Ankur Thakar   (Ankur Thakar)
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Joined 9 August 2020


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17 SEP AT 13:00

लिखूं कोई खता तो मुकाम भूल जाता हूँ.
शाम होते अपना ही मकान भूल जाता हूँ.

जाम की शाम में तेरा ही नाम भूल जाता हूँ
मैं हर बार परखना इन्सान भूल जाता हूँ.

वक़्त के रंगों का कभी गुमान भूल जाता हूँ.
खाली जेब ख़रीदना सामान भूल जाता हूँ.

लफ्जों में शहद जुबाँ का जहर भूल जाता हूँ .
काली सोच का मैं काला ईमान भूल जाता हूँ.


पिंजरों में देख परिंदो को मान भूल जाता हूँ
जमीं का चुकाना कर्ज लगान भूल जाता हूँ

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31 AUG AT 11:04

आप एक Middle Class Family से थे.
पर English वाह कमाल है आपकी, कैसे?

वो क्या है ना साहब वक़्त के तमाचे और
ज़िन्दगी के तमाशे बहुत कुछ सीखा देते

We are all travellers so keep
changing the station for a new height to shine.

One Day people called it's success My Friend.

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15 AUG AT 10:56

आज 15 अगस्त है तो तिरंगा दिखेगा
लोगों कि सोच में फिर से झंडा दिखेगा

दिन में कहीं सियासती दंगा दिखेगा
हर नेता हर वक़्त इमां से नगां दिखेगा.

हिफाजत जान दे कर रहे है वो देश की.
कब तक मरता वो खून से रंगा दिखेगा.

देश हित कि बातें लिखा कर बोलते हो.
कुर्सी वास्ते गजें कि जेब में कंगा दिखेगा

खुदा दिलों में है मंदिरो मस्जिदों में कहां .
हिन्दू मुस्लिम सदा ना समझ अंधा दिखेगा

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28 JUL AT 10:48

सौदा करके माकाँ बेच दिया.
दादा की ताउम्र गुजरी थी जहां.
मरने के बाद वो इंसाँ बेच दिया.

खरीदने आए पेशेवर कैसे कैसे.
जहाँ कीमत ज्यादा मिली वहाँ.
बेचने वाले ने ईमाँ बेच दिया.

छाया कम हो गयी ज़मीं से मेरी.
मेरे हिस्से ना जाये रुख वो कहीं.
ताऊ ने मेरा वो अरमाँ बेच दिया.

गैरत बेच के फिर शहर जाना था.
वफा बेश कीमती थी जिसकी
जाते जाते वो बेजुबाँ बेच दिया.

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5 JUL AT 11:03

1:
कोई जैसा रंग कहे भर दूँ पनों में.
पर ये तेरी आँखों का काजल तो नहीं.
2:
कर कोई बाधा फिर से दिल में उतर जाऊं.
सियासत थोड़ी हूँ जो जुबाँ से मुकर जाऊं.
3:
तेरी इश्क कि बसीयत संभाल रखी है मैंने .
कभी मन करे तो अपने नाम करा लेना.
4:
बेवफा शहर में वफा बेच रहे हो
इश्क के मरीज हो क्या Ankur .
जो मुर्दा शहर को कफ़न बेच रहे हो

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19 JUN AT 11:19

वजुद ने पूछा परखा अन्दाजा मेरा.
भरा ज़ख्म फिर हो गया आधा मेरा.

मिठे लफ्ज खूब शातिर है देश में मेरे
अर्जा गैरत की, जान ना सकी ईरादा मेरा.

क्या खरीदूँ मै गिरवी रख के ए- खुदा.
जूते जैसा फटा जरूरत का लिफाफा मेरा.

भूख ने दम तोड़ दिया किनारे पे साहब
रैली के जैसा कहां निकला जनाजा मेरा.

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2 JUN AT 11:43

लफ्जों में खता रख, गले का हार नहीं हूं.
जीत की तलब हूं, किसी का यार नहीं हूं

उम्दा गजब शायरी ये हुनर कहां किसी का.
ये लफ्ज सब रहमत के, मैं कोई सार नहीं हूं.

जमीर से ईमां तक बहुत सौदे किये तुमने
सौदा मैं भी हो जाऊं गर कोई बाजार नहीं हूं.

फूल लेके मिलने जुलने मत आया कर दोस्त .
ज़िन्दा हूं अभी बशर मरा कोई मजार नहीं हूं.

शादी इश्क की गम मोहब्बत का नाच उठा .
शौक से नाचता हूं पर कोई नाचार नहीं हूं.

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17 MAY AT 11:25

किस्त भरते भरते तेरी ज़िन्दगी.सकूं का
कहीं मेरा वो कच्चा मकांन नहीं मिला.

बिकबाली में कट गये पेड़ ज़मीं के. फिर
मेरे आँगन में मुझे वो नादाँन नहीं मिला.

शामों शहर जिसका ही ख्वाब देखा मैंने
सपने में भी मुझसे वो इंसान नहीं मिला.

कह रहा कोई के खस्ता हूँ ख्याल मै भी.
वफा के काबिल कोई ईमान नहीं मिला.

इल्जाम शहर पर तलाशी हमारी भी हुई.
दो वक़्त की रोटी का मेरे घर में उन्हें
सामान नहीं मिला.

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29 APR AT 10:57

अमीर अपनी कामयाबी के किस्से
और काली कमायी को गिन रहे थे.

साथ में बैठा फकीर अपने हिस्से की
रोटी किसी भूखे को देके चला गया.

खुदा के घर का मजहबी नहीं था वो
तभी आँखों में खुशी देके चला गया.

गिर चुके है खुदा की नज़रों से वो लोग
वो परिंदा पिंजरे में जां देके चला गया.

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8 APR AT 10:58


वसीयत हस्ताक्षर मांग रही है.
गांव के मुहल्ले में शहर वालों
हम अनपढ़ है कहां कर पायेंगे.

पेशा होगा ये शहर में तुम्हारा क्यों?
पैसे से बस्ती खरीदने चले हमारी.
ये इमां वाले है सहाब कहां बेच पायेंगे.

अंगूठा लगा देते हम अगर
स्याही ये मिलाबटी ना होती .
मरा जमीर, गजब बाधे पे
हम वाह कहां कर पायेंगे.

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