Shubhanshu Chauhan   (Mr. Vegan Shubhanshu SC 2020©)
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Joined 10 July 2017


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Joined 10 July 2017
Shubhanshu Chauhan 16 JUN AT 17:09

जब भी इंसान अपनी खुद की नहीं सुनता तो वह दूसरों की सुनने लगता है और फिर खुद को भूल कर कृत्रिमता लिये नकली समाज की गुलामी करने लगता है। खुद के मन को रोज कत्ल करने की सबकी औकात नहीं होती तो वे खुद को कत्ल कर लेते हैं।

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Shubhanshu Chauhan 4 JUN AT 12:19

तुम दिन में अक्सर मुझे पाओगे तन्हा,
इसलिये नहीं कि लोगों को मेरी ज़रूरत नहीं,
बल्कि इसलिए क्योंकि उनको सिर्फ मेरी ज़रूरत ही है।

रातों को भी अक्सर तन्हा पाओगे, इसलिये नहीं कि मैं आकर्षक नहीं हूँ, बल्कि इसलिये क्योंकि मैं बस आकर्षक ही हूँ।

प्यार करने के लिये किसी का, खुद के लिए बुरा होना ज़रूरी है। ताकि हमें उसके प्रति दया उत्तपन्न हो। उसकी परवाह होने लगे। इसीलिए बुराई खत्म नहीं होती, क्योंकि उसकी ज़रूरत है, प्रेम उतपन्न करने हेतु।
जो खुद के लिये अच्छा हो, उसे लोग सिर्फ इस्तेमाल करते हैं।

मैं इस्तेमाल नहीं होना चाहता, मैं प्रेम को बुराई से शुरू नहीं करना चाहता, मैं अच्छे और समान विचारों से अपनापन चाहता हूँ और लोग बस भीड़ चाहते हैं। किसी भी तरह बुलाई हुई। ताकि खुद को साबित कर सकें कि उनकी भी लोगों को ज़रूरत है।

और मैं, इस ज़रूरत से ही भाग आया। मैं कोई उत्पाद नहीं। मैं एक खूबसूरत विचारों वाला इंसान हूँ और अपने जैसे ही खूबसूरत इंसानों के साथ जश्न मनाता हूँ। और जब तक वे नहीं मिलते, मैं तन्हा रहूँगा। व्यर्थ के शोरशराबे और हिंसा से, मेरी तन्हाई अच्छी।

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Shubhanshu Chauhan 25 MAY 2019 AT 19:48

व्यक्ति 1: शुभ तुम्हारा घमंड तुमको बर्बाद कर देगा।
5 साल बाद:
शुभ: स्वास्थ्य, समृद्धि और बुद्धि बढ़ी।
व्यक्ति 1: बर्बाद।
व्यक्ति 2: शुभ तुम्हारा घमंड तुमको बर्बाद कर देगा।
5 साल बाद:
शुभ: स्वास्थ्य, समृद्धि और बुद्धि बढ़ी।
व्यक्ति 2: बर्बाद।
व्यक्ति 3: शुभ तुम्हारा घमंड तुमको बर्बाद कर देगा।
5 साल बाद:
शुभ: स्वास्थ्य, समृद्धि और बुद्धि बढ़ी।
व्यक्ति 3: बर्बाद।
अभी तक 234 लोग बर्बाद हुए, मुझे मेरी स्वतंत्रता के अनुसार जीवन जीने पर टोक कर। अभी भी गिनती जारी है। आओ जी आओ, आप भी हाथ साफ करके जाना।

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Shubhanshu Chauhan 24 MAY 2019 AT 18:05

नाली का कीड़ा जब बड़ा हो जाता है तो वह नाले पर भी कब्जा करने और खुद नेता बनने के लिए प्रचार करता है। जबकि नेता को जनता खुद घर से निकाल कर चुनती, तब कोई बात भी होती। खुद ही अपनी जय जय करने-करवाने, ऐंठने, गुंडागर्दी करने वाले लोग, नेता बन कर दादागिरी और धंधा पेलने के अलावा और कुछ करने नहीं आते।

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Shubhanshu Chauhan 23 MAY 2019 AT 15:54

दुष्प्रचार ही प्रचार है।

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Shubhanshu Chauhan 22 MAY 2019 AT 19:00

डैशिंग लड़का: शुभाँशु जैसे मोटे, दढ़ियल, राक्षसी चेहरे वाले में ऐसा क्या है जो मेरे में नहीं?

