Ankur Thakar   (Ankur Thakar)
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Joined 9 August 2020


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20 MAY AT 10:31

कितनी बार दण्डित और खंडित किया.
मेरे घर से मुझे अवलंबित किया हे खुदा
तुने मुझे क्यों नाम कश्मीरी पंडित दिया.

तोड़ के बस्ती शाख कर दी हस्ती मेरी
राख कर दी लाशो को ना मंडित किया
मुझे क्यों नाम तुने कश्मीरी पंडित दिया.

दो वक़्त की रोटी से भी विलंबित किया.
राशन की कतारों से निलंबित किया हे खुदा
तुने क्यों नाम मुझे कश्मीरी पंडित दिया

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4 MAY AT 7:56

1:
हर गलती की सजा माफ़ी नहीं होती साहब
कुछ गलतियां माफ नहीं की जाती बालिद
2:
सब्र रख ये तुफानी लहरे भी उतर जाएगी
अच्छे की जुबाँ बुरे वक़्त में मुकर जाएगी.
3:
जो जुबाँ का ही पक्का नहीं वो
हिसाब का पक्का कहां होगा.
4:
सुन, यहां कोई किसी का दोस्त नहीं है.
मतलब का सिक्का सबकी जेब में है.
और वो वक़्त वक़्त पे खनकता जरूर है.

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1 MAY AT 12:00

ये नक्श अब बहरे हो रहे है अक्स के जख्म गहरे हो रहे है.

कस्ती छोड़ दी मैंने लहरों के सहारे अब शहरों के पहरे हो रहे है.

शीशे के जैसा बिखर गया तेरे बाद हम अब गुजरे ठहरे हो रहे है.

खैर छोड़िये यहाँ कौन हिसाब देता है
इश्क में जलों को कौन ख़िताब देता है.

नन्हे पैरों में जख्म देख ये समझ आया.
मुफलिसी के हाथों में कौन किताब देता है.

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15 APR AT 9:55

खुदा कहां मरने वाले की रजा पूछता है
बिना बजहा कौन यहां बजहा पूछता है

ज़िन्दगी के टूटे पहियों में हवा भर रहा हूँ
ऐसा क्यों मुझसे ही मेरा सबाल पूछता है.

कच्ची निबं को देख बदला कगार पूछता है
शादी के लिये हर कोई यहाँ पगार पूछता है.

बर्दी वाला हर कोई देश भगत नहीं होता.
बिकने वाला पहले कीमत का इनाम पूछता है

मैं भी था कभी खास ख्याल किसी का.
आज जो हाल किसी और का पूछता है




रजा - मर्जी

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30 MAR AT 13:32

खोये हुये सपने वापिस ढूंढ रहा हूँ
मैं किस शहर में ये अपने ढूंढ रहा हूँ.

ना रहा वास्ता तो तालुक खत्म हुआ .
चिरागो की राख में रोशनी ढूंढ रहा हूँ.

सुन लो एक छोटी सी खता मेरी भी हैं
बेवफा के दिल में पाक वफा ढूंढ रहा हूँ.

किराये के मकां महगें बहुत है शहर में.
मैं दरिया के किनारे कोई घर ढूंढ रहा हूँ.

मीठी बातें हो रही है कोई मलतब है क्या?
बिना काम याद करे वो इंसान ढूंढ रहा हूँ .


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12 MAR AT 11:53

कितना कुछ छुपाकर जी रहे है
हम फिर भी मुस्करा कर जी रहे है. — % &

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10 MAR AT 14:07

दाना खा के भी वो चुप रहता है
पिंजरे में कौन यहाँ खुश रहता है
जो समझे ना बशर दर्द इनका
ऐसे इंसा में कहां खुदा रहता है.

खुद पे ये नुक्सा अजमा के देखना
2 दिन तू पिंजरे में रह के देखना
फिर समझेगा तू धूर्त वन्दे की वो
बेचरा कैसे किस हाल में रहता है.

फिर भी तुझसे मलाल नहीं करता
टूटेगा जाला ये सबाल नहीं करता
तन्हा दुखी परेशान गुमसुम, खुदा
जाने वो ऐसा क्यों बेहाल रहता है.

— % &

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22 FEB AT 11:28

आँखों में आँसू का बोझ लिये फिरते है.
तेरे शहर में तेरा ही दर्द लिये फिरते है.

ये कैसा मंजर गुजर रहा है हालातों से.
लफ्जो में लोग तीखा ख़ंजर लिये फिरते है.

यहां कोई किसी का मसीहा नहीं है दोस्त.
गिराने बुझाने को साथ दवा लिये फिरते है.

एक बाधा करके हमसे दूसरा ना हुआ.
झूठी कसमो में लोग खुदा लिये फिरते है.

दोगले लिबास में किरदार छिपा बैठा है.
हादसों में भी कलाकार हुनर लिये फिरते है.

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31 JAN AT 10:49

1:
हकीम से मत पूछ दवा ए इश्क़.
वो खुद नाकाम रहा मोहब्बत में.
2:
अपने गमों की यूँ नुमाइश ना कर बशर
मुर्दा लाशों में भी फयदा ढूंढ़ते है लोग
3:
कहीं विखरा तो कहीं समेटा गया.
झूठा किस्सा किसी पे लपेटा गया.
खुदा ये कैसा दौर है तेरा.मुर्दो को
भी यहां जिन्दा बता के बेचा गया.
4:
ऊंची उड़ान के परिन्दे कभी.
टहनियों से इश्क़ नहीं करते
5:
बेवफा लफ्जों को कलम से उतारकर. ऐसे
भी मोहब्बत का फर्ज़ अदा करते है लोग — % &

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12 JAN AT 18:13

रंज मेहंदी का कारवां वाखूब सजा था.
उस बाप की फर्ज ज़िन्दगी का आधा
हिस्सा बेटी की बिधाई में लगा था.

पापा की परी अम्मा की लाडो गुड़ीया.
बेटियां इज़्ज़त होती है घर की उसकी
चुनरी पे एक दाग बजुद का लगा था.

हलातों ने समझ को स्याना बना दिया
जाते ही जेवर रख दीये उसने, मानो
जैसे कोई लगान उन पे भारी लगा था.

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