चार दिनो की प्यार में क्या से क्या हो गया हू
कुछ समझ में नही आ रहा है बेचैन सा हो गया हू
बेदर्द लोगो ने इतना दर्द दिया मुझे पत्थर में नमी सा हो गया हू
मन कही नही लग रहा है बिन पानी मछली सा हो गया हू
हजारों लोगों के साथ रहकर भी अकेला सा हो गया हू
तन्हा काफी बेसहारा सा हो गया हू
उनको कुछ फर्क नही पड़ता लेकिन इससे नही निकल पा रहा हू
सबकुछ जानते हुए भी नजरंदाज नहीं कर पा रहा हू।
उसकी तस्वीर के सहारे गुजारा कर रहा हू
उसकी आवाज़ सुनने को तरस रहा हू
पागल थोड़ा आवारा सा हो गया हूं
कैसे उसको भूलू मैं यही कोशिश कर रहा हू
इस दर्द के इलाज की दवा को ढूंढ रहा हू
प्यार मुहब्बत बेफिजुल ये जानते हुए भी चल सा गया हू
इतना प्यार उससे कब हुआ यही सोच सोच के परेशा सा हो गया हू
निकलने की कोशिश मगर निकल नही पा रहा हूं।
दर्द में यू तो मुस्कुरा रहा हू
मगर अंदर ही अंदर जले जा रहा हू ।-
13 AUG 2021 AT 15:41