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SIMRAN RAJ (SIMRAN RAJ)

डर को डराओ
हार को हराओ
मतलब को मिटाओ
खुद को अपनाओ
SIMRAN RAJ 7 FEB AT 17:34

ज़िक्र तेरे गुलाब का करते-करते
न जाने कब...
खुद ही "एक कँटीली किताब" बन गई मैं
हाँ... हाँ...कोशिशें तो बेशुमार की मैंने
ये सोचने की कि फिर कभी ना सोचूँ तुम्हें
मगर ये क्या...यहाँ तो
तेरी कही हर उन खूबसूरत लफ्जों की
एक नामुमकिन ख्वाब बन गई मैं
...चाहत तो शायद कल भी नहीं थी मेरी
तुमसे कुछ भी लेने की
मगर न जाने कब...
तुम्हारी दी हुई उन खट्टी-मीठी खुशियों की
एक सरल हिसाब बन गई मैं
हाँ...हाँ...सच कह रही हूँ...
बड़ी कोशिश की मैंने "दूर रहने" की तुमसे
मगर न जाने कब...
तेरी खुशबू से टकरा गई मैं और...
...और... मदहोशी की हालत में...जाम की जगह
...शायद तुम्हारी दी हुई
खिलखिलाती-मुस्कुराती नशीली अश्क पी ली मैंने
तभी तो भरी ये महफिल कहती है मुझसे
कि एक तड़पती हुई शराब बन गई हूँ मैं




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SIMRAN RAJ 5 FEB AT 9:20


...और उसने तो उनके लिए खुद को ही "फना" कर दिया

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SIMRAN RAJ 4 FEB AT 15:43

अभी तो दायरों की बेड़ियाँ मेरे पगों में जकड़ी ही हुई थी
तभी दहलीज के पार कदम रख उनके गुनाहगार बन गए हम
विश्वाश करने की मुझपर अभी तो वो सोच ही रहे थे
कि उससे पहले ही...
उनकी भावनाओं के साथ विश्वाशघात कर खुद की नजरों में ही मक्कार बन गए हम

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SIMRAN RAJ 2 FEB AT 12:30

नजरअंदाज कर अपनी वो गुजरी हुई बेमिसाल-सी जिंदगी उस जमाने की
हाँ...शुरु की है कोशिश मैंने भी खुद को भुलाकर खुद को अपनाने की

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SIMRAN RAJ 1 FEB AT 15:41


सिमरन से राज
सिमरन से राज

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SIMRAN RAJ 1 FEB AT 0:34

...और कितना जख्म-ए-पैगाम ढाहोगी ऐ प्रिय जिंदगी!
डर जाऊँ तुम्हारे इन नाजुक इम्तिहान-ए-ऐलान से तुम जैसी मैं कायर नहीं
चुरा लूँ किसी और की खूबसूरत अंदाज-ए-शायरी वैसी मैं शायर नहीं

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SIMRAN RAJ 28 JAN AT 0:57

...ओह!
जालिम-सी इन खुशियों ने ही दस्तक दे दी पहले
लगता है...
वो अनोखे-मीठे दर्द अभी दरवाजे पर ही हैं

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SIMRAN RAJ 27 JAN AT 0:22

हाँ...सच कह रही हूँ
बेशक चुरा लेती जबरदस्ती तेरे दिल को
अगर बात मोहब्बत की ना होती...

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SIMRAN RAJ 26 JAN AT 23:25

रोगी तो इश्क के हम दोनों ही थें
बस दवाएँ हमारी अलग-अलग थीं

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SIMRAN RAJ 26 JAN AT 21:01

...अभी तो हाल-चाल पूछ ही रही थी
अपनी उन ज़ख़्मी खुशियों से
जो खूब गले मिलकर आई थीं उनसे
तभी मेरी लेखनी ने उन कोरे कागजों पर
मरहम लगाना शुरू कर दिया
...और लगाते-लगाते यूँ सिसक पड़ी और
चुपके-से ही मुझसे एक सवाल पूछी कि
क्यूँ...आखिर क्यूँ...
क्यूँ वो खिलखिलाती-मुस्कुराती-खूबसूरत-सी
अश्क भरी तुम्हारी कातिल निगाहें
भरी महफिल को गुमराह कर आती हैं
...और कब समझोगी तुम ये
कि तुम्हारी यही बेख़ौफ मुस्कुराहट
तुम्हें तुम्हारी तड़पती हुई इश्क के सामने
सिमरन से राज बना जाती है

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