Tushar Kant  
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Joined 23 September 2018


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Tushar Kant 7 HOURS AGO

दिलो के दरमियाँ ये जो कुछ बेतहाशा सा रहा
अब्र-ए-मौसम में मिलन को प्यासा सा रहा

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Tushar Kant 10 HOURS AGO

राते यू ही चिल्लाती रहती है
दिन तो बस चुप सा रहता है
शामें तो शोर में दब जाती है
कडी धुप में जिन्दगी तपता है

इस गम की चरपाई हर रोज करवटें कोई लेता है
कौन है जो इस मुफलिसी में आदमी सा रहता है

खामोश करके कफस ख्वाहिशों की
बंद दीवारों में हरदम भटकता है
अजायबघर में पड़ा कोई नायाब खिलौना
बेहिसाब के सौदों से हर रोज जुझता है

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जद्दोजहद जिन्दगी की

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Tushar Kant YESTERDAY AT 19:24

छलनी से झाकती एक नयी जिन्दगी देखी
हर सूराख में बसती एक नयी रोशनी देखी
ताक रही थी आंखे उन्हें एक टकटकी लगाए
चांद सी खिलती नयी बेले की खुशबूएं देखी
हुस्न को गुमान था उनके रस्म-ए-मौहब्बत पर
होठों पे रची मुस्कान की फिर वही चांदनी देखी

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Tushar Kant 15 OCT AT 19:09

लायी है कुछ हंसी होठों पे
आज नींदे ख्वाबों से चुराकर
कुछ उजले कुछ रंग बिरंगे से
गुब्बारें पलकों पर सजाकर
कुछ तितलियाँ कुछ भवंरो से
जिन्दगी के नगमें गुनगुना कर
कुछ फुलो कुछ वादियों से
महकता हुआ दिल बनाकर
कुछ बचपन कुछ बुढांपे से
बहता मन आखों में दिखाकर
कुछ स्याह होती इन रातों में
नये उम्मीदों के दीप जलाकर

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Tushar Kant 14 OCT AT 18:53

वो लड़की अकसर चांद को निहारा करती है
खोयी खोयी सी रातों में ख्वाब बुना करती है

तितली सी चंचल चिड़ियों सी चहचहाती है
फुलों सी महकती भंवरो सी गुनगुनाती है

जिसके कदमों से घर आंगन कौतुहल हो जाती है
उसके श्रंगार से प्रकृति भी यौवन से भर जाती है

जब वो खिलखिलाती है तो नदियां भी लहराती है
झरनो से भी मधुरस की धारा बहने लग जाती है

रूप भी जिसका चंदन सा कोमल नजर आता है
जैसे कोई मोरनी सावन में नृत्य से संवर जाती है

जब वो सुन्दर पोशाक पहने और भी सुंदर हो जाती है
जैसे गंगा बनारस में प्रवेश करते ओर भी मनोरम हो जाती है

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Tushar Kant 13 OCT AT 19:30

कुछ ख्वाहिशों की बेडिया
हमें वहां से कभी...
आजाद होने नहीं देती
जहां बचपन ने कभी
नंगे पाव ही चलना
सीखा था.

जहां कभी हम उन
टेडे मेडे से रास्तों पर
चलते थका नहीं करते थे
अब तो जैसे बिना धुप से
गुजरे ... ही हमसाया सा
नजर आने लगता है .

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Tushar Kant 12 OCT AT 23:42

कुछ देर पहले...
जिन्दगी छुकर गयी
जैसे लगा.. कोई ख्वाहिश
मुझसे होकर गयी
थोडी मासूम सी थोडा सा
बचपना लिये मुझे मेरे वही
खिलौने वही नादानियां लिये
वही खुशी वही बेफिक्र की
अदा लिये हंसी के पल
देकर गयी.
थे उसके सुनहरे से पंख
कुछ परिंदे भी साथ में
शायद उड जाने की
तलब थी उसे
बस इस कोशिश में
गिरना सम्भलना था
कही दुर उड जाने का
तमन्ना थी बस एेसे ही
कुछ देर पहले जिन्दगी
रोशन करके कोई ख्वाब
आज फिर से चली
आयी थी मुझमें

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Tushar Kant 12 OCT AT 18:35

अब् की रात में
बेमौसम से बरसात में
चादं जा छिपा था कही ख्वाहिशों के साथ में
कुछ तारे चुने थे गिन गिनकर बहके हुए ख्वाब से
चल पड़े थे अरमान घर बचाने परिंदों के साथ में
डूबने लगी थी नदियां भी अहसासों की लकीरें हाथ से
भीगे जा रहा था कोई जलते हुए उन यादो के राख से
जो कुछ बाकि बचा था वो भी मर रहा जीवन के साख से

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Tushar Kant 10 OCT AT 19:16

फिजाओं में खुशबू तेरे रंग की घुल रही है
फिर से ये सर्द रातें हौले हौले बढ़ रही है
जो ये बरसों बरस बीत गये हैं तुम बिन
फिर एक और बरस मिलने की आस जग रही है

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Tushar Kant 8 OCT AT 11:57

राम मन था उसका, फिर भी रावन हो गया
इस कलयुगी संसार में,इसतरह बदनाम हो गया

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