आदित्य राघव   ('राघव')
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कभी साया है कभी धूप मुक़द्दर मेरा
होता रहता है यूँ ही क़र्ज़ बराबर मेरा
Joined 29 January 2019


कभी साया है कभी धूप मुक़द्दर मेरा
होता रहता है यूँ ही क़र्ज़ बराबर मेरा
Joined 29 January 2019

भीड़ नहीं बनना है मुझे

क्योंकि भीड़ एक प्रतीक है
अंधविश्वास और रूढ़िवादिता की
क्योंकि भीड़ एक वजह है
दंगे और फसादों की

और‌ अब तो सुना है
भीड़ हत्यारी भी हो गई है

भीड़ नहीं बनना है मुझे
क्योंकि मुझे नहीं बनना है
रूढ़िवादी और‌ फसादी
और‌‌ ना ही हत्यारा

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एक-दूसरे को कोसा, गाली दी, खूब बवाल रहा
सियासत के सामने जब भी वाजिब सवाल रहा

उठाई किस-किस ने उंगलियां मुझे फिक्र नहीं
तेरे हाथ में भी पत्थर था बस यही मलाल रहा

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जो देखते हैं सब लोग उसे क्यूं कर देखूं
मेरी हसरत है तेरी सांसों को छू कर देखूं

आजकल हर धर्म बस खतरे में रहता है
चलो फिर यूं करूं गंगा में वज़ू कर देखूं

हाथ देख बोला नजूमी जो चाहेगा वो मिलेगा
आख़िरी दफा ही सही तेरी जुस्तजू कर देखूं

शायद एक बार फिर उठ खड़ा हो वो
उसके ज़ख्मों को एक बार रफू कर देखूं

सर कलम कर दिए जाएंगे जो भी बोलेंगे
चलो फिर एक बार 'राघव' चूं कर देखूं

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तुम्हारे शहर की ये रौनकें अच्छी नहीं लगती
हमें जब गांव के कच्चे घरों की याद आती है
-- अज्ञात

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मुझको पत्थर जैसा कर दे
या खुद को ही पत्थर कर ले

मेरी भाषा में कुछ बोल
या भावों को भाषा कर दे

या तो सब कुछ मेरा कर‌ दे
या मुझको ही सबका कर दे

मेरे लब से गा तू गीत
या मुझको सन्नाटा कर दे

मुझको अपना हिस्सा कर ले
या मुझको ही दुनिया कर दे

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#मजदूर दिवस

अब उन की ख़्वाब-गाहों में कोई आवाज़ मत करना
बहुत थक-हार कर फ़ुटपाथ पर मज़दूर सोए हैं
-- नफ़स अम्बालवी

फ़रिश्ते आ कर उन के जिस्म पर ख़ुश्बू लगाते हैं
वो बच्चे रेल के डिब्बों में जो झाड़ू लगाते हैं
-- मुनव्वर राना

सो जाते हैं फ़ुटपाथ पे अख़बार बिछा कर
मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते
-- मुनव्वर राना

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सच ही है यह कि
हम कभी नहीं मिल सकते

लेकिन एक दूसरा पहलू
यह भी है कि
एक दूसरे के समानांतर
हमेशा साथ चलेंगे

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शिकायतें, नाराजगी, तकरार करती रही
कुछ इस तरह वह मुझे प्यार करती रही

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धरती की पुकार
पृथ्वी दिवस विशेष

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मेरे आने के बाद तुम्हे शिकायतें ही रहीं मुझ से
अगर वो कमी ना थी ‌तो फिर बताइए क्या था

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