Anil   (अनिल)
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जिस दिन लिखना भूल जाऊंगा, उस दिन जीना भूल जाऊंगा।
Joined 22 October 2017


जिस दिन लिखना भूल जाऊंगा, उस दिन जीना भूल जाऊंगा।
Joined 22 October 2017
Anil 10 DEC AT 12:42

"वक़्त की आदत"



कैप्शन में पढ़े पूरी कहानी...

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Anil 7 DEC AT 15:40

मेरे हक़ीम ने नुस्ख़े में तेरा नाम लिख दिया
दवा की जगह मिलना सुबह दोपहर शाम लिख दिया,
एक तू, जो मशरूफ़ है अपने ही कामों में
एक मैं हूँ, जिसने तआरुफ़ में मोहब्बत ही अपना काम लिख दिया,
वक़्त पे खाना और सोना वक़्त पर पसन्द किसे है अब
मैंने तो हर शाम के नाम अब जाम लिख दिया,
ये शोहरत ज़माने की नज़र में मुबारक हो तुम्हे
मैंने खुद को अपनी ही ग़ज़लों में बदनाम लिख दिया,
तेरे बदन से पहले छू लेना है दिल तेरा
मोहब्बत में इंतेज़ार का कुछ ऐसा इंतज़ाम कर दिया,
मरते दम तक कोशिश रहेगी तुझे अपना बनाने की
नाकाम रहे तो अगला जन्म अभी से तेरे नाम लिख दिया,
तू बस पलकें झुका कर इज़हार को पुख़्ता कर
मैंने तो पहले ही अपने हिस्से का काम कर दिया,
दो चार नज़्मों में मोहब्बत समायेगी कैसे
जब तक लिखूंगा हर एक हर्फ़ तेरे नाम लिख दिया..

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Anil 3 DEC AT 11:02

"बेटे की विदाई"
"सोशल एटिकेट्स"... हाँ, बिल्कुल यही शब्द है, जो "तुम्हे कुछ नही आता" से पीढ़ी के साथ साथ "तुम्हे जरा भी सोशल एटिकेट्स" नही है में तब्दील हो गया।
5 बहनों में सबसे छोटी, गरीब परिवार की उस बेटी को जाने कैसे शहर के सबसे मशहूर वकील साहब ने अपने बैंक मैनेजर बेटे के लिए पसन्द कर लिया, घर की सबसे छोटी बहू, सारा काम और काम के बाद का उलाहना सिर्फ उसके कंधों पर, ये समझते कुछ ही साल लगे कि कामकाजी सदस्यों के उस परिवार में उसकी जगह काम वाली बाई से अधिक कुछ नही।
समय समय पर उसे उसके मायके की स्थिति और उस परिवार के लायक ना होने का अहसास करवा ही दिया जाता, मगर बच्चों में दिल लगा चुकी उस आधी स्त्री आधी पत्थर को अब फर्क पड़ना बन्द हो चुका था,
बच्चे..... उनकी भी गलती नही, खून का असर आना ही था, बढ़ते बढ़ते एक नया शब्द सुनाने लगे, "माँ, आपको जरा भी सोशल एटिकेट्स नही है"!
लेकिन अब वो सीख रही थी, बेटी की विदाई पर छुप छुप के ही रोयी थी, इनके स्वर्गवास पर भी दिल मे छुपा दर्द कम ही बाहर आने दिया, मगर आज...
बेटा बहू के साथ विदेश सेटल हो रहा था, हमेशा के लिए, पीछे रह जाती है वो अकेली, ऐसे में रोना है या बेटे बहू की खुशियों में खुश होना चाहिए, कौनसा सोशल एटिकेट होगा, बताने वाला इस विशालकाय घर मे कोई भी नही....

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Anil 29 NOV AT 13:20

मोहब्बत दोबारा भी हो सकती है ।





कैप्शन में पढ़ें पूरे अहसाह...

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Anil 25 NOV AT 10:56

तू बेशक़ ले तलाशी मेरे ज़ेहन की
शर्त है मेरी, तेरे ख्यालों के सिवा कुछ ना मिलेगा..

