Waseeq Qureshi   (Waseeq Qureshi)
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🌹Birthday : 1 January
Joined 12 June 2018


🌹Birthday : 1 January
Joined 12 June 2018
19 JUN 2021 AT 23:04

अश्क पलकों की जब देहलीज पर आ जाते हैं
दिल के हालात ज़माने को पता चल जाते हैं

जाने कितनों को मयस्सर होता है खाना यारों
जाने कितने बच्चे कहानी से बहल जाते हैं

जैसे हर रोज़ बदल जाता है ये मौसम प्यारे
लोग भी कुछ इस तरह हर रोज़ बदल जाते हैं

दिल ने फिर से उम्मीद ए वफ़ा करली उनसे
चोट खा कर सुना था कि लोग सँभल जाते है

इक तमन्ना कि उन्हें जी भर के देखूं ,और वो
मिल भी जाते हैं तो कतरा के निकल जाते हैं

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10 FEB 2021 AT 22:55

बच्चों को देख कर मुस्कुराते हो
आप में शफ़क़त दिखाई देती है

आप शायरी को खूब समझते हैं
आप में उल्फ़त दिखाई देती है

मोहब्बत करें आप शौक से करें
आप में क़ुव्वत दिखाई देती है

मजबूरी में भी ना फैलाया हाथ
आप में ग़ैरत दिखाई देती है

क्यूं आपकी जुबां लड़खड़ाई है
आप में दहशत दिखाई देती है

मेरी इशरत में ग़मगीन होने वाले
आप में नफ़रत दिखाई देती है

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8 FEB 2021 AT 9:39

अब तो चाहत है इक बार में ही दरिया निकले
बोझ अश्कों का अब हमसे उठाया नहीं जाता

जो तेरे ख़्वाब थे चुभ रहें हैं मेरी आंखों में
लहू आंखों का अब हमसे छुपाया नहीं जाता

आके ले जाऊंगा मैं तुझसे अपना दिल प्यारे
फ़क़त झूठ से रिश्तों को निभाया नहीं जाता

कट जाए भले सर मेरा मुझे मंजूर है लेकिन
दुश्मन के सामने मुझसे झुकाया नहीं जाता

अमा हम हर रोज़ मोहब्बत करने वाले ठहरे
ये रोज़ डे परपोज़ डे हमसे मनाया नहीं जाता

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29 JAN 2021 AT 10:09

मोहब्बत नाज़ करती है सदाक़त नाज़ करती है
वो हैं ग़ौसुल वरा उन पर विलायत नाज़ करती है .

वो कह कर क़ुम बी इज़्नी क़ब्र वालों को ज़िन्दा करना .
करामत ऐसी करते हैं कि करामत नाज़ करती है .

शहंशाहे वली हैं वो है सबसे मर्तबा आला ۔
सख़ी ऐसे हैं कि उन पर सख़ावत नाज़ करती है .

लौटाया डूबी कश्ती को जो बरसों पहले डूबी थी
करीम ऐसे हैं कि उन पर करामत नाज़ करती है

ख़ुदा का शुक्र है जिसने बनाया है गुलाम ए ग़ौस ۔
मैं हूँ क़िस्मत पे नाज़ा मुझपे किस्मत नाज़ करती है

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25 JAN 2021 AT 12:09

यूं तो कई शक्स हैं मेरे साथ सफ़र में लेकिन
इक तू हमसफ़र नहीं तो ख़ाक सफ़र है ये

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2 JAN 2021 AT 21:11


हुई है कैसी परवरिश सब जान जाते हैं ।
तहज़ीब इक आइना है कभी आज़मा लेना ।

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10 DEC 2020 AT 21:49

آنکھوں کے سامنے جو اُنکا در ہو مزا آئے
جو انکے سنگ در پر میرا سر ہو تو مزا آئے

پکڑ کر جالیوں کو سناؤں سب حال دل اپنا
یہ عالم زندگی کا زندگی بھر ہو مزا آئے

مدینہ جاؤں اک بار اور وہیں یہ دم نکلے
کاش میرا بھی یہ مقدر ہو تو مزا آئے

وہیں مدینہ میں بنے تُربت میری اور یہ آرزو
میری تُربت سے دِکھے اُنکا در تو مزا آئے

میدانِ حشر میں جب جمع ہوگا سارا عالم
پھر مجھے کہا جائے سنا نعت سرور تو مزا آئے

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1 OCT 2020 AT 14:50

क्यूं ना कुछ नया कर के देखा जाए
दुश्मन को अपना कर के देखा जाए

क्या होता होगा अकेले दरख़्तों का
ख़ुद को भी तन्हा कर के देखा जाए

ये ख़्वाब जो देखें हैं मेरी आंखों ने
क्यूं ना उन्हें पूरा कर के देखा जाए

ख़ुद अपनी नज़र ना लग जाए मुझे
आईने से पर्दा कर के देखा जाए

मैं ख़्वाब में खो कर कहां जाता हूं
इक रोज़ पीछा कर के देखा जाए

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21 SEP 2020 AT 22:32

ना जाने कब ये ज़िन्दगी शाम की तरह ढल जाए
ना जाने कब ख़ुशी शमा की तरह पिघल जाए

अपने बच्चों को सीने से लगा के रखो ऐ लोगों
ना जाने कब ख़िज़ाँ गुलिस्तां के फूल निगल जाए

खुदारा ना किसी के घर में आग लगाओ साहब
ना जाने कब चिंगारी से तुम्हारा घर जल जाए

ना बिछाना हर किसी के इस्तिक़बाल में दिल को
ना जाने कब कौन आए और दिल कुचल जाए

यूं ना बोइए नफरतों के बीज ज़मीन ऐ भारत पर
ना जाने कब यहां की खुशबू ज़हर में बदल जाए

वसीक़ अब भी मौका है हाथ उठा दुआ के लिए
ना जाने कब जिस्म मिट्टी का ख़ाक में बदल जाए

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11 SEP 2020 AT 22:55

खुद अपने हाथों दिल को तबाह कर लेना ।
ये जानते हुए भी बे-वफ़ा है प्यार कर लेना ।

होंठ ख़ामोश हैं उसके इसमें क्या हैरानी है ।
उसको आता है आंखों से इज़हार कर लेना ।

दिल तमन्नाई है अपना दीदार करा भी दे वरना
मुझको आता है ख़्वाब में दीदार कर लेना ।

नाख़ुदा साथ हो भी तो ख़ुदा की मर्ज़ी हो ।
वरना मुमकिन नहीं समुंदर पार कर लेना ।

उसका बस यही काम दर्द दे गया मुझको ।
घर में जो इक दर था उसका दीवार कर लेना ।

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