मेरी मित्री: ईमानदार, दूसरों को समझने वाला, सम्मान करने वाला, intelligent, knowledged और healthy vegan है वो। तेरी तरह तूतिया नहीं। लड़कियों को लड़कों में एक अच्छा इंसान और दोस्त चाहिए होता है न कि looks. समझा?

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Shubhanshu Chauhan 21 MAY 2019 AT 23:32

जानवर था इंसान भी पहले। फिर कुछ मुट्ठी भर लोगों ने आलस के मारे सुविधाओं का आविष्कार किया। उनका उपयोग करके मानव धीरे-धीरे उन चंद लोगों के दम पर खुद को श्रेष्ठ समझने लगा। फिर उसको जानवरों, जंगल, अपनी मातृभूमि से इतनी नफरत हो गई कि वह उस जगह को ही नष्ट करके अपना एक अलग जीवन जीने लगा। लेकिन उसमें उन विद्वान लोगों जितनी बुद्धि नहीं थी। अतः उन्होंने बुद्धिमान लोगों से मिले आईडिया को तो खरीदा लेकिन अपनी कम बुद्धि के कारण और एहसान फरामोश स्वभाव के कारण उनके एहसानों को काल्पनिक नाम बना कर उसे ही सारा श्रेय देना शुरू कर दिया।

इस तरह से एहसान फरामोशों के गुट बन गए, जो खुद को उन बेचारे विद्वान लोगों के दम पर श्रेष्ठ और खास बता कर उनको साधारण बताने लगे ताकि उनकी खुद की अयोग्यता छुप जाए।

कोई खास शक्ति उन चंद विद्वान लोगों को ज्ञान दे रही है यह कह कर उन्होंने धर्म ग्रँथ और धर्मस्थल बनाये और लोगों को भी वह शक्ति दिलवाने का लालच देने लगे। यही परिघटना धर्म कहलाई और इससे बना कृतघ्न समाज कहलाया धार्मिक समाज।

इस कृतघ्नता को खत्म करने के लिए इस अंधविश्वास को खत्म करना ही होगा कि कोई शक्ति योग्यता उतपन्न करती है। यही है विज्ञानवाद। हम विज्ञानवादी, धर्ममुक्त हैं। हम केवल सत्य को मानते हैं और आप विरोधी जन, कुछ भी मानिए, चाहें कुएं में कूद जाइये। हमें घण्टा फर्क नहीं पड़ता। नमस्ते।

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Shubhanshu Chauhan 20 MAY 2019 AT 16:49

तुझे लगता है कि ये
पहले से लिखी हुई है,
और मुझे लगता है कि
मैं रोज इसे लिख रहा हूँ।

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Shubhanshu Chauhan 20 MAY 2019 AT 11:35

विद्वान: आप मारते कम, डराते ज्यादा हो।
शुभ: मुझे खून-खराबा पसंद नहीं। आप बताओ, आपका डरना बेहतर है या मेरे हाथों मरना?





विद्वान:

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Shubhanshu Chauhan 20 MAY 2019 AT 9:50

मैं मीठा नहीं,
ये सच है।
मुझे बदलोगे,
तो तुम ही,
बदल जाओगे।
ये रक्त,
ज़हरबुझा है।
एक छींटा भी उड़ा और
तुम पर गिरा तो वहीं
गल जाओगे।

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