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Anil 22 NOV AT 22:31

"हेल्लो माँ ! हम कल आ रहे हैं, मेरे एक दोस्त के यहाँ गृह प्रवेश का फंक्शन हैं, अपने यहां से थोड़ा आगे, आप ऐसा करना बायपास की तरफ आ जाना, बच्चे मिलने की जिद्द कर रहें है, वहीं किसी अच्छी जगह सब साथ मे चाय पी लेंगे', उसने एक सांस में बात कम आदेश ज्यादा सुना डाला।
"ठीक है बेटा, पर वापिस अगर रात को ना निकलो तो घर ही आ जाना, सुबह जल्दी चले जाना, बच्चे और बहू के आने से घर मे भी रौनक हो जाएगी".... आवाज़ में हक़ कम मिन्नत ज्यादा थी।
"अरे नही माँ, रुकेंगे तो वहीं ही, उसने होटल में स्टे फिक्स किया हुआ है हमारा, और वैसे भी घर मे कहाँ एडजस्ट होंगे" ?
समझाइश, प्यार और अपनेपन के दौर तो पहले ही पीछे छूट गए थे, सो बात ज्यादा लम्बी बढ़ाना ठीक ना था।
उसने "ठीक है, बेटा" कहकर फोन रख दिया, चश्मा उतार कर आँखे पौंछते हुए, बरामदे में लगी दिवंगत पति के फ़ोटो की तरफ़ माफ़ी मांगते हुए हाथ जोड़े।
मकान बनाते समय उनकी एक "स्कूटर" लेने की इच्छा थी।
पर वो ही ना मानी, "सब बच्चों का एक एक कमरा होना चाहिए, माना दूसरी जगह नौकरी करते हैं, पर कभी रात बेरात आएं तो जगह कम नही पड़नी चाहिए किसी को भी"....

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Anil 22 NOV AT 15:02

मेरा क़त्ल भी शर्मसार कर जाएगा तुम्हे
ए मुसीबतों !
के मैं निहत्था था और तुम झुंड में...

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Anil 22 NOV AT 13:10

ख़्वाहिशें तो शबनम की बूंदे सी है
मुफ़लिसी की धूप में उड़ जाती हैं,




जरूरतें हरी पत्तियों सी हैं
ना जाने कैसे हर रोज इतनी बढ़ जाती है...

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Anil 20 NOV AT 11:18

"अरे क्या हो गया, इतनी सी देर में लँगड़ा कैसे बन गया" ?
"पांव सो गया है, उकड़ू बैठने से..... कितना अच्छा होता ना, ऐसे ही शरीर के अलग अलग हिस्से थोड़ी थोड़ी देर सो लेते, काम चलता रहता,
और थकते भी नही, चैन से सोना तो वैसे भी नसीब में कहाँ,
बस इतना सुकून है कि घरवाले तो चैन से सो रहे हैं"....
खाड़ी देश के सुदूर इलाके में रेगिस्तान के बीचों बीच किसी शेख़ के बगीचे में लगभग 50 डिग्री के आसपास तापमान में टमाटर तोड़ते हुए, दो भारतीय मज़दूर आपस मे बात कर रहे थे, चिलचिलाती धूप, दूर दूर तक इंसान का साया नही, ऐसे में आपस की ये बाते ही एक दूसरे का सहारा थी।
"याद है तुझे, वीज़ा के इश्तेहार में क्या लिखा था, होटल में कपड़े प्रेस करने है,
अच्छी सैलेरी, जुम्मा पक्का, और अब देख टमाटरों को इस्त्री की जा रही है"...
"इस्त्री"... दोनों जुबान से एक साथ नाम निकला, और जोर से हँसे, दर्द ठहाकों में छुप गया, आँसुओ ने तो पसीने के पीछे छुपना कब का सीख लिया था...

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Anil 19 NOV AT 10:28

कॉलेज के दिन....





कैप्शन में पूरी कविता पढ़ें.

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