suramya shubham   (Sur)
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Joined 13 April 2018


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Joined 13 April 2018
suramya shubham 6 HOURS AGO

मेरी कविताओं का केंद्र क्या है?
विरह
बिखराव
ठहराव
प्रेम
सूनापन
खूबसूरती
समाज
तुम
ख्वाहिशें
ग़रीबी
भावनाएं
शोहरत
या फिर
सियासत
नहीं!!! मेरी कविताओं का केंद्र है,
"नज़रिया"
ये चुप्पी तोड़ती श्वेत कबूतर हैं...
जो आसमान में उड़ता फिरता है..
एक संघर्ष...
जो मुझे, मुझसे आगे, पर मुझ जैसा...
बनाए रखने का द्योतक है...

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suramya shubham 23 FEB AT 20:19

देखो ना...
सारा कमरा खंगाल लिया है
मगर वो तेरे आने से पहले की बेचैनी
वो तुम्हारी मुझसे लिपटने की जल्दी
वो सांसो सी समाहित स्वाभाविकता
कहीं दिख ही नहीं रही...
कलम भी सूखी सी लगती है
दवात भी ढिमलाने को है जैसे!!
देखो ना...
एक एक पत्ती कैसे मटियारिन सी है...
सब उधेड़ दिया है मैंने..
मेरे हिस्से का नक़ाब!!
आंखों की शर्म!!
मन की उहापोह!!
....सब...
मगर तुम...
जाने क्यूँ नज़र ही नहीं आते!!!

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suramya shubham 23 FEB AT 11:47

तुम्हारे लिखे खतों की रोशनी तले
मैंने एक एक कविताएं लिखी हैं...
जब तक ख़त जलते रहते हैं,
मेरी कलम शब्द खरोचती रहती है...
अब तुम पूछोगे ...
और तुम?
तो मैं बिल्कुल बीच में हूं...
मेरी एक तरफ राखों का ढेर है
और दूजी तरफ कविताओं का!!!
मैं नहीं समझ पा रही कि
कौन किसको जन्म दे रहा है..
कविता राख को या राख कविता को!!!
या फिर,
जब ये ख़त खत्म हो जाएंगे
तब मैं राख़ भर बचूंगी
या कविता ही कविता!!!
लेकिन ये तय है,
मेरा एक हिस्सा झुलस जरूर रहा है।

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suramya shubham 22 FEB AT 15:19

सिलवटों के किनारों पर
निशान नहीं होते...
समंदर की लहरों पर
नदी नहीं दिखती
सादी सी कविता पर
किताब नहीं छपती
मुट्ठी भर रेत में
आंधी नहीं गुमती
नदी की धार में
पत्ते नहीं थमते
क्षितिज से देह पर
घर नहीं बनते
गंगा के पानी में
गंगा नहीं धुलती
आकाश की सीमा में
सीमा नहीं दिखती
सौन्दर्य की आभा में
प्रेम नहीं निखरता
कविता की कड़ियों से
एहसास नहीं टिकते
लाख पिरो लो "सुर"
टूटी हुई वीणा से
बादल नहीं बरसते...

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suramya shubham 22 FEB AT 11:00

विवशताओं की बेड़ियों में जकड़ी ज़िन्दगी
अक्सर ही कविताओं से मुँह फेर लेती है...

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suramya shubham 21 FEB AT 10:34

अधजगी नींद में,चाय का बर्तन चढ़ा
वो रसोई की,खिड़की खोल देती है
रात की बारिश की सेज से उठी हवा
सिहरन दे रही होती है...

वो एक अंगड़ाई लेती है
और चाय बनाने में लग जाती है
हवा खिड़की से आती हुई
कभी आंच से तो
कभी उसके बालों से
खेलती रहती है...

वो भी तो आ के यूं ही
खड़ा हो जाता है...
"हवा के साथ तुम्हें अकेला नहीं छोड़ सकता
तुम मुझसे दूर होने लगती हो
और इनसे करीब...
ये बाल तुम्हारे ना...
मेरे द्वारा नियुक्त, पहरेदार हैं...
देखो कैसे इस चेहरे को अंजुलि में लिए बैठे हैं..."

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suramya shubham 20 FEB AT 22:05

कभी कभी रातों को
उसकी आंखे अचानक
खुल जाया करती है
सुध में आते आते, उसे
एक चुभन का एहसास
होता जाता है..
उसकी हाथों की उंगलियों ने
खूब जोर से मुट्ठी बांधी होती है...
....
एक कागज का टुकड़ा
और कई सारी तस्वीरें
लाल हो रहे होते हैं...
.....
जानती हो...
डरावने सपने और कुछ नहीं,
रिसते हुए रिश्ते होते हैं...

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suramya shubham 20 FEB AT 19:49

To
Ujjala


From
Suramya

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suramya shubham 20 FEB AT 10:09

एक रोज बड़ी जोर की आंधी आई थी
डायरी ने मेरा हाथ थाम लिया था
इतनी सहमी सिकुड़ी सी खड़ी थी
क्या बताऊं...
पन्नें थरथरा रहें थे
शब्द कांप रहें थे
मैंने बड़े जतन से, हिम्मत के साथ
उसे अलमारी में रख दिया।

मैं शायद ये समझ ना पाई थी
कि ये आंधी बाहिर नहीं
डायरी के अंदर उठी थी...

अक्सर ही, पन्नों को पहले भान
हो जाता है...छल का!!!
और एहसासों की मैय्यत तले
वो मसान बन कांपते रह जाते हैं...

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suramya shubham 19 FEB AT 20:37


तुम
आना प्रेम,
और
"खूबसूरत"
कर
जाना...मुझे !!!


(In caption...)

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