जाने-अनजाने एक कलिमा बनने लगा
कारीगिरी बेशक़ ख़ूबसूरत थी,
पर बेग़ैरत उस नज़र ने अपनी नज़र लगा दी,
कि लफ्ज़ भी अब बिखरने लगे,
और गुफ़्तगू तो गुज़रे ज़माने की इक बात हो गई,
अफ़साना ये हसीन था,
पर कलम में स्याही कुछ ही शेष थी,
तो रोमा इस फ़साने को एक ख़ूबसूरत मोड़ दो
और अधूरा छोड़ कर ही इसे और गुलज़ार बना दो।- ©Sanjana Saxena
21 MAY 2023 AT 3:00