अंकित कृष्ण  
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Joined 7 May 2018


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तुम्हें सोचते हैं हम कुछ यूँ गुरुर में
कि ज़माना हमारे चुप रहने से भी ख़फ़ा है

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अंकित कृष्ण 30 DEC 2019 AT 10:11

एक मुसाफिर मिला
किसी अनजान डगर पर
रास्ते के हर छोटे-बड़े पत्थर को चूमता जा रहा था
सबने ने उसे समझा पागल,मैंने भी
बस इसी बाबत उससे कोई पूछता नहीं था
कि आखिर वह करता क्या था,और क्यों?
मैंने भी जरूरी नहीं समझा
बस औरों की सोच से अपनी सोच मिलाता
बढ़ गया अपने रस्ते पर
मंजिल मेरी दूर थी,रास्ता भी पथरीला
अपनी ही धुन में रफ्तार से मैं चलता चला जा रहा था
यकायक गिर पड़ा
एक छोटे-से पत्थर की ठेस पर
चोट आयी थी अच्छी सो पड़ा रहा वैसे ही वही पर
कुछ वक़्त गुज़रा,हौसला किया,और उठने लगा
तभी किसी बिन बुलाये सहारे ने एहसान किया
और जब तक मैं अपने पैरों पे खड़े होने के काबिल न हुआ
तब तक वो सहारा बना रहा
मेरे दम भरते पैरों का
जब देखा उसे तो हैरान हो गया मैं
वो वही था पत्थर प्रेमी जो पत्थर चूमता जा रहा था
मेरी सोच को भी लकवा मार गया
उससे पूछूँ क्या और कहूँ क्या
मगर मेरी मुश्किल उसने ही आसान की
खुद लफ्ज़ लेकर
बड़े संजीदे लहजे में बोला
चूम लेना बढ़ने से पहले उसे
जिसने तुम्हें गिराया था।

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अंकित कृष्ण 22 DEC 2019 AT 12:46

हे प्रेयसी, मेरी प्रियतमा
हमारे प्रेम में अनेक वर्ष,मास,दिवस के परिवर्तन होने पर भी
तुम्हारे नयनों का मुझ पर पूर्ववत अचल के समान दीर्घकाल तक स्थिर होना,
प्रेम के प्रथम व अद्भुत चरण का आभाष कराता है

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अंकित कृष्ण 27 OCT 2019 AT 23:18

मैंने अपने दिए बुझाएं सिर्फ ये सोच कर
कहीं औरों के दिए फ़िके ना पड़ जाए

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तन जगमग हो
मन जगमग हो
जगमग जन-जन, लोक हो
उत्सव दीपों का ऐसा हो
ज्योतिर्मय जीवन-ज्योत हो

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अंकित कृष्ण 26 OCT 2019 AT 10:48

जन-जीवन के बाज़ारों में
संबंधों की दुकानों में
सस्ते दर का दुख जो हुआ है
सुख तो हुआ चला महंगा है

खुशहाली कैसे घट-घर में लाये
सुख का कैसे दाम मोलाएँ
दुख आकर्षक दर लिए हुआ है
सुख तो हुआ चला महंगा है

भटक लिए,दर-दर हो आये
सुख सस्ते दर पर कहीं न पाए
दुख उत्पादन जो बढ़ा हुआ है
सुख तो हुआ चला महंगा है

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अंकित कृष्ण 22 OCT 2019 AT 22:02

गलत को गलत कह देने से
कुछ गलत नहीं हो जाता
उसे साबित करना होता
और ऐसा करने में ज्यादातर
तथाकथित गलत को छोड़
सब कुछ गलत हो जाता

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उस बेटे में भी कुछ राम का अंश जरूर होगा
जिसके हिस्से में जिम्मेदारियाँ और
शहर-सा वनवास मिला होगा

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अंकित कृष्ण 30 SEP 2019 AT 12:50

उदासियाँ बेवजह नहीं होती हैं
अक्सर बेरुखी की छाप होती हैं
और ये बेरुखियाँ बेवजह नहीं होती हैं
दिल भर जाने पर अपने-आप होती हैं

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अंकित कृष्ण 28 SEP 2019 AT 11:01

हे प्रेयसी, मेरी प्रियतमा
अचल श्रृंखलाओं के मध्य स्थित ऊंचे प्रपातों से गिरने वाली निर्बाध जलधारा
जिस प्रकार उपत्यका में भूमि के स्वनिर्मित कोमल स्वरूप लिए शिलाओं पर आती है और अपने साथ शीतलता की विशेषता जोड़ लेती है, ठीक उसी प्रकार
मेघ से स्फुटित अतिवेग वृष्टि कदाचित तुम्हारे ओष्ठ पर गिरकर प्रपातों की जलधारा के समान विशेषता जोड़ लेती है।
इसमें किंचित भी अतिशयोक्ति नहीं अपितु यह तो भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से वाष्पित किये गए जल संग्रह के किन्ही कणों का नवसृजन एवं नवस्वरूप प्राप्त होने का प्रमाण मात्र है।
जिस प्रकार अवनि के स्थलमंडल में सतहों के पारस्परिक मेल अथवा घर्षण से उत्पन्न भूकंपीय आलिंगन में आये जीव-जंतु स्वयं को संतुलित करने में व्यर्थ ही उद्यम करते हैं,
ठीक उसी प्रकार,
हे प्रिये, सम्पूर्ण प्रक्रिया के सानिध्य में जब कभी तुम्हारे तरलित ओष्ठ पर ऊपरी ओष्ठ आकर एक सूक्ष्म घर्षण का अलभ्य दृश्य प्रस्तुत करते हैं तो द्रष्टा अर्थात मैं,अंत:मनः के उथल-पुथल में स्वयं को सहज करने की चेष्टा में पाता हूँ।

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