड़े हैं।

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Anubhav Bajpai 4 MAR AT 12:02

प्रिय!
वादा करो

जब विश्व
युद्ध में उलझा होगा

हम शांति की बातें
नहीं करेंगे

हम बच्चों के साथ
किसी बगीचे में
मिट्टी की कोठरी बनाएंगे

और छुपा देंगे उसमें
अपना संसार

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