Tulika Srivastava   (तूलिका श्रीवास्तव "मनु")
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जब भी कोई बात मेरे मन मस्तिष्क को परेशान कर जाती है, तो मैं लिखने के लिए विवश हो जाती हूँ।
Joined 10 October 2020


जब भी कोई बात मेरे मन मस्तिष्क को परेशान कर जाती है, तो मैं लिखने के लिए विवश हो जाती हूँ।
Joined 10 October 2020
28 JUL AT 22:08

~ उम्मीद फिर भी बाक़ी है ~

नहीं आसाँ सफर ज़िन्दगी का
फिर भी उम्मीदें तेरी साथी हैं
उसने चुना है ये रास्ता गर तेरे लिए
रख हौसला तेरा इसपे चलना काफ़ी है
खामोश रह वो कर रहा कुछ तेरे लिए
फैसले पे उसके, करना यकीं बाक़ी है
हर मंसूबा तय होता है ख़ुदा का
बस हम इंसानो का समझना बाक़ी है

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28 JUL AT 2:54

महकती रहें जो सदा
सूखकर भी याद में
गुज़रे लम्हों की
सिर्फ ऐसी पंखुड़ियाँ
प्यार से सहेजना
ज़िन्दगी की किताब में
और कर दें जो बर्बाद
भावी अनछुए कोरे पन्ने
अतीत की उन नम पंखुड़ियाँ को
धो देना माफ़ी की बरसात में

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22 JUL AT 0:10

कहें भी तो कैसे कहें वो सितम
कौन गिने क़िस्मत में थे कितने ज़ख्म
तकलीफों को छुपाना फितरत थी
आँसुओं को मुस्कराकर छिपाते रहे हम
सहते रहे चुपचाप, न भरी आह तक
दर्द से मगर कभी न हुए महरूम हम
ज़ख्म गर जिस्म के होते तो
फिर भी शायद मिल जाता कोई मरहम
लेकिन कर रहे थे बर्बाद जो नासूर बनकर
लगे थे रूह-ओ-दिल पे कुछ ऐसे ज़ख्म
जब तक हैं साँसें, सहना है तब तक
उसके बाद ही कहीं, होंगे इस दर्द से आज़ाद हम

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20 JUL AT 0:46

सच और झूठ के बीच
एक गहरा अंतर यही ढूँढ पाये
झूठ कायरता का
सच निर्भीकता का है पर्याय

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16 JUL AT 15:42

कुछ ग़लतियों की
न होती है माफ़ी
न ही कोई सज़ा होती है
बस ज़मीर की अदालत में
हर एक हिसाब होता है उनका
और कीमत भी उनकी
वहीं केवल अदा होती है

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12 JUL AT 3:15

ज़िन्दगी की हक़ीक़त से हुए रूबरू कुछ इस क़दर
कि जज़्बात-ओ-एहसास कहीं फ़ना हो गए
और सजाते थे जो कभी बंद तो कभी खुली आँखों से
वो सब ख़्वाब थे ला-हासिल, नींद में सोते ही रह गए

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11 JUL AT 9:12

ज़्यादा की नहीं थी ख़्वाहिश अपनी
किस्मत का मगर ये इंसाफ़ पाते
ख़्वाब होते न भले ही मुकम्मल
चैन की नींद हम सो तो पाते

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10 JUL AT 0:17

खिल जाती हैं दिल की कलियाँ
सच्चे प्यार की एक फुहार से
फिर कांटों भरी ही क्यों न हो
लगती ज़िन्दगी गुलज़ार है

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6 JUL AT 7:25

सिखाता है बहुत कुछ मगर
वक़्त दया नहीं दिखाता है
ठहरने की नहीं फितरत इसकी
कैसा भी हो गुज़र जाता है

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6 JUL AT 0:57

आँख खुलने तक ही होती है
झूठ से एक ख़्वाब की उम्र
देखने पड़ते हैं हकीक़त में वो
खुली आँख से जो ज़िन्दगी दिखाती है

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