Tushar Kant  
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Joined 23 September 2018


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Tushar Kant 6 HOURS AGO

मेरी अधूरी मोहब्बत की मिसाल देते हैं ज़ालिम
हर मयखाने में मेरा नाम कुछ यू लेते हैं ज़ालिम

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Tushar Kant 4 JUN AT 8:52

रोटियां... क्या हैं रोटियां
क्या कोई जानता हैं इन्हें
हाँ, वहीं जो गूँथ दी जाती हैं
छोटी छोटी नरम हाथों से
जिन हाथों में पहना दी जाती हो,
वक्त से पहले छोटी उम्र में ही
बंधनों की लाख चूड़ियां
और ब्याह दी जाती हो...

(शेष रचना अनुशीर्षक में)

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Tushar Kant 31 MAY AT 12:24

क्या रह जायेगा शहर में मजदूरों के चले जाने के बाद
बंद पड़ी मशीनें अधूरी इमारतें खाली तहखानों के बाद

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Tushar Kant 30 MAY AT 10:48

कितनी
विवशता
हैं
मजदूर के
जीवन में
..........
लकवाग्रस्त
हो चुके
सियासत के
हुक्मरानों को
..........
लिए कांधे
पर चलते
जाना हैं
गाँव
की ओर

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Tushar Kant 30 MAY AT 9:30

बिन स्टेपल के बिखरे पड़े हैं
सब यादों के पन्ने...
रात आधाी मंद लैम्प में ही गुजर जाती हैं

खुला रह जाता हैं
भुला बिसरा दरवाज़ा...
बिल्लियां हैं कि रोज़ आती जाती हैं

प्रश्न चिन्ह है
लगते हैं झांकने खिड़कियों से...
हवायें बेपरवाही से कानों में सुनाई देती हैं

उजास हैं कोरे कागज़
आती लगती हैं कहीं सहरा से..
जुगनूओं के वेश में अंधेरे कमरे झिलमिलाई लगती हैं

रात के 3 बजे है
मैं उबासी में धोता आंखें ...
दर्पण से घिरे चेहरे पर उतराता बेरौनक़ झाग दिखाई देती हैं

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Tushar Kant 29 MAY AT 10:33

उग आयी हैं आंखें अश्कों से भरने को,
सूखे पत्ते सड़कों पर बिखरे हुए लगते हैं

बहते नालियों में उतारता पाँव के निशां,
जमींदोज मकान के बिफरे वहम लगते हैं

तपते धूप में सूखी हुई लोहे की अतड़ियां,
आधी रात को भट्टी पर लहके ईंट लगते हैं

टूटे सितारें जमीं पर कल उखाड़ फेंकने को,
आज के रोशन दीये से लहके हालात लगते हैं

मशगूल हैं सियासत दश्त-ए-कर्ब बनाने में,
झूठे वादों के खूदे अंधेरों में सब कुँअे लगते हैं

मेरे ही इन हाथों हुए हैं खून सब मेहनतकशों के,
जोर से बोलूं तो सबके कानों में चुभते जहर लगते हैं

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Tushar Kant 28 MAY AT 16:51

मैंने बुना हैं 'प्रेम' को
लाल ,हरे और पीले रगों में
जिनमें हैं दो आंखें ,एक नाक, दो कान
कुछ काले सफेद से बाल ,एक माथा
दो पलकें ,आंखों की दो पुतलियाँ
दो हाथ, दो पैर ,दो होंठे, दो भुजाएं
एक सीधा सा गला ,एक चौड़ी छाती
सारी अंगुलियां ,हल्के हल्के से उभरे हुए ठांडी
और एक सादा, सरल सा चेहरा
जिसमें दिखाई देता हैं ,
हाँ, वही स्वेटर ...
जिसे बुनते हुए मैने तुम्हारे हर रंग ढंग को
अपने हाथों से सहेजा और संवारा है
अपने मन मंदिर में ठीक उसी तरह
जैसे कोई अनन्य पुजारी देवी देवताओं की मूरत
को रोज सहेज ,संवार कर अपने हाथों से
करता हैं चंदन का लेप .

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Tushar Kant 25 MAY AT 10:01

देख 'ज्योति' उठ खड़ी..
खरीद कर साईकिल पुरान

(पूर्ण रचना अनुशीर्षक मे पढें)

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Tushar Kant 25 MAY AT 7:26

फकत चाँद से चेहरा छुपाये तो छुपाये कैसे,
आख़िर घर को अपने जाये तो जाये कैसे
लोग पूछते हैं वालिद से शाहिद आया कि नहीं,
गरीबी मौत है यह कहकर भी बच्चों से वालिदा
ईद के रोजे आज खुलवायें कैसे

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Tushar Kant 24 MAY AT 14:19

कविताएँ जिनके रूठने से ...
रूठ जायेंगी बाग की तितलियाँ
फूल जिनके ख़ुशबू महकेंगे नहीं ..
उड जायेंगी डाल से भी सारी पंछियाँ

गम के भी आंखों में आंसू नहीं होंगे ..
मनाने वाले सुनेंगे नहीं रात की सिसकियाँ
जानबूझकर नहीं खोलीं जायेगी किताबों की डोर..
किसी के याद की रह जायेंगी सब हिचकियां

बादल जिनसे बरसेंगे नहीं बरसाती बूँदें...
सूरज जिनसे नहीं आयेंगे घर आँगन में रोशनियां
ख्वाबों के आंखों में भी ताले लगे होंगे ...
चाँद सितारों से बातें करने वाले सोयीं होंगी सब बस्तियां

दीपक भी छिप जायेंगे रात के अंधेरों में ...
बुझाने वाले नहीं होंगे जलते एहसासों की बत्तियां
सब गोया खोये होंगे अपने अपने मकानों में
गिरते गिरते ही मिट जायेंगे सूखते शाखों से सब पत्तियां

एेसे भी जिद करने वाले नहीं होंगे ...
जैसे करती हैं खिलौनों से रूठकर प्यारी बच्चियां
न होगा पूर्ण इनके बिना कोई जीवन भी...
न पहुँच पायेंगी कभी मंजिल को भटकती सारी चीटियां

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