Ankur Thakar   (Ankur Thakar)
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Joined 9 August 2020


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23 MAR AT 13:03

महखाने के गहरे घाब मुझे सताये रहते है.
हर शख्स में छुपे यहाँ दो साये रहते है.

अफजल परवरिश में कमी ना छोड़ी तूने.
फिर भी देखो बच्चे बाप से पराये रहते है.

इमां की फ़सल सबकी हरी नहीं होती.
कुछ लोग ज़िन्दगी भर मुरझाये रहते है.

कयास का औधा तलब से गरीब निकला.
मौत पे भी लोग तमाशा देखने आये रहते है.

अफजल - उत्तम
कयास - अनुमान

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10 JAN AT 15:00

दिल से तो हम कब के उतर गये अब नजरों से उताकर रख दिया उसने.
तेरे शहर में ठिकना पक्का ना हुआ पेड़ की तरहा गिराकर रख दिया उसने.

मेरी मर्ज का फिक्र ना हुआ फरेबी की तरहा सब भुलाकर रख दिया उसने.
तेरा इश्क सदा गुनाहों में रहा तूफान की तरहा सब उजाड़कर रख दिया उसने.

गिर गया हिजाब और हिसाब हुआ, सरकार की तरहा इमां बेच कर रख दिया उसने.

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25 NOV 2022 AT 9:03


मिले कोई दर्द तो ख्याल कर दूँ
खुशी को तेरी मालामाल कर दूँ.

कर्म से आगे कुछ भी नहीं तेरा
आ तेरे पैसे कों हलाल कर दूँ.

इश्क कि मर्ज नहीं है पास तेरे
चल हकीम से आज बवाल कर दूँ

लौट के आया ही नहीं आने वाला
यादों को आज गुजरा साल कर दूँ

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28 OCT 2022 AT 13:38

उजाले तेरी वफ़ा खालिद के धुधंले फीके गर सिमट भी जाये तो फर्क क्या है.

अदाकारी रहबर से सीखी मैंने बरसात से किसी
की छत गिर जाये तो फर्क क्या है.

समाजिक माध्यम पे दिखाबा जोरो पे है ,हक़ीक़त में कोई अगर मर भी जाये तो फर्क क्या है.

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8 OCT 2022 AT 9:55

मैंने तेरी कितनी निशानिया छुपा रखी है.
कच्चे मकां के जैसे परेशानियाँ छुपा रखी है.

पुछ लेता हूँ हाल दहलीज दरबाजों से तेरा.
पागल दिल में ऐसी नादानियाँ छुपा रखी है.

मेरी दिल का दर्द तेरे इश्क जहन से निकला.
सुखे पेड़ ने जैसे मानो बिरानियाँ छुपा रखी है.

जताता हक़ कोई तो मैं भी गम अदा कर देता.
बचपन के जैसी तेरी कहानियाँ छुपा रखी है

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1 OCT 2022 AT 20:10

ऐसा वक़्त मेरा आया ना होता
आंख का आँसू पराया ना होता.

मान लेती अगर एक वो बात मेरी
ज़ख्म ए नीर तेरा सताया ना होता.

मेरा भी घर होता आज शहर में बालिद.
अगर देता मैं किस्तों में किराया ना होता.

तेरी ज़िन्दगी में तेरा रहता वो पागल .
गर नज़रों से तूने गिराया ना होता.

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14 SEP 2022 AT 14:02

सुबह जाते है शाम बापसी के घेरो के लिये
हम उजाले बेचते है रात के अंधेरों के लिये.

मुनासिब ना हुआ साथ मुसाफिर सफर में अंकुर.
वफा की सादगी काम नहीं आती फेरो के लिये.

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20 AUG 2022 AT 16:51

वफा की व्यथा को सभी के सलाम नहीं होते
हर किसी के हिस्से सीता के राम नहीं होते.

गुमां बहुतों को है यहां खुद की चाहत सफा पे
कान्हा के जैसे सभी राधा के तमाम नहीं होते.

खुद के दर्द का टोकरा भारी जहर ही लगता है.
घोड़े के दर्द जैसे सभी के नाल लगाम नहीं होते

राजा की तरहा राज करो हल्की जेब खाली से.
सच्चे अक्स के नक्स किसी के गुलाम नहीं होते

सफा -पवित्र.

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1 AUG 2022 AT 10:18

अब ये शहर गवारा नहीं है. दो वक़्त की रोटी से किसी का गुजारा नहीं है.

बातें तो बहुत करता है हमसफ़र मेरा पर यहाँ कोई दिल हमारा नहीं है.

खुद का इश्क बिसर्जन कर दिया यहां वफा का कोई किनारा नहीं है.

नादानीयों की अदा ने खिलाफ तोहफ़े दीये अब वो अंकुर बेचरा नहीं है.

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15 JUL 2022 AT 14:00

1:

दिल तोड़ने का फयादा हुआ क्या?बर्बाद हुआ
जो मोहब्बत में उससे भी ज्यादा हुआ क्या.

2:
इश्क में अब वफा नहीं करेंगे
पहले सी मोहब्बत दूसरी दफा नहीं करेगें.

3:
रहने दे ये दरिया भरे आँखों में अब यहां कोई पानी भरने नहीं आता.
ख्याल में आता है अंकुर कभी कभी मगर अब तेरा ख्वाब नहीं आता.

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