अंकित कृष्ण  
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Joined 7 May 2018


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Joined 7 May 2018

ओस की मंशा
कितनी स्पष्ट दृष्ट होती
रोज़मर्रा की धूप में
कहीं छांव मिले तो
ध्यान परिधि में लाना ओस को
वह निशा की आंखों की तरलता है
जो सर्द उदासियों के बढ़ जाने पर
धरा को सौंप आती
तृणों के मध्य प्रमाण स्वरूप
कि प्रभात बेला पर
सूर्य स्मरण करे
उसके लिए अगाध प्रेम को
तथा अवगत हो
अश्रु रूपी ओस में
प्रतीक्षित निशा की
छिपी हुई मिलन की आस से

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गलत कौन है
सवाल बेमतलब है
सही रहेगा क्या
यही ग़ौरतलब है
अनबन जड़वत हो
यह विकल्प नहीं
केवल मौन ही एक
वाज़िब संकल्प नहीं
मसले निपटे कहाँ
अपनी ताना-तानी में
कोई औचित्य नहीं अपने
विचारों की मेहरबानी में
क्षीण कर बैठे
सुनने की ताकत को
एक-दूसरे की
मीठी शिकायत को
इसलिए...
एक पहल जरूरी है
मैं करूँ या तुम
सुलह जरूरी है

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जाते-जाते
जब करीब से
गुज़रे तुम
लब मेरे हिले
पर अल्फ़ाज़
अंदर ही दब गए
जो कुछ वक्त और
ठहर कर जाते तो
इशारों ही इशारों में
कुछ बातें तो
जरूर हो जाती...

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आँखें तेरी इक सफ़र है
मैं मुसाफ़िर पसन्द किस्म का हूँ...

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हैं दूरियाँ भी अच्छी,बनाया करो
तड़प कर मोहब्बत बढ़ाया करो
मोहब्बत की सेहत गर बनानी है तो
सलीका ये बेहतर,आज़माया करो
हैं दूरियाँ भी अच्छी, बनाया करो

कभी पास आकर मनाया करो
कभी दूर होकर सताया करो
ओ मगरूर तजो तुम गुमां इश्क में
रूठे-रूठे ज़रा मुस्कुराया करो
हैं दूरियाँ भी अच्छी, बनाया करो

शिक़वे दिली तुम जताया करो
मगर जिक्र नज़रों तक लाया करो
मोहब्बत की कोई कसौटी नहीं
हो मंज़ूर जितना निभाया करो
हैं दूरियाँ भी अच्छी, बनाया करो

हसीं तुम अदा से रिझाया करो
ज़ख्म हो ना कि यूँ शरमाया करो
गहना शरम का कोई होता नहीं
बस निगाहे नशीली झुकाया करो
हैं दूरियाँ भी अच्छी, बनाया करो
तड़प कर मोहब्बत बढ़ाया करो

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मौन होना कोई कला नहीं, ना ही ईश्वरीय वरदान है।
यह तो अंतर में डूबे हुए
स्वयं के विरुद्ध, स्वयं से युद्ध है।
जहाँ अर्थ व अनर्थ का मूल्य किंचित भी नहीं।
जहाँ अतीत ही यथार्थ है
अथवा धारण किये मनुष्य की चेतना पर
कुंडली किये बैठा, भुजंग के समान है।
दंश देता स्वयं को प्रतिक्षण अनवरत
मौन जब तक व्याप्त है।
बाह्य क्षेत्र विराम पूर्ण स्पष्ट सौम्य शांति
स्थापित किये भ्रांति स्वरूप प्रेरणा ही
मस्तिष्क द्वारा अन्तः पर अदृश्य आघात है।

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कवित्व निरंतर शिरोधारा। अकाल सृजन गुंजारा।
हास्य-व्यंग्य व प्रेम-प्रसंग। सजल,सरस् व नव तरंग।
विषाद,उमंगित के प्रेरण। चुनित शब्द के रेवड़।
भाव आरोपण, करे प्रवाहित। जीव-जगत व सकल समाहित।
रच-रच करे तत् कृति सृजित। हो मृत, तद् रचा सदा जीवित।

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तेरी ही यादें मुझे हर घड़ी हर पहर में सताती हैं
चाहूँ मैं कितना तुझे ये आँखें मेरी सब बताती हैं
दिल नहीं मानता किसी की आ तू ही मना दे ज़रा
आकर मुझे तू सुकून एक पल का ही दे दे ज़रा
तुझमें ही जागूँ, सोचूँ तुझे ही और कुछ ना सूझे
क्या शब है होती, क्या है सहर ये पता ना मुझे
आशिक़ हूँ तेरा, हर लफ्ज़ मेरा दीवाना तेरा
जाना कहीं ना दिल है तेरा अब ठिकाना मेरा
पागल समझ या कुछ भी कहे तू सब कुछ मुझे मंज़ूर है
है क्या हक़ीक़त या ख़्वाब क्या,बस तेरा ही तेरा फ़तूर है

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#इश्क़ इक फ़ितूर
#yqdidi #yqhindi #yqsahitya

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तप्त उर की वेदना ने
आर्द्र स्वर में है पुकारा
नभ के आँगन में पधारो
मेघ तुम लेकर फुहार

कह रही पीपर की डारी
कोकिला की कूँक प्यारी
सुप्ति से अत्यंत सिधारो
मेघ तुम लेकर फुहार

मृत्तिका की कोख सूनी
बीज मृत, मूर्छित है भूमि
करुण नयन से अब निहारो
मेघ तुम लेकर फुहार

शुष्क पड़ते नद-सरस को
व्याकुला को अब दरस दो
बूंद निर्झर-सा निसारो
मेघ तुम लेकर फुहार

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#मेघ तुम सुन लो पुकार...
#yqdidi #yqhindi #yqsahitya

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चराग़ों के जैसे
दिल जलता है
तेरे इंतज़ार में
शब हो या सहर
फिर भी हर पहर
मेरा अंधकार में
चराग़ बुझा जाती है
जो मद्धम-सी हवा
ऐसी आहट तो दे
वक़्त लम्बा गुज़रा
जला जा रहा
ज़रा ही सही
राहत तो दे
ज़ख्म जो भी है
मेरे सीने में
राज़ होने से पहले
मरहम के जैसे
हो तू मेरे रूबरू
ख़ाक होने से पहले

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इंतज़ार - इक सज़ा
#yqdidi #yqhindi

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