Anubhav Bajpai   (अनुभव)
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Writer | Director
Joined 6 December 2016


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Joined 6 December 2016
16 OCT AT 21:09

बालों में लगने से बेहतर है
पुष्प पेड़ पर लगा रहे
गिरना उसे दोनों जगह से है
दोनों जगह उसे मुरझाना है
किंतु पेड़ उसे
एक दिन का जीवन अधिक दे रहा है

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24 AUG AT 21:38

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15 AUG AT 9:48

हमने मर्यादा की दीवार धर्म, नस्ल और जाति के औजारों के सहारे गिरा डाली। इसी तरह हम स्वतंत्रता को स्वच्छंदता की श्रेणी पर ले गए और निरंकुश होते चले गए।

जो अभी स्वच्छंदता की श्रेणी पर नहीं पहुँचे हैं, मर्यादित स्वच्छंदता के साथ स्वतंत्र बने हुए हैं, उन्हें स्वतंन्त्रता दिवस की शुभकामनाएँ।

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12 AUG AT 9:55

मीम युद्ध
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मैं भविष्य देख पा रहा हूँ, दो देशों के बीच मीम युद्ध छिड़ा हुआ है। इधर से एक मीम फेंककर मारा गया है। उधर से दो मीम फेंककर मारे गए हैं। युद्ध क्षेत्र मीम्स से पटा हुआ है। इधर से फिर एक मीम फेंका गया। उधर से उससे तगड़ा मीम फेंक दिया गया। मीम वॉरियर्स की कमी आन पड़ी है। सरकार को नयी भर्ती करनी पड़ रही है। मीम टेम्पलेट्स की भी कमी आन पड़ी है। इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार ने गैंग्स ऑफ वासेपुर-3 बनाने का आदेश जारी किया है। एक और समस्या सामने आकर खड़ी हो गयी है। सेनाएँ अपनी भाषा के मीम मारने लगी हैं। जिससे वे विरोधी के रडार से बाहर हो गए हैं। विरोधी सेनाओं ने नयी तरक़ीब निकाली है। वे दो लेयर में युद्ध कर रही हैं। अब, उन्हें गूगल ट्रांसलेटर से मीम को लोकेट करके ध्वस्त करना पड़ रहा है। युद्ध कब समाप्त होगा, नहीं पता। किन्तु इससे जनहानि बढ़ती ही जा रही है। युद्ध का सजीव प्रसारण देख रहे नागरिक, घायल हो रहे हैं। हँसते-हँसते उनके पेट फट रहे हैं। सरकार को प्रसारण रोकना पड़ा है।

क्रमशः।

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1 AUG AT 12:41

वे शिक्षा नहीं जानते
सरकार नहीं जानते
देश भी नहीं जानते
बस जानते
छत, वो भी फूस की
रोटी, वो भी जौ की
खेत, वो भी दूसरे का

वे कुछ नहीं जानते
हमें नहीं जानते
तुम्हें नहीं जानते
अधिकार नहीं जानते
मतदान नहीं जानते
बस धिक्कार जानते
वो भी नियति का,
नियन्ताओं का नहीं

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29 JUL AT 16:15

जो कुछ जा रहा है
उसके लौटने की भूमिका अभी से तैयार हो रही है
या जो जा रहा है
वो कहीं लौट भी रहा है

जैसे यहाँ से जाता हुआ मौसम
कहीं और लौट रहा होता है
जैसे यहाँ से जाती हुई ट्रेन
कहीं को लौट रही होती है

इस जाने और लौटने की गति
में स्थिरता है
और इस स्थिरता में गति
क्योंकि कहीं से जाना
कहीं को लौटना है

(पूरी कविता के लिए अनुशीर्षक देखें)

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24 JUL AT 17:31

एक नयी जाति जन्मेगी
और सभी जातियाँ सिरे से खारिज़ कर दी जाएंगी
अतातायी
हिंसक, क्रूर
ख़ून की प्यासी जाति
जो एक-एककर सभी को खा जाएगी
इस भक्षक जाति से
मानवता को बचाने के लिए
और एक नयी जाति जन्मेगी
पुरानी किन्तु नयी
और कल जन्मी जाति में ख़ूनी संघर्ष होगा
इस संघर्ष से और एक नयी जाति जन्मेगी
ऐसे ही जातियाँ जन्मती रहेंगी
हर नयी जाति के साथ क्रूरता जन्मेगी
हिंसा के हाथ और लंबे होंगे
बच्चा-बच्चा ख़ून पियेगा
जो क्रूर नहीं होगा
हिंसक नहीं होगा
ख़ून नहीं पिएगा
सूली पर चढ़ा दिया जाएगा

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18 JUL AT 11:07

ओज़ार्क
[अनुशीर्षक में पढ़े]

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16 JUL AT 7:22

महामारी का भविष्य सामने है

दिन बदलता है
दिन के साथ मास्क भी बदलता है
सैनिटाइजर रोज़ नहीं बदलता
कम ज़रूर होता है
धैर्य की तरह

मानव व्यस्त है
मास्क बदलने में
सैनिटाइजर छिड़कने में,
उसकी आधी ऊर्जा इसी में व्यय हो रही है
दिन इसी व्यस्तता से कट रहे है

मास्क का बदलना महामारी का अटल सत्य है
सैनिटाइजर का कम होना
और एक दिन ख़त्म हो जाना
महामारी का भविष्य

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9 JUL AT 9:56

धीरे-धीरे चलौ सरकार
नय, होई जग हँसाई...

पइसा न बाँटौ, चदरिया न बाँटौ
रोटी न बाँटौ, जुलमवा न काटौ
दई द्यो गरीबन का रोजी
होई जग बड़ाई
धीरे-धीरे चलौ सरकार
नय, होई जग हँसाई…

भोंदुके न जइहो, अउ हमरयो न अइहो
पहिले पहिल तुम नखरा दिखैहौ
आयी जौ सर पा चुनाव
तब जाय गइया छुटाई
धीरे-धीरे चलौ सरकार
नय, होई जग हँसाई…

(पूरी कविता अनुशीर्षक में)

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