हुनर की चुप में शोहरतें बसाई जाती हैं,
कभी-कभी सादगी भी सुनवाई जाती है।
हर शख़्स जो बोले, वो ज़रूरी नहीं 'हक़' हो,
अक़्ल को अक्सर ख़ामोशी सिखाई जाती है।
झुकना अगर हो खलूस से तो इनायत है,
वरना ज़मीर की बोली लगाई जाती है।
आइनों से डरना क्या, अगर चेहरा साफ़ हो,
मगर दाग़ लेकर सूरतें सजाई जाती हैं।
हर लफ़्ज़ में गर हो फ़िक्र का नूर थोड़ा,
तो तहरीर भी तहज्जुद सी पाई जाती है।
जब लहजा झुक जाए, बात दिल तक जाती है,
वरना ज़ुबां से सिर्फ़ रस्म निभाई जाती है।
जो इल्म में हो, उस पर घमंड कैसा ‘जनाब’?
ये नेमतें भी आमतौर पर आज़माई जाती हैं।
‘आबिद’ जो हक़ पे चले, तो चुप भी असर करे,
दुआएँ उसकी रूह से लगाई जाती हैं।
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आवाज-ए-हक़ के लिए लगाता रहूँगा सदा !!
वो दौलत भी किस काम की, जो दिलों को तोड़ दे,
जिससे रोटी तो आए, पर रिश्ते भूखे रह जाएं।
आबिद, कमाई बड़ी नहीं, कमाया हुआ सुकून बड़ा है,
वरना तो लुटेरे भी ख़ज़ानों से लदे रहते हैं।-
एक ऐसा सफ़र...
जहाँ तन्हाई कोई कमज़ोरी नहीं,
बल्कि ख़ुद-शिनासी की एक नई मंज़िल है।-
अब जब वक़्त से बात करता हूँ,
तो जवाब आता है —
तू अकेला नहीं, तू 'आबिद' है...
वो जो ज़ख़्मों को भी जज़्बा बना देता है,
और तन्हाई को भी तालीम का ज़रिया!"-
साँप का ज़हर तो सिर्फ़ जिस्म को नुकसान पहुँचाता है,
मगर मुनाफ़िक़ की फितरत रूह तक ज़हर घोल देती है।-
कुछ लोग उस मौसम की तरह होते हैं,
जो कब बदल जाए,
कोई भरोसा नहीं कर सकता।-
मजबूरियाँ भी इंसान को रंग बदलने पे मजबूर करती हैं,
वरना कौन अपने असली चेहरे से मुँह मोड़ता है।-
"रमज़ान का रुख़्सत होना अफ़सोस की बात नहीं, अफ़सोस तो तब है जब हम इसकी बरकतों से महरूम होकर दोबारा ग़फ़लत की राह पर चल पड़ें!"
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"नजासत कपड़े को लगे या कपड़ा नजासत को, नापाक कपड़े को ही होना है।
इसलिए नजिस लोगों से दूर रहो और नेक़ों की सोहबत इख्तियार करो।"-
एक ज़रा सी बात पे बरसों के याराने गए !
अच्छा हुआ कुछ लोग तो पहचाने गए !!-