SIMRAN RAJ   (SIMRAN RAJ)
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डर को डराओ
हार को हराओ
मतलब को मिटाओ
खुद को अपनाओ
Joined 6 August 2018


डर को डराओ
हार को हराओ
मतलब को मिटाओ
खुद को अपनाओ
Joined 6 August 2018
SIMRAN RAJ 2 APR AT 19:28

गिरफ़्त थी ये निगाहें झिलमिल परदे के पीछे
बावजूद तक़दीर ने अपनी तहरीर जान लिया
इनायतें इतनी की गई हैं इबादतों पर यहाँ
कि इक 'पत्थर दिल' को ज़िंदगी ने ख़ुदा मान लिया

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SIMRAN RAJ 2 APR AT 3:51

जुस्तजू रहती है उस 'इकलौते चाँद' को निहारने की
जो ईद के हवाले तो नहीं निकलता है दोस्त , बल्कि
दिल के आसमाँ में केवल एक ही बार निकला है
केवल और केवल एक ही बार एक ही पल के लिए

जैसे-जैसे 'तन्हा रात' का काला पहिया घूमता है
वैसे-वैसे साँसों की बेचैनियाँ उमड़ने लगती हैं
और ख़्वाबों के रंगमंच पर थकी-हारी कोई ज़िंदगी
कुछ इस तरह अपना किरदार बेज़ुबाँ निभाती है

फिर वही सवेरा होगा, वैसी ही लालिमा हर ओर छायेगी
ठीक वैसा ही अदावती सूरज... हाँ! अदावती सूरज
ख़ामोशियों के आँगन में यूँ अचानक-सा निकलेगा
और उसकी धूपें आग-सा उफनकर तड़पायेगी
सही सुना! खूब तड़पायेगी वो भी इक "मासूम बेज़ार" को

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SIMRAN RAJ 1 APR AT 23:01

अपनी जान बुलाकर 'जान' लिया है गो जानने वालों ने
फिर कैसा तग़ाफुल, कैसी तल्ख़ियाँ करूँ अनजानों से

पेश आता है बसंत भी अब तो पतझड़ - सा रूख़ लिए
बावजूद कैफ़ियत पता कर लेते हैं हम उनके दीवानों से

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SIMRAN RAJ 1 APR AT 15:14

यूँ कहे तो वस्ल की शीतल छाँव में मोम - सा तो सब हो जाते हैं
हिज़्र की कड़वी धूप में मगर पारस को मैंने पिघलते देखा है
वो जो घूमते - फिरते हैं मुमताज - सी मुक़म्मल ख़्वाब लिए
पलकों की गीली ज़मीं पर वैसे ख़्वाबों को मैंने फिसलते देखा है
और ज़िंदगी की यह 'रंगमंच' इतनी रंगीन-सी लगती है मियाँ!
कि पलक झपकते ही यहाँ किरदारों को मैंने बदलते देखा है

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SIMRAN RAJ 29 MAR AT 23:46

तबाह कर दिया है सबके मशवरे ने ही मुझे
किसी दूसरे मशवरे की है अब ज़रूरत नहीं
बड़ा ख़ास ताल्लुक़ है अश्क़ों से मेरा साहब!
खुशियाँ वैसे भी गमों से ज़ियादा खूबसूरत नहीं

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SIMRAN RAJ 29 MAR AT 0:57

क्या सचमुच तन्हाई में खुद को खो देंगे ?

सिर्फ हँसते रहे हम तो जल्द ही रो देंगे

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SIMRAN RAJ 28 MAR AT 19:32

रंजिशें नहीं कि पूरी दुनिया ख़िलाफ़ है मेरे
रंजिशें तो ये है कि पहले हाथ तुमने छोड़ा
संभाल लेती गर किसी और से टूटा होता
हैरत तो ये है मगर कि मेरा दिल तुमने तोड़ा

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SIMRAN RAJ 27 MAR AT 19:23

कमबख़्त ज़िंदा तो हैं ही मगर ज़ी नहीं रहे हैं हम
कैसी प्यास है ? इक बूँद भी पी नहीं रहे हैं हम
सुना है ! वक़्त के साथ यहाँ सबकुछ बदल जाता है
किसने दिया ये ज़ख़्म है जिसको सी नहीं रहे हैं हम

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SIMRAN RAJ 27 MAR AT 18:17

उम्र के साथ नहीं , उम्र से ज़ियादा बड़ी है वो

सँवरकर काँटो-सा गो गुलाबों पर खड़ी है वो

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SIMRAN RAJ 25 MAR AT 20:04

जितनी मशक़्क़तें कर रहे हैं आज जीने के लिए

इतनी बंदिशें भी कहाँ थी पहले मरने के लिए

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