SIMRAN RAJ   (SIMRAN RAJ)
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डर को डराओ
हार को हराओ
मतलब को मिटाओ
खुद को अपनाओ
Joined 6 August 2018


डर को डराओ
हार को हराओ
मतलब को मिटाओ
खुद को अपनाओ
Joined 6 August 2018
SIMRAN RAJ 5 HOURS AGO

मोहब्बत को "मोहब्बत" अभी कहने ही वाली थी

कि मर्यादाओं ने झट से मुँह पर ताला लगा दिया

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SIMRAN RAJ 13 HOURS AGO

तुम कहाँ चले गये? मुझे यहाँ अकेला छोड़कर
सब रिश्तें-नाते से यूँ एकाएक नाता तोड़कर
मरने पर मज़बूर करती है मुझे 'कश्मीर की ठंड'
ज़िंदा हूँ तो बस तुम्हारी यादों की चादर ओढ़कर
इस क़दर बिख़र गई है 'तुलसी' तुम्हारे आँगन की
जिस तरह सजाया-सँवारा था तुम ने उसे जोड़कर
सुनो न! ख़ामोशियाँ घर की आवाज़ दे रही है तुम्हें
फुरसत मिले तो आ जाना सुनने खिड़कीयों से होकर
बड़ा इतराया करती थी चकोर बेचारी अपनी पसंद पर
तोड़ दिया उसका गुरूर मैंने भी उस चाँद को मोड़कर
कितना शौक़ था न! एक ही चेहरा को आँखों में भरने का
ख़ैर वक़्त ने तो दिखा ही दिया 'वो चेहरा' आईना को फोड़कर
सुना है मियाँ! वर्षो की बिछड़ी लहरें मिल जाती है दरिया को
तो आना...और ढ़़ू़ढ़ लेना तुम भी मुझे मुझको खोकर

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SIMRAN RAJ 17 HOURS AGO

बहरों के बाजार में गूंगो-सा गुहार लगा रहा था

तजुर्बों से नहीं बेचारा उम्र से लाचार हुआ होगा

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SIMRAN RAJ YESTERDAY AT 1:50

कुछ लिखने को जब भी 'कलम' हम उठाते हैं

उसकी यादों का एक तमाचा दिल पर खाते हैं

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SIMRAN RAJ 13 OCT AT 11:38

आँखों में ग़र पानी है तो बताओ दरिया में क्या है?

मान लूँ ? वो आँसू है या फिर कोई कहर नया है

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SIMRAN RAJ 13 OCT AT 10:44

She can beautifully make her weakness to her very strength because of LOVE has strengthened as far as "She is"

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SIMRAN RAJ 10 OCT AT 22:10

सुनो! तुम मुझे मिल जाओ ना...
सच में अब ऐसे मेरे कोई ख़्वाब नहीं
जानती हूँ सवाल तो बहुत है तुम्हारे पास
मगर तुम्हारे सवालों का मेरे पास अब कोई जवाब नहीं
हाँ...अच्छा किया जो जला दिया तूने मेरे जज़्बातों को
लेकिन खुश रहो! क्यूँकि मैं जलाने वाला आफ़ताब नहीं
जान लूँ तुम्हारी कहानी या बता दूँ मैं अपनी कहानी
सुनो! ऐसी कहानियों की मेरे पास कोई किताब नहीं
चहकती अपनी भोर को यूँ पल भर के लिए शाम कर दूँ
तुम्हारी दीदार के लिए अब इतनी भी मैं बेताब नहीं
ज्यादा तो नहीं हाँ मगर वाक़िफ़ हूँ तेरे पसंद-नापसंद से
अफ़सोस कि तुम्हें थमाने के लिए आज मेरे पास गुलाब भी नहीं
इतना नशा जो हर बार मुझे देख चढ़ जाता है तुझ पर
सुनो न ! मैं भी लड़की ही हूँ यार कोई शराब नहींं...

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SIMRAN RAJ 10 OCT AT 20:45

खुशियों से तो यूँ बहुत दूरी है
खुश रहना फिर भी मजबूरी है
बातचीत खूब हुई दोनों में मियाँ
बातें मगर अब भी सब अधूरी है

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SIMRAN RAJ 9 OCT AT 18:21

ख़्वाहिशों से अपने 'समझौता' करने लगे हो दोस्त

लगता है तुम अपना 'बचपना' खोने लगे हो दोस्त

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SIMRAN RAJ 9 OCT AT 16:04

बचपन की ज़िदें जो सर पर चढ़ा करती थी

आज माँ ने उसे 'समझदारी' का नाम दिया

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