Sandhya Jain   (Sandhya)
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Lecturer by profession.
Learner by nature.
Writer by instinct.
Joined 25 January 2018


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Sandhya Jain 29 MAY AT 21:50

मुझे अभी और एकांत लगेगा
ये काम पूरा करने में...
तुम्हारी यादें इतनी है
कि किसे दोहराऊं किसे छोड़ू।
कैसे दोहरान पूरा करूँ।

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Sandhya Jain 29 MAY AT 21:48

विस्मृतियों के गुच्छे से..
वैसे तो निकली जा सकती है
कुछ खास लम्हों की स्मृतियाँ..
निकालते वक़्त
बस उंगलियों में..
सावधानी से,
पहनना होगा एकांत..!!

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Sandhya Jain 29 MAY AT 21:46

अपने इस खूब सारे खाली वक़्त में
किसे दी स्वीकृति तुमने
अपने सबसे करीब होने की...
अधिकतर जवान अपना मोबाइल कम्प्यूटर टीवी कहेंगे
बुजुर्गों ने अपना लिए रामायण - महाभारत
बड़े कर रहे है स्वाद और बातों के साथ प्रयोग
बच्चों ने खोज लिए खोये हुए खेल
किताबे रंग कलम कलाएं
इन्होंने भी संभाला होगा किसी को
कोई ऐसा भी रहा होगा जो इस खूब सारे खुद के वक़्त में
खुद को अपना रहा होगा।
मुझे डर उन कुछ लोगों के लिए है
जिन्हें इस खूब सारे वक़्त में भी, वक़्त न मिलता होगा ।

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Sandhya Jain 29 MAY AT 18:37

मैं नही जानता तुझसे प्यार है या नही, बस ये पता है
कोई और साथ मे खड़ा हो तो उससे नफरत होगी।

तू करले अपनी पलके बन्द, और नजर फेर लें, मगर
तेरे बिना भी मेरी बातें तो, तुझसे ही हर वक़्त होगी।

नाराज़ हूँ आज पूरे दिन कोई बात नहीं, पता नही था
तुझपर की गयी ये सख़्ती, मुझपर इतनी सख्त होगी।

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Sandhya Jain 21 MAY AT 0:36

तेरे नाम का
तोहफा
सहेज कर सालो से रखा गया...
...पहला बोसा
झांकता तकिये के नीचे से
तकता चाँद को
कभी मुझे
कभी रात को..
इस बिस्तर पर
असहज
सही जगह इसकी
बस
तेरे होठ है..

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Sandhya Jain 19 MAY AT 21:25

सुनसान है सड़के, आवाज़े कम है
मगर खून दिखता है धूप में, मुझे।

शोर मचाती है फुसफुसाहटें....
ये कौम है हत्यारी, इन्हें खत्म करो ।
नही,ये हमें मार डालेंगे, इन्हें खत्म करो ।
गले फाड़ती है चीत्कारें,
सुनसान है सड़के, आवाज़े कम है
मगर खून दिखता है धूप में, मुझे

चिल्लाती है खबरें....
हिन्दू ने मुसलमान को मारा है।
मुसलमान ने भीड़ को भड़काया है।
और आदमी खड़ा रहम रहम पुकारे,
सुनसान है सड़के, आवाज़े कम है
मगर खून दिखता है धूप में, मुझे।

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Sandhya Jain 19 MAY AT 20:59

ये कौनसा प्याला बढ़ाया है
हाथ मे लेते ही नशा हो गया..

क्या मिलाया बातों में
कि प्याले का नशा सफा हो गया..

उंगलियां डुबोई है कौनसी शराब में
कि चढ़ी हुई बाते उतरने लगी है..

होठों में क्या लगाया ऐसा कि
चूमते ही उंगलियां फिसलने लगी है..

ना जाने कौनसा जहर है या कहर है
तेरा इश्क़
कि हाथ से देह पिघलने लगी है..!

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Sandhya Jain 19 MAY AT 19:48

वो पूछता ही रहा..
"क्या मुझसे प्रेम करती हो?"

मैं करती रही
बिना उसे कहे...

ना समझी का नाटक उसका
समझदारी का नाटक मेरा

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Sandhya Jain 19 MAY AT 19:47

वो कहता रहा सोच लो
तुम आगे नही बढ़ पाओगी...

मैंने कहा कोशिश कर लू,
तब भी रुक नही पाऊंगी...

उसने कहा बहुत तकलीफ होगी
मैंने कहा मैं सम्भल जाऊंगी..
उसने कहा मैं आवारा हूँ, बंजारा हूँ
मैंने कहा मैं तुम में घर बनाउंगी..

पलट कर अब देखती हूं तो
कितने खोखले थे मेरे दावे...
कितने सच उसके सवाल...!
वो गुजर चुका था इन राहो में...
मैं बह रही थी पहले इश्क़ की बाहों में!!

जाने अब कहा होगा...
वो जो जानता था....
ये इश्क़ पूरा न होगा......!!

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Sandhya Jain 19 MAY AT 19:45

बाते
प्रेम की बस्ती की लोक देवियां
जिनकी ड्योढ़ी पर अक्सर ही देर रात तक
चढ़ता प्रसाद...

बाते
प्रेम के समंदर की लहरें
जिन पर सवार होकर ही
कभी डूबती
कभी तरती नाव...

बाते
प्रेम का पूरा शहर
जिसमें रहते इस दुनिया से भागे लोग
तुम्हारी हदों से आगे के लोग ।

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