Ankur Thakar   (Ankur Thakar)
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Joined 9 August 2020


Joined 9 August 2020
21 JUL AT 12:24

वफा की तिजोरीयों में अब ताले हो गये
मानो जैसे महलों में लगे जाले हो गये

नये दौर की नजर बदल गई मेहनत की
दूध के लिफाफे मानो जैसे गवाले हो गये.

संस्कृति लुप्त हो रही है मेरे देश की अब.
छोटे लिबास छोटी सोच के लोग हवाले हो गये

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16 JUN AT 10:49

मुद्दत हुई खबर आये हुए, हम आज
भी इंतज़ार में है सब्र लगाये हुए.

इश्क ने असल में अल्फाज बदल दीये.
कई साल हो गये खुद से नजर मिलाये हुए.

खुदा तेरी बंदिश से फासले हो ही गये
दर बद्र घूमते हम खुद को गवाये हुए.

तेरे गुनाह की क्या सजा मुकर्रर करूं.
दुनिया से परे गये सब रिश्ते निभाये हुए.

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28 APR AT 15:43

1:
जुमले की दौड़ में हम हिस्सा नहीं लेते
सुनाया हुआ किसी का किस्सा नहीं लेते.

2:
निगाहों के जैसी बदलती अख़बार देखी है
बहुत करीब से मैंने ये दुनिया बेकार देखी है.

मतलब के वक़्त प्यार की भरमार देखी है
निकल जाते ही जहर बेचती सरकार देखी है.

3:
रुतबे रुबाबों को देख के होली लगती है.
अब यहाँ ख़िताबों की भी बोली लगती है.

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8 APR AT 10:55

शायरी में भी लफ्जों का कारोबार देखा.
तारीफ के बदले तरीफ का ब्यापार देखा.

दिल को छू ले बातों से फर्क नहीं पड़ता.
झूठी तबियत का शरगिर्द ये संसार देखा.

हालातों की ज़मीं में ना नमी का श्रृंगार देखा
लतीफों में एक ही वाह वाही का कगार देखा.

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17 MAR AT 12:10

हुकम ए- गुलाम के लफ्ज महान नहीं होते
टूटी तलबारो के हिस्से म्यान नहीं होते.

मेरा हकीम हाल अब लफ्जों से पूछता है.
उजड़े औधों के कभी खास ध्यान नहीं होते.

इल्म-ए -उजाला विकता दुकानों में देखा है
ज्ञान बेचने वाले सभी को ज्ञान नहीं होते.

दलीले बदलने से हक़ीक़त नहीं बदलती .
हर बार गबाही के ब्यान में ब्यान नहीं होते.

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24 FEB AT 12:39


वक़्त सही होता तो फकत लिखता
तेरे इश्क को सुखा दरख्त लिखता.

पतझड़ गुजरी और तुम बहार में हो.
तेरे साथ को मैं टुटा तख़्त लिखता

तबज्जो मिल ना पायी खलल को मेरी
तेरे गुजरे वक़्त को कैसे वक़्त लिखता.

रिश्ते झूठे निभाने नहीं जलाने वाकी है.
बेवफा जुबाँ के कैसे उसूल सख्त लिखता.

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28 JAN AT 11:05

आदाब मियां क्या सवाल लिखते हो.
इश्क को खता बेवफा को हलाल लिखते हो.

होता भाई मेरा तो दिल ए गम खोल देता
फिर किसके लिये तुम ये मलाल लिखते हो.

नफे के नेबले नुक्सान का सौदा नहीं करते.
जो समझ ना आये क्यों वो कमाल लिखते हो.

लफ्जो की मिठास का जहर उतरता नहीं.
तुम खुदा के शोर को भी ववाल लिखते हो.

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20 JAN AT 16:31

रात भर दीये की तरहा जला कोई
फिर भी कहां पूछे हाल भला कोई.

मरे जमीर की झूठी जुबाँ विकती है.
काश मुझमें भी होती ऐसी कला कोई.

लफ्जों में हसीं सिमट के ही आती है.
बेबसी से बुरी देखी नहीं मैंने बला कोई.

सुखे दरिया को कहां पूजते है लोग.फटे
बजूद को हसने नहीं देती खला कोई.

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27 DEC 2023 AT 8:26

आशिक़ को मोहब्बत में शुकराना नहीं आता
फीके रंगों के हिस्से कभी नजराना नहीं आता.

यूँ ही नहीं लिपटे होते जुगनू शमा की लट्टो से.
उन्हें बिछड़ कर कभी गम भुलाना नहीं आता.

नाकाम रहा हूँ मैं इश्क में, की खुशी के दर पे
छोड़ा उसे, फिर मुझे मुस्कराना नहीं आता.

गम ऐसे है तेरे प्यार के कोई जीते जी मर जाता
रोज चुबती है चाहत फिर भी मुझे बहाना नहीं आता.

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9 DEC 2023 AT 12:52

1:
मोहब्बत के उमर भर रंग फीके ही रहेंगे
जब तक तेरी जेब में खनकते सिक्के रहेंगे.

पगार पुछ कर औकात नापते है लोग.
ये व्यापार ज़िन्दगी भर यूँ ही चलते रहेंगे.

2:
सब कुछ लूट गया फिर भी सफर में हूँ.
एक मंजर गुजर गया दूसरे की नजर में हूँ.

3:
लहजे भरे ख्वाब आज परिंदो में बाँट आया हूँ.
गांव की मिट्टी हाथ में लेके बहुत मुस्कराया हूँ.


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