Vihaan   (Vihaan✍)
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Joined 27 March 2017


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Joined 27 March 2017
Vihaan YESTERDAY AT 23:31

आँसुओं के वज़न से मैंने दुनिया को तौला है।
जो सबसे करीब था, वो आखिरी तक छलका।

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Vihaan 16 SEP AT 0:18

मौत बाहें खोलकर तैयार बैठी है।
जिम्मेदारियों ने हाथ थाम रखा है।

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Vihaan 13 SEP AT 13:57

मुझसे दूर होकर भी, मेरे इतने पास रहती हो।
टूटा दिल जोड़ दे जो , हर वो बात कहती हो।
ख़्वाबों का आँखों से झगड़ा, दिल तड़पाता दोनों का
बादल सा मैं गरजता हूँ और तुम बरसात सहती हो।

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Vihaan 9 SEP AT 16:05

हर किसी का ज़ख़्म मेरे ज़िस्म को नसीब हुआ।
निशां उनके ज़्यादा दिखे, जो जितना क़रीब हुआ।

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Vihaan 5 SEP AT 17:11

Then:
Tumko meri kasam tum smoking drinking nahi karoge.

Now:
Tumko meri kasam mere padhne ke pehle message "Delete for Everyone" nahi karoge 😆🤷‍♂️

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Vihaan 3 SEP AT 9:04

तुम्हारे इतने करीब अब मैं आ गया हूँ।
तुमको भी थोड़ा सा ही सही, भा गया हूँ।

जो बैठी थी तुम बारिश के इन्तजार में,
नीले आसमां पर मेघ बनकर छा गया हूँ।

रिफ़ाक़त हुई, मुहब्बत हुई फिर हुआ ऐसा,
मैं भौंरा होकर एक तितली में समा गया हूँ।

सरहद पर जंग छिड़ी, तुम्हारी घुसपैठियों से,
मैं खुद को उजाड़, तुम्हारा गांव बसा गया हूँ।

तिश्नगी थी तुम्हारे सफ़ीने में सैर करने की,
अफ़सुर्दगी मिली, मैं थोड़ा सुकून पा गया हूँ।

तुम्हारे आरिज़ पर कुछ छीटें दिखेंगे बाद तक,
मैं बेलौस अपने हिस्से का समंदर कमा गया हूँ।

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Vihaan 2 SEP AT 4:04

तुम सोचती होगी कि मैं अक्सर रात में ही क्यों लिखता हूँ? तुमसे इतने दूर होकर भी मैं हर रात खुद को तुम्हारे सबसे करीब पाता हूँ। मैं सभी बंधनो को तोड़कर तुम्हारे अंतर्मन को स्पर्श करता हूँ और खुद को समर्पित करता हूँ। ये पहर हर सीमाओं से परे होता है। तुम सोयी रहती हो और मैं आज़ाद रहता हूँ। स्वतंत्रता का यही परिवेश मेरे प्रेम को जन्म देती है। मेरा प्रेम निस्वार्थ है और यही मुझे सुकून देता है। आशा और अपेक्षाओं की भूमि पर पनपे रिश्ते स्वार्थ से परिपूर्ण होते हैं। इसीलिए, मुझे न मंजिल पाने की जल्दबाजी होती और न ही तुमसे किसी तरह की उम्मीद बचती। मैं इस रिश्ते में अपने धैर्य, लगन, समर्पण, एकाग्रता और साहस का इम्तिहान लेता हूँ ताकि जब तुम सुबह उठो तो अपने ज़िस्म पर मेरे प्यार के कुछ निशान देख पाओ और जानो कि मैं रात में क्यों लिखता हूँ।

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Vihaan 1 SEP AT 3:43

कश्मीर सी तुम और कर्फ़्यू सा इश्क़ हमारा,
क़ैद हूँ तुम्हारी रूह में और जन्नत सा सुकून है।

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Vihaan 28 AUG AT 5:24

हाँ, मैं भूल जाऊंगा।
तुम्हारे उन बातों को,
साथ बिताये रातों को,
जो हमने बस ख्वाब में जीया।

हाँ, मैं भूल जाऊंगा।
कि हम कितने पास थे,
कि हम कितने साथ थे,
शायद एक दुसरे के आस थे।

हाँ, मैं भूल जाऊंगा।
जो तुमने कहा, मैंने नहीं सुना।
जो तुमने सुना, मैंने नहीं कहा।
जो हमदोनो ने सुना, किसी के कहे ही।

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Vihaan 27 AUG AT 2:54

एक किताब कई सालों से पुस्तकालय के एक किनारे में पड़ी थी। धूल की मोटी परत काफ़ी समय से जमे होने के वजह से पहचान भी ग़ायब हो चुकी थी। हर दिन सैकड़ों लोग आते थे। कुछ की नज़र नहीं पड़ती थी और कुछ देख कर अनदेखा कर देते थे। आज मैंने उस किताब को हाथों में उठाया तो देखा कि अंदर के बहुत सारे पन्ने आधे मुड़े हुए। बहुत सारे लोगों ने पढ़ना शुरू किया होगा लेकिन कोई अंत तक नहीं पहुँचा होगा। ज़िन्दगी में रिश्ते भी ऐसे ही होते। सब शुरुआत करते है और एक मोड़ पर आकर चले जाते, किसी उम्र को मर्म की उम्मीद देकर कि वो फिर वापस आएँगे। भीड़ से दूर खड़ा वो इंसान लोगों की इंतज़ार में राह ताकते रहता लेकिन कोई लौटकर वापस नहीं आते। तन्हाई की मोटी परत उससे उसकी पहचान भी छीन लेती और फिर वो ज़िंदा लाश किसी को दिखता नहीं या लोग देख कर अनदेखा कर देते।

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