Santosh Doneria   (सन्तोष दौनेरिया)
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Joined 7 October 2020


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Joined 7 October 2020
20 JUN AT 20:52

परिवार सोचा करते थे कि सेना की नौकरी है
सालों के लिए बच्चे हमसे दूर चले जाएँगे
शुक्र है 'अग्निपथ' का कि
अब काहे तुम से दूर चले जाएँगे
चट मंगनी पट ब्याह की तर्ज़ पर
चट ज्वानिंग पट रिटायरमेंट ले
अपने अग्निवीर भाजपा दफ़्तर में
सिक्योरिटी गार्ड बन जाएँगे
और अपने परिवार संग मुफ़लिसी में
बड़े फ़ख़्र से ख़ुशियों भरा जीवन बिताएँगे
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-सन्तोष दौनेरिया

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15 JUN AT 11:21

वो जो हमें आईना दिखाने लाए हैं,
चेहरे पे ख़ुशी इनके मेरी जान ज़रा देखो।
अरे! ख़ामियाँ किस में नहीं हैं,
यारा अपना भी गरेबान ज़रा देखो।
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-सन्तोष दौनेरिया

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14 JUN AT 10:15

अजब शय है ये दुनिया
देख अभी यहाँ क्या क्या करना है

दुनिया किराए का घर है
साँसें देकर किराया अदा करना है
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-सन्तोष दौनेरिया — % &

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12 JUN AT 19:07

तुमने कब चाहा कि तेरे नाम का मैं श्रंगार करूँ
तेरा घर आबाद करूं, तेरा आँगन गुलज़ार करूँ

हँसती आँखें आँसू पी कर फिर भी तुमसे प्यार करे
टूटा दिल अब भी चाहे प्यार तुझी से हर बार करूँ
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-सन्तोष दौनेरिया— % &

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9 JUN AT 18:40

आज कुछ हँसना मुस्कुराना चाहते हैं
एक अलग दुनिया बसाना चाहते हैं

थोड़ा खुशियों का ख़ज़ाना चाहते हैं
हम अपने गाँव लौट जाना चाहते हैं

वहाँ जो मेरे पुरखों का खाली मकाँ है
उसी अँबुआ तले आशियाना चाहते हैं
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-सन्तोष दौनेरिया

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9 JUN AT 14:32

उम्र के समुंदर में, वक़्त के बहाव पर
बेवज़ह चल रहा हूँ मै ज़िंदगी की नाव पर
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-सन्तोष दौनेरिया — % &

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8 JUN AT 9:52

आप के संग ही मेरी खुशियों में झंकार बहुत है
आपका साथ है तो ख़ुशियों का विस्तार बहुत है

आप के प्यार की ख़ुशबू से महका है चमन मेरा
मानो ख़िज़ाँ के मौसमों में आई बहार बहुत है

मेरी ज़िन्दगी में जब से आपका आना हुआ है
जिधर भी देखता हूँ उधर प्यार ही प्यार बहुत है
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-सन्तोष दौनेरिया — % &

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7 JUN AT 14:51

मुसीबतों का वक़्त आया तो अपनों को जान गए हम
चलो अच्छा हुआ कम से कम दुनिया पहचान गए हम
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-सन्तोष दौनेरिया — % &

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7 JUN AT 12:46

बे-सबब तो कभी बे-इरादा ऐ राही तू चलता चल
पाँव में लिपटा है एक सफ़र तो भाई तू चलता चल

कोई नहीं साथ तेरे फिर भी रास्ता तो चलता है
सुन मेरी बात ऐ रास्ते के सिपाही तू चलता चल

दर्द-ओ-ग़म के मौसम हैं ये, कभी बदलते कहाँ है
अब कोई भी हो मौसम या-इलाही तू चलता चल
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-सन्तोष दौनेरिया — % &

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2 JUN AT 18:54

ज़िंदगी एक लम्बा सफ़र है कभी गिरते कभी सँभलते रहो जी
किसका रस्ता देख रहे हो अकेले हो तो अकेले चलते रहो जी

ये शाम के साए ये धुँदलका और ये हर ओर ख़ामुशी का शोर
अंधेरों के आंचल तले ही जब टहलना है तो टहलते रहो जी

वक़्त-ए-मुश्किल हालात-ए-ज़िंदगी बदलना न हो मुमकिन
फिर यही कीजे कि ख़ुद ही वक़्त के साँचों में ढलते रहो जी
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-सन्तोष दौनेरिया
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