Shamsher Khan   (Shamsher Khan شمشیر خان)
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Joined 14 July 2018


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Joined 14 July 2018
Shamsher Khan 29 MAY AT 21:16

तनहा हि रहा हूँ कोई हम-साज़ नहीं है
चेहरे हैं कई पर कोई हम-राज़ नहीं है

पाने की तलब रखती है वो शाह जहाँ को
कह दो उसे कोई, कि वो मुमताज़ नहीं है!

चेहरे पे लिखा है मिरी तनहाई का आलम
तनहाई मीरी आज कोई राज़ नहीं है

कुछ रोज़ की बंदिश में ये समझा है ज़हन ने
ख़ुद खाने-कमाने में हि एजाज़ नहीं है!

माना कि ज़रूरी है क़लम मेरे सफ़र में
पर सिर्फ़ क़लम से मिरी परवाज़ नहीं है!

करता है सितम करले तू पर भूल न जाना
अल्लाह की लाठी में भी आवाज़ नहीं है

कहते हो कि शमशेर की परवाज़ है ऊँची
मैं अब भी ज़मीं पर हूँ, ये परवाज़ नहीं है!

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Shamsher Khan 19 MAY AT 20:28

मंज़िलें खोई हुई हैं रास्ता कोई नहीं!!
रहबरों का देश से अब वास्ता कोई नहीं

منزلیں کھوئی ہوئی ہیں راستہ کوئی نہیں
رہبروں کا دیش سے اب واسطہ کوئی نہیں

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Shamsher Khan 15 MAY AT 21:08

जहाँ रूठ जाए, अगर तू ख़फ़ा हो
तिरा शुक्र लफ़्ज़ों में कैसे अदा हो

ज़मीनो फ़लक़ में है तेरी ख़ुदाई फ़रिश्तों को दी है ज़मीं तक रसाई
ज़हेर को तु चाहे तो कर दे दवाई ग़मों से भी चाहे तो कर दे रिहाई

हमेशा अक़ीदत में ये सर झुका हो
तिरा शुक्र लफ़्ज़ों में कैसे अदा हो

खुदाया मुझे तूने सब कुछ दिया है जो है पास मेरे तिरा ही किया है
अंधेरों में तेरे हि दम से ज़िया है तेरा नाम हमने हमेशा लिया है

मिरी आख़िरत भी यूँही ख़ुशनुमा हो
तिरा शुक्र लफ़्ज़ों में कैसे अदा हो

भँवर में है कश्ती, दिखा दे किनारा तू ही ना-ख़ुदा है, तू ही है सहारा
भटकती है उम्मत यहाँ बेसहारा इस उम्मत को फिरसे उठा दे दुबारा

हमें माफ़ कर दे, अगर तू ख़फ़ा हो
तिरा शुक्र लफ़्ज़ों में कैसे अदा हो

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Shamsher Khan 11 MAY AT 16:36

अपनी बीनाई लुटा डाली वो रोया इस क़दर
तुम बताओ उल्फ़तों में कौन खोया इस क़दर

आदमी में आदमी दिखता नहीं है अब हमें!
मीडिया ने दिल में नफ़रत को है बोया इस क़दर

गर्द रिश्तों पर जमी थी, जो भी वो सब धूल गई
बाद मुद्दत आज मैं रोया तो रोया इस क़दर

रात भर हंस हंस के जो करता था बातें यार से
सब परेशां हैं वो कैसे आज सोया इस क़दर!

जो छुपा शैतान था उसको फ़रिश्ता कर दिया!
मीडिया ने खून के धब्बों को धोया इस क़दर!!

डर है ये शमशेर को तू भी कहीं ना छोड़ दे
चाहने वालों को रस्ते में है खोया इस क़दर !!

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Shamsher Khan 8 MAY AT 22:03

पाने की तलब रखती है वो शाह जहाँ को
कह दो उसे कोई, कि वो मुमताज़ नहीं है!

پانے کی طلب رکھتی ہے وہ شاہ جہاں کو!
کہہ دو اُسے کوئی کہ وہ ممتاز نہیں ہے!

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Shamsher Khan 5 MAY AT 21:26

आदमी में आदमी दिखता नहीं है अब हमें!
मीडिया ने दिल में नफ़रत को है बोया इस क़दर

آدمی میں آدمی دکھتا نہیں ہے اب ہمیں
میڈیا نے دل میں نفرت کو ہے بویا اس قدر

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Shamsher Khan 3 MAY AT 20:03

बसाया जिस ने सीने में तिरा फ़ुरक़ान हो या रब
दुआ है रोज़ ही ऐसा कोई मेहमान हो या रब

तरीक़ा माँगने का तुझसे आता ही नहीं मुझको
तु बस उतना अता कर दे, जो तेरी शान हो या रब

मैं इक भटका मुसाफ़िर हूँ मुझे तू राह दिखला दे
अंधेरों में नसीहत को तिरा क़ुरआन हो या रब

मिटा दे सब गुनाहों को, भुला दे सब ख़ताओं को
किसे मालूम.... मेरा आख़री रमज़ान हो या रब!!

है ये शमशेर की कोशिश, ज़बाँ मैं सीख लूँ अरबी
बज़ाते खुद समझ लूँ, जो तिरा फ़रमान हो या रब

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Shamsher Khan 2 MAY AT 12:34

तरीक़ा माँगने का तुझसे आता ही नहीं मुझको
तु बस उतना अता कर दे, जो तेरी शान हो या रब

मिटा दे सब गुनाहों को, भुला दे सब ख़ताओं को
किसे मालूम.... मेरा आख़री रमज़ान हो या रब!!

طریقہ مانگنے کا تجھ سے آتا ہی نہیں مجھ کو
تُو بس اُتنا عطا کردے جو تیری شان ہو یا رب!

مِٹا رے سب گناہوں کو، بھُلا دے سب خطاؤں کو
کِسے معلوم.... میرا آخری رمضان ہو یا رب!

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Shamsher Khan 29 APR AT 20:54

अभी हारा नहीं हूँ मैं!

ज़माने को बताना है, अभी हारा नहीं हूँ मैं!
मुझे उठ कर दिखाना है, अभी हारा नहीं हूँ मैं!

ज़हेन से जो अपाहिज थे वो मालिक बन के बैठे हैं
मुझे घर को बचाना है, अभी हारा नहीं हूँ मैं!

क़लम जब तक सलामत है, अपाहिज मत कहो मुझको
मिरे पीछे ज़माना है, अभी हारा नहीं हूँ मैं!

मिरे हाथों को छीना है, इरादे छीन ना पाया
तुझे इक दिन हराना है, अभी हारा नहीं हूँ मैं!

ये मेरे पर सलामत हैं मुझे पैरों से क्या लेना
मुझे उड़ कर दिखाना है अभी हारा नहीं हूँ मैं

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Shamsher Khan 28 APR AT 21:11

अपाहिज

मैं हूँ मजबूर पैरों से, क़लम ही मेरी ताक़त है,
ज़हेन से जो अपाहिज हैं उन्हें माज़ूर लिखता हूँ!

میں ہوں مجبور پیروں سے، قلم ہی میری طاقت ہے
ذہن سے جو اپاہج ہیں اُنھیں معزور لکھتا ہوں!

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