Aastha Pujari   (Aastha Pujari)
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Joined 10 February 2021


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18 JUN AT 1:30

Your worries become curse for me
Your words become arrows for me
It becomes typical when
Your burden is my 'I love you'
My existence become naive for you

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17 JUN AT 17:47

ज़ख्म भरती इन बाहों से ज़रा बिछड़ने का गम तो पूछो ?
धागा जोड़ती इन धड़कनों से ज़रा हाल-ए-दिल तो पूछो ?
यादों के कपड़े बुनते इस दिमाग से ज़रा इसकी दास्तां तो पूछो?
खिड़की से झांकती इन आँखों से ज़रा इंतज़ार का दर्द तो पूछो?
पूछो इन हाथों से उसके प्रियतम का स्पर्श कैसा था?
गर हिम्मत हो ,
तो अतीत में बहती उन साँसों से उनका राज़ तो पूछो?

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16 JUN AT 21:13

Some poems are eikons,
Like existence.
Some poems are emotions,
Like sensation.
Some poems are menancing,
Like veiled longing.
Some poems are facade,
Like a silent sufferer.
Some poems are dawn,
Like a mourner.
Some poems are destiny,
Like the radiant joy.
Some poems are.........

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18 FEB AT 21:11

मैं क्या लिखूँ ?
(Read in the caption)

- आस्था पुजारी















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19 JAN AT 18:59

BLOODTHIRSTY WAR
Running from the army of deadly beasts,
I entered the forest of corpses fallaciously.
The fruits of memories hanging around,
The leaves of fear withering on the ground.
This labyrinth of sorrow was full of trees,
As the smallest trees were for sacrifice,
The tallest were for experimenting alive.
The blood began to shower from the sky,
I took the shelter in the cave nearby.
The trees began to shout loudly,
My naked body began to shiver soundly.
The cave seemed silent; I thought it was brave,
But all the myths broke when I realized it was in pain.
With the loud voice of siren;
the warm air then began to fade,
With the fading breath of lifeless cave.
I mourned for an hour silently,
Then continued my journey courageously.
-AASTHA PUJARI

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13 NOV 2024 AT 18:10

चेहरा वहीं, दिल वहीं, मगर अल्फ़ाज़ और धड़कनें बदली है,
शख़्स वहीं, नाम वहीं, बस आशियाने की जगह बदली है,
निर्जन धड़कनें सवाल करें हमसे की आस्था और क्या बदला हैं?
हमने जवाब दिया कि -
राह ताकतें उन निगाहों की राहें बदली हैं।।

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12 NOV 2024 AT 10:42

पुकार लो मुझे, सवेरे से रात न हो जाए कहीं ,
सूरज की किरणें बादलों से न छिप जाए कहीं,
बसंत में मेघ न बरस जाए कहीं,
पुकार लो मुझे, वक्त घोड़े की चाल न अपनाए कहीं।।

भटकती धड़कने मेरी, तेरे यादों के डूबते इस शहर में,
रास्ते अनेक है मगर नक्शे में तू नहीं,
साया तेरा भटके इधर, मगर मुझसे कभी टकराया नहीं,
वादा रहा हमारा तुमसे
आखिरी बार पुकार लो मुझे,
रोशनी इन आँखों से गायब न हो जाए कहीं ।।

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9 NOV 2024 AT 18:12

यूं बादल बनकर नज़रें बरसने लगीं हैं
हर बूंद मानो जैसे दर्द की कली को चूम रही हैं
उदासी की महक घेरे वातावरण को
सारी खिलखिलाती कलियाँ अब मुरझाने लगीं हैं
- आस्था पुजारी

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8 NOV 2024 AT 22:55

ये नज़रें हैरान करतीं हैं
आँखों में बरसात लिए हमें गुमराह करतीं हैं
इल्म है इन्हें सम्मोहन का
तभी तो
पलकों के तले अपने इरादें छुपाए रखती हैं
ये नज़ाकत इन नज़रों की हैरान करती है
वक्त के साथ साथ आकार बदलती है
देखों तो ज़रा पर्दा हटाकर
तभी पता चलेगा कि
ये नज़रें कैसे जज़्बादों का खेल खेला करतीं हैं

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3 NOV 2024 AT 21:17

मिट न जाए साया तेरा इन धूप की किरणों से
आ छुपा कर रखलू तुझे मैं इन बाहों में कहीं

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