Akhand Pratap Singh   (@yourakhand)
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Joined 6 July 2020


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27 MAY AT 22:33

जब बिच भवँर में फसी हो नाव और दूर किनारा लगने लगे
जब ना संभले संघर्ष की कश्ती और ख्वाबों का सूरज ढलने लगे
जब उठे निराशा की आंधी और उम्मीद की ज्वाला बुझने लगे
जब हिम्मत तुम्हारी हार रही हो और घनघोर अंधेरा दिखने लगे
तब एक पल को तुम रुक जाना
क्या खोया क्या पाया से पहले थोड़ा मुस्कुराना
ये वक़्त तुम्हारा ही है और कुछ तुम्हे सिखाने आया है
है मृत्यु झूठ,जीवन ही सत्य ये बात बताने आया है
खिलने है हजारों फूल जीवन मे,अनुभव का कमल खिलाने आया है
तुम हो ,तुम्ही सच्चाई हो ये स्मरण कराने आया है
ये वक़्त तुम्हारा ही है ,हां मजबूत बनाने आया है।
ये वक़्त तुम्हारा ही है ,हां मजबूत बनाने आया है।।

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12 MAY AT 1:07

ऐसा लगता है पर है नही
मैं जो आज हूँ वही कल रहूँ ,कोई तय नही!!

मुश्किलें लाख आएँगी तो आने दो
हारना होगा हार जाऊंगा खुशी से
पर पहले किस्मत तो आजमाने दो।
दरिया तो खुद जिंदगी है
डुबाये या पार लगाये
जो अब इसमें उतर ही गया हूं तो हाथ पैर भी चलाने दो।
ज्वाला सी गर्मी है भीतर थोड़ी शीतलता आज चुराने दो।
मत रोको मुझे कोई भी,
आज खुद को मुझे आजमाने दो।
हारना होगा हार जाऊंगा पर,
जीत की एक बाजी आज लगाने दो।
जीत की एक बाजी आज लगाने दो।।

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12 MAY AT 0:23

जिंदगी लाशों की...

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1 MAY AT 16:18

जख्म,चोट,हार,जीत
यही गीत,यही रीत।
कर्म,दायित्व, गलती,ग्लानि
चंद शब्द और पूरी कहानी।
अभिमान,अहंकार,कुकृत्य,तिरष्कार
क्रम यही,ये अनुभवों के प्रकार।
भोग,योग जैसे अंधकार, प्रकाश
दोनो जरूरी,पर ना एक साथ।
आध्यात्म,दान,मदद या इनाम
मोक्ष यही,यही चारो धाम।
स्मृति,विस्मृति, सुख और मलाल
सरल यही एक सत्य विशाल।
धन,वैभव,अल्प या पर्याप्त
सबकुछ खत्म,जिसका जीवन समाप्त।।

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13 APR AT 15:19

काल के इस भवँर में
कठिनाइयों के इन प्रहर में
कर्तव्य को सारथी मान
लक्ष्य के अनमोल पथ पर
अब बिन रुके,मैं चलूँगा
आरम्भ जब मैंने किया
तो अंत भी मैं ही करूँगा।

सिर्फ योजना नही अब युद्ध होगा
मनस भी मेरा शुद्व होगा
गलतियों से सीख लेकर
मुझे रोकने वाली खुद की बुराइयों से
अब बिन रुके मैं लड़ूंगा
आरम्भ जब मैंने किया
तो अंत भी मैं ही करूँगा।।

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8 APR AT 22:15

स्याह रातों ने सिखाई है जो बातें तुझको
क्या दिन का उजाला वो बातें सिखा पाता!!

जो गुनाह हुए वो जरूरी थे,मेरे भाई
वरना इस रंगीन दुनिया मे,सफेद जीवन लिए तू कहाँ जाता।।

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16 MAR AT 15:00

ऐ सर्प ये दर्द बर्दाश्त क्यों
विष है डसना आता है तुझको
फिर मौन बैठा तू आज क्यों।

ऐ मनुष्य ये सर्प उदास क्यों
न काटा इसने किसी को बेवज़ह
फिर इसके वंश का आज सर्वनाश क्यों।

ऐ विधाता तुझसे ये आस क्यों
तूने ही चाहा सर्प का मरना
फिर मारने वाले के सिर पर उसका पाप क्यों।

ऐ वक़्त बता ये विनाश क्यों
लाखों मौते होती है यहाँ
फिर एक और का इतना,आज एहसास क्यों।।

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20 FEB AT 0:25

बहुत खयाल रखती थी मेरा, वो सितमगर
तभी तो रुख इल्जामों का,अपनी तरफ मोड़ गयी वो।

मेरी तो सिर्फ सूरत,उसकी तो सीरत भी प्यारी थी
यूँ ही नही सबके आंखों का कफन ओढ़ गयी वो।

ना हो बेईमानी किसी गैर के साथ,मौका मिले सबको
ये कह कर उस रोज रिश्ता तोड़ गयी वो।

कुछ इस तरह से टूटते दिलों को जोड़ गयी वो
मेरे छोड़ने से पहले ही मुझको छोड़ गई वो।।

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17 FEB AT 1:22

कह दो ना जो भी कहना चाहते हो तुम कुछ दिनों से,
दूर ही तो जाओगे मेरे दिल से तुम
पर बेवजह किसी दूसरे की तुम जगह तो न लोगे।
हर बात पर रुठ जाते हो बताओ सज़ा कितनी दोगे,
तुम्हारे गुनाहों के बारे में पूछूँ अगर,तो वजह कितनी दोगे।

अरे तुम कहो तो सही, साफ-साफ एक एक बार ये कि,
नही मुकम्मल हो सकता है अब इश्क़ हमारा।
बहुत दूर चला जाऊंगा मैं तुमसे उसी पल,
अब हर बार तो नही कर सकता मैं इंतजार तुम्हारा।

तुम्हारे लिए तो खेल है आशिक़ बदलना
सच्चे प्यार का देखा ही कहाँ तुमने कोई नज़ारा।
क्या होगा मेरा,
ये सोच कर मत ज़ाया करना तुम थोड़ा भी वक़्त तुम्हारा।

अरे मैं उनमे से नही जो मान कर बैठे है यहां कि,
इश्क़ किसी और से नही हो सकता दुबारा।।

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9 FEB AT 16:15

जो लोग खुद से रोज जंग लड़ा करते है,
यक़ीनन,हासिल वो जीवन मे कुछ बड़ा करते है।

यूं ही नही मिल जाता सबकुछ उन्हें
आग में तप कर हर रोज वो,अपनी मूरत खुद गढ़ा करते है।।

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