suramya shubham   (Sur)
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Joined 13 April 2018


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Joined 13 April 2018
suramya shubham 7 HOURS AGO

किसी गुलामी के अंदेशे पे
किसी हाँ की उम्मीद जन्मी है???
किसी पिंजरे सी मंजिल पे
किसी उड़ान ने सांसे भारी है???
किसी रुख़्सती की पहल पर
किस आगमन की आहट हुई है???
किसी बेरहमी की चाबुक पर
किसी आसरे की आवाज सुनी है???
किसी असहाय की वेदना पर
किसी हिम्मत की नींव जमी है???
किसी बंजर से जजीरे पे
किसी जंगल की आग लगी है???
किसी पर्वत की वेणी पर
किसी समंदर की गर्जन हुई है???
तो फिर क्या
किसी प्रेयसी के मन पर
कभी कोई कविता दम तोड़ सकी है???

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suramya shubham YESTERDAY AT 20:32

मुझे तो चश्मा लगा है तेरी यादों का
अब कहाँ कोई दूजा नज़र आता है..

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suramya shubham YESTERDAY AT 15:02

उसे एक नए कमरे में लाया गया था
उसी के कमरे जैसा थोड़ा बहुत
पर कुछ नया था यहाँ
अलग सा
हाँ... शायद कोने में पड़ा वो "एक्वेरियम"

वो महसूस कर पा रही थी...
मछ्ली का यूँ बार बार कांच की दीवार तक आना...
खिड़की से बाहर ताकते ताकते
इस नई घुटन का अंदाजा लग गया था उसे...

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suramya shubham 16 AUG AT 1:27

एक कविता अटकी पड़ी है
जैसे कि कोई लम्स
तेरे लब का ,मेरे लब पे
छूता छूता सा
रह गया हो...
जैसे कि
तुम्हें बाहों में छुपाया हो
मगर,दुनिया से छुपते छुपते...
जैसे कि
कोई इजहार बस
आँखों के झीने तक
आते आते ढल
गया हो ...
एक कविता अटकी पड़ी
है जैसे...

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suramya shubham 16 AUG AT 0:47

जाने वो चकोर कैसा होगा
जिसके लिए ये चाँद बिस्तर सजायेगा
जाने वो रात कैसी होगी
जब चाँदनी भी अकेली रह जाएगी....

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suramya shubham 15 AUG AT 9:42

इतना सन्नाटा मेरे वजूद में कभी नहीं था
क्या ऊपर वाला मेरा हमसाया हो गया है???

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suramya shubham 14 AUG AT 21:31

उसने बस छुआ नहीं था
कुछ महसूस किया था
एहसास जब दिल से निकल
आँखो से बहने लगें
तो समझ लो
तुमने कुछ महसूस किया
वरना कहने को तो
आवाज़ भी नहीं होती
और ये धड़कने
शांत भी नहीं होती....

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suramya shubham 14 AUG AT 13:50

शाम की उदासी...

जैसे समंदर की लहरों को ताकती दो आँखे
मानो दिल उतर गया हो लहरों में...
शाम की उदासी जैसे कि घर मां बिन
सूना ,अधूरा, काटता पर फिर भी बेहद अपना
मानो दिनकर भी आलिंगन का मोहताज हो
और सदियों की व्यकुलता के गीत लिख रहा हो
लाल ,मद्धम , यादों में सनी कोई उदासी...
जैसे मन चिड़ियों सा आकाश भी ढूंढ़ रहा हो
और कोई घोंसला भी...
शाम की उदासी जैसे कि एक व्यथा जो
साँसों में भींच के उभरती हो
या फिर एक सुकून जो आँखों से मन में उतरता हो...

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suramya shubham 14 AUG AT 9:23

एक कभी न खुलने वाली चुप्पी है
और कुछ भी नहीं
मेरे हिस्से की इक शाम वहीं कही लुढ़की पड़ी है
और कुछ भी नहीं
आवारा, बदचलन , और हज़ार सियाह बातें
कुछ, कभी ना सुकून में ढलने वाली रातें
और कुछ भी नहीं
मुझमें मुझसा कुछ मुरझाया मरियल सा पड़ा है
आंगन में बने हैं बिन गौरैयों के हज़ार घोंसले
कुछ दबी, काली, कुचली घास बची होगी शायद
और कुछ भी नहीं
जुगनुओं को निगल लेती है अब अंधेरी रातें
कि सर्द सी लगने लगी है अब तो सूरज की बातें
प्रेम की रंगत, सुर्ख ,अब जाती रही है
गुलाब भी तो अब खुशबू इत्र से चुराने लगे हैं
एक कभी न खुलने वाली चुप्पी है
और कुछ भी नहीं
एक संगमरमरी यादों की कब्र है
और कुछ भी नहीं...

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suramya shubham 13 AUG AT 17:51

एक रोज़ मैंने बड़ी हिम्मत से इश्क़ को आवाज़ लगाई,
बड़े ही हौले से,बड़े ही प्यार से।

पर इश्क़ तो ऐसे सहम के सिकुड़ा कि मुझे समझ ही नहीं आया कि क्या ग़लत कर दिया मैंने।

फिर मैं उठी और उसके पास गई।मैंने उसके हाथों को थामा तो,इश्क़ ने तो अपनी आंखें जोर से बंद कर ली,मैं समझ नहीं पा रही थी कुछ।मैं घबरा के पूछ पड़ी कि क्या हुआ हैं।

वो बहुत देर तक कुछ न बोला,बस काँपता ही रहा।
मैं फिर भी बैठी रही और पूछती रही।
बड़ी देर बाद उसने अपनी गीली पलके उठाई और मुझे देखते हुए बुदबुदाया...

"इश्क़ की आदत नहीं रही है अब मुझे...मुहब्बत से खौफ़ आता है"।

अब सहमने की बारी मेरी थी।

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