Akanksha   (आकांक्षा)
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for conversations, random memedrops or even gossip:

akanksha.prakash011@gmail.com
Joined 26 April 2017


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14 OCT AT 13:58

ट्रांसफर के परवानों से त्रस्त है,
विस्थापन के हालातों से पस्त है।
फिर भी हमारा रिश्ता हर साल नये शहर आता है,
मैं और तुम गुज़र जाते हैं और समय ठहर जाता है।

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1 OCT AT 9:15

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24 SEP AT 8:59

बरसात के लिए मेरा लालच कभी-कभी विनाश‌ को आमंत्रण देने के बराबर हो जाता है, जैसे सूखे सावन से पगलाया मोर तांडव करने लगे तो देवता उसपर प्रसन्न नहीं होते, दंड देते हैं कि "मर! तू क्यों अपने स्वार्थ में सबका नाश करने पर तुला है? भारी बरसात तुझ अकेले की मुक्ति होगी, दूसरे क्यों डूबें?"
पर मोर मानता नहीं, नाचता ही जाता है कि अब बादल फटेगा और उसे बहा ले‌ जाएगा। निगले हुए आँसू उसकी आवाज़ भिगो दिया करते हैं, आकांक्षाओं के कच्चे मकान धड़ल्ले से धराशायी होते हैं‌ और कगार पर जितने सवाल खड़े थे, सब टूट-टूटकर तेज़ प्रवाह में विलुप्त हो जाते हैं। इस प्लावन से मोर का कण्ठ लबालब भर जाता है, एक बेशर्म आत्मा ग्लानि में ‌डूबती-उतरती रहती है।‌

बाढ़ प्रकृति का विकराल रूप है,
मनुष्य का भी।

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22 SEP AT 1:45

सीली-सी कैद‌ में हूँ पर खिड़की से धूप आती तो है,
फर्श पर पड़े मेरे फटे पन्नों से बासी हूक आती‌ तो है,
नाउम्मीदी के सहारे जीता चलूं ये मरने‌ से तो बेहतर है,
मिलने आती है रिहाई, थाली में थोड़ा झूठ लाती तो है।

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17 SEP AT 8:16


और हम चाहते हैं कि हम सब कुछ हो जाएं, यह भी-वो भी... सब कुछ जो दुनिया को समझ आ‌ए और हम अपने अधूरेपन को अजनबियों की तारीफ़ों से भर लें, क्या पता इसी से अगली सुबह आँखें खोलने का कारण मिल जाए पर, क्यों खोलनी हैं? क्या है ऐसा जो‌ आज नहीं हुआ और कल हो जाएगा? परिस्थितियां बदल सकती हैं, सब अच्छा हो सकता है लेकिन सालों से जिस खालीपन को हम-तुम घसीट रहे हैं वो लहुलुहान होकर भी हम पर हँस रहा है। झंड हो कर हम‌‌ इसे और अधमरा कर डालते हैं, सब के‌ सामने उघाड़ कर रख देते हैं कि आओ! जो हमसे बचे उसकी कसर तुम निकाल दो पर इस रिक्त स्थान ‌को भर‌ दो।
पर ब्लैक-होल का सिद्धांत पता है न?
उसे भरा नहीं जा सकता, न समय से, न किसी की बातों से, न आध्यात्म से न खुद के अस्तित्व से...वो वक्त के साथ बड़ा होता ही जाएगा, यही उसकी प्रकृति है।

जब भीतर-बाहर सब शून्य है, तो क्यों खोलनी हैं आँखें फिर?

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14 SEP AT 13:12

बहुत दिनों का पानी ठहरा, सड़ गया यह पात्र यहीं,
दरारें पड़ रहीं अंदर से, उखड़ी मिट्टी की परतें कई।
काला हुआ जाता है मन जो साफ़ गेरुआ था कभी,
भीतर‌ गल-गल गिरता मैं, बाहर चिकना घड़ा सही।

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1 SEP AT 23:35

"...हवा में अजीब-सी पर जानी पहचानी महक है, जैसे स्कूल बस छूटने वाली हो, कुछेक मिनट के पीछे।"


(पूरा लेख अनुशीर्षक में पढ़ें)

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27 AUG AT 18:13

अकथ्य के भार से
अब ज़ुबान ऐंठती है
आशाओं की सारी नमी
पुतलियों पर जमती है
सो रहा हूँ अपलक,
अचेत हूँ, पर सुनता हूँ तुम्हारी हिचक
चले आओ, अवसान से पहले देख लो,
कैसे निगल रहा मुझे यह तमस
ठंडी देह में कैद धधकता अन्तर्मन,
धीमे नि:श्वास से उठती है ऊमस
ये मैं,
वो मेरी शिकस्त।

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31 JUL AT 13:12

Do you remember the teletubbies' sun baby?
That cackle? Golden rays of absolute happiness?
The baby grew up to be Payal Wadhwa for the world around her, which includes me now, luckily!
Talking to this girl radiates mega bestie energy, reading her is as joyful as listening to her chuckle over the poorest jokes you crack.

In one heck of a complicated world, she's an innocently simple soul, a rare gem, the one with sweet chocolate filled inside and also the one that sparkles, shines and is an asset. She can turn your stars over, so don't hurt her.

Happy birthday, sunshine 🌞

-Akanksha

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4 JUL AT 18:56

मर जाओ उस दहलीज़ पर
जिस पर बैठने‌ वाले
पचहत्तर सालों से
खून‌ के धब्बे
तमगे की तरह पहनते आ रहे हैं
अधकचरे तर्कों का पुलिंदा
या सरकारी दफ़्तर का बंदा,
याचना का गला पकड़ लेता है
याचक की विवशता जकड़ लेता है
जहाँ धूल उड़ती ही हो इस मकसद,
कि ढँक जाये बड़े-बड़ों की बरकत
न इरादों की हरकत,
न हरकतों का जमघट
न्याय तो कोई तौलता नहीं,
भीतर भी कुछ खौलता नहीं
यह रोग है,
भयंकर
जब सब की नसों में
खून की कमी हो जाती है।

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