Delhi_NCR #3611 (part-1)
12th के बाद, जब पहली बार घर से निकला था,
ना हिम्मत ज्यादा थी, ना समझ पूरी…
बस एक छोटा सा decision था—
‘निकलना है… देखते हैं क्या होता है।’
Delhi NCR… तब एक शहर नहीं,
एक आवाज था—
तेज, भागता हुआ, और मैं… उस भीड़ में खुद को ढूंढता हुआ।
शुरू में सब अजनबी था—
रास्ते भी, लोग भी, और शायद मैं खुद भी।
फिर धीरे-धीरे…
यही भीड़ पहचान बन गई, यही रास्ते आदत बन गए,
और मैं…
थोड़ा-थोड़ा समझ आने लगा।
Metro के सफर में,
खुद से मिलना सीखा,
अकेली रातों में,
खुद को संभालना सीखा।
Notebandi आई, चली गई,
Covid ने शहर रोक दिया,
पर वक्त…
वो चलता रहा,
और मैं भी उसके साथ।
घर कभी छूटा नहीं,
पर जिंदगी यहीं बसी रही,
5–10 दिन के लिए वापस जाते थे,
पर असली दिन…
यहीं कट-ते रहे।- Shivanshu Mishra(S.B)
8 APR AT 21:16