Ankur Thakar   (Ankur Thakar)
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Joined 9 August 2020


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24 FEB AT 12:39


वक़्त सही होता तो फकत लिखता
तेरे इश्क को सुखा दरख्त लिखता.

पतझड़ गुजरी और तुम बहार में हो.
तेरे साथ को मैं टुटा तख़्त लिखता

तबज्जो मिल ना पायी खलल को मेरी
तेरे गुजरे वक़्त को कैसे वक़्त लिखता.

रिश्ते झूठे निभाने नहीं जलाने वाकी है.
बेवफा जुबाँ के कैसे उसूल सख्त लिखता.

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28 JAN AT 11:05

आदाब मियां क्या सवाल लिखते हो.
इश्क को खता बेवफा को हलाल लिखते हो.

होता भाई मेरा तो दिल ए गम खोल देता
फिर किसके लिये तुम ये मलाल लिखते हो.

नफे के नेबले नुक्सान का सौदा नहीं करते.
जो समझ ना आये क्यों वो कमाल लिखते हो.

लफ्जो की मिठास का जहर उतरता नहीं.
तुम खुदा के शोर को भी ववाल लिखते हो.

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20 JAN AT 16:31

रात भर दीये की तरहा जला कोई
फिर भी कहां पूछे हाल भला कोई.

मरे जमीर की झूठी जुबाँ विकती है.
काश मुझमें भी होती ऐसी कला कोई.

लफ्जों में हसीं सिमट के ही आती है.
बेबसी से बुरी देखी नहीं मैंने बला कोई.

सुखे दरिया को कहां पूजते है लोग.फटे
बजूद को हसने नहीं देती खला कोई.

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27 DEC 2023 AT 8:26

आशिक़ को मोहब्बत में शुकराना नहीं आता
फीके रंगों के हिस्से कभी नजराना नहीं आता.

यूँ ही नहीं लिपटे होते जुगनू शमा की लट्टो से.
उन्हें बिछड़ कर कभी गम भुलाना नहीं आता.

नाकाम रहा हूँ मैं इश्क में, की खुशी के दर पे
छोड़ा उसे, फिर मुझे मुस्कराना नहीं आता.

गम ऐसे है तेरे प्यार के कोई जीते जी मर जाता
रोज चुबती है चाहत फिर भी मुझे बहाना नहीं आता.

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9 DEC 2023 AT 12:52

1:
मोहब्बत के उमर भर रंग फीके ही रहेंगे
जब तक तेरी जेब में खनकते सिक्के रहेंगे.

पगार पुछ कर औकात नापते है लोग.
ये व्यापार ज़िन्दगी भर यूँ ही चलते रहेंगे.

2:
सब कुछ लूट गया फिर भी सफर में हूँ.
एक मंजर गुजर गया दूसरे की नजर में हूँ.

3:
लहजे भरे ख्वाब आज परिंदो में बाँट आया हूँ.
गांव की मिट्टी हाथ में लेके बहुत मुस्कराया हूँ.


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20 NOV 2023 AT 11:48

मैं किताब नहीं मैं ख्वाब लिखता हूँ.
तेरे के दीये जख्म का हिसाब लिखता हूँ.

दुप्पटे की सादगी को लिबास लिखता हूँ.
हारे हुए जज्बातों को ख़िताब लिखता हूँ.

हालातों के जिक्र की शारब लिखता हूँ.
किसी के लिये मैं बहुत खराब लिखता हूँ.

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22 OCT 2023 AT 18:32


1:
मोहब्बत के गलियारों में जख्म खा के आये है
इश्क में वफा की भारी रकम चुका के आये है
2:
बेज़ुबान परिंदो से सहज रखता हूँ.
इंसानों से थोड़ा परहेज रखता हूँ.
3
कौन ज़माने में फकर की फिक्र करता है.
पैसा सबकी औकात का ज़िक्र करता है.
4:
इंसानियत की परत को कालिख लग गयी
हमें शहर से गांव तक सबकी परख लग गयी

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30 SEP 2023 AT 12:38

गांव में शहरो की रिवायते नहीं होती.
टुटी नाव की कोई ख्वाहिशे नहीं होती.

अमीरी लहजे में अदब कम रहती है.
कच्चे घरों में कभी नुमाइशे नहीं होती.

तेरे हिजर के फिकर का क्या जिक्र करूं
गरीबी के तालो में फरमाइशे नहीं होती.

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3 SEP 2023 AT 14:14

इस दिल ने बहुत से गम संभाले हुये है
हम वो है जो सबके दिल से निकाले हुये है.

गिले शिकबे नीलाम कर दीये ये सोचकर
की रातों को कहाँ जंगल में उजाले हुये है.

बरसात से भी ज्यादा मुसीबत बरसी खुदा
ज़िन्दगी पे तभी आँखों के घाब काले हुये है.

तुझसा किरदार मिला नहीं इस जहांन में
तभी रजा के हुनर के अंकुर टूटे ताले हुये.

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8 AUG 2023 AT 9:29

दर्द में दवा का कोई दवाखाना ना मिला.
उसे छोड़ के जाने का बहाना ना मिला.

मिल गया बहुत कुछ इस शहर मे हमें.पर
बचपन सा कोई दोस्त पुराना ना मिला.

कोटा है हक मजीफे पे पर जात के नाम
पे आज तक मुझे कोई महखाना ना मिला.

बातें बहुत करते है ये अच्छे दिनों की. पर टुटा
मुझे किसी नेता का कभी आशियाना ना मिला

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