Sandhya Jain   (Sandhya)
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Lecturer by profession.
Learner by nature.
Writer by instinct.
Joined 25 January 2018


Lecturer by profession.
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Sandhya Jain 6 OCT AT 19:50

Like a few
I met the wind.

With no shape to be seen
That day
I tried as I was keen.
And I felt it grinned
Thus I met the wind.

One moment it was sharp but soothing,
On other smooth and serene;
With its midges and mites, and particles in thousands unseen.
Yet so forceful to calm anything;
It makes everything lively
The way it sings...

Harsh only to bring rain and ring
This is how I met the wind.

I heard it called
I felt its song
It made flowers dance
However it was all by chance
In front of a few it was revealed
That being a lucky day
I met the wind.

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Sandhya Jain 24 SEP AT 19:00

यहाँ सुबह साढ़े छः बजे
सूरज की दिशा में
समय चलता है
चौड़ी चौड़ी सड़कों पर

और स्कूटरों पर सवार कबूतर और एक दो चिड़ियाएँ
बैग उठाकर
बढ़ते हैं
राशन लाने
पीछे वालो के लिए

और कुछ कुत्तें और बिल्लियाँ
मोड़ पर सोये हुए चमक जाते है..
अचानक उठकर भाग जाते है..
चौड़े चौड़े खेतों में
जहाँ से
किसी मरे हुए जानवर की बू आती हैं
वो बू
जो खेतों के धान में समाती है
वही धान
जो आटे की चक्की में जाकर पिसता है
और थालियों में गिरता है।

थालियों से सीधे पहुँच जाता है रगो में
जहाँ बड़े जतन से पाला जाता है
और फिर निकाल दिया जाता है
जानवर की बू वाला श्वास जुबाँ से..!

•••●•••

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Sandhya Jain 8 SEP AT 7:17

हाँ असफलता है मानव के लिए

पर शायद सफलता है
चाँद के लिए
या अंतरिक्ष के लिए
या ब्रम्हांड के लिए
वो नही चाहते सामने आना
या नही चाहते जाने जाना
अपनी चिर शांति में पाल रहे है जीवन
हर जगह संतुलित होकर
उनके शांत कक्षों में
नही पसंद करते घुसपैठ होना
अपने दिल में मशीनों का चलना
और धड़कनों का शोध का विषय बन जाना
अंतरिक्ष शून्य है
शायद
उसे नही है पसंद गणित और गिना जाना।

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Sandhya Jain 23 AUG AT 21:47

बस एक दिन भर की ही तो दूरी है
मुझमे और चाँद में..!
..
कोई तरकीब, कोई ज्ञान
कोई विज्ञान..
बिना जाने..
प्रकाश वर्ष की दूरियां भी
आँखों की जरीब यूं नाप लेती है..
..
आँखों के लिए दूरियां
कुछ नही बस, प्रेम-अभिक्रिया की उत्प्रेरक है।

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Sandhya Jain 22 AUG AT 22:44

विश्व के सारे दरिया और सारे सागर
सहारा पाते है
एक तरफा प्रेम में पड़े चेहरे पर
होठों के किनारें खिंच जाने से
बन जाने वाली नाव से.. ☺️
साहिल पर खड़े प्रेमी को देखकर
..
इसी नाव में कई समंदर बच गए है..
और एक दो छोटी मछलियां
डूब कर मर भी गयी है।

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Sandhya Jain 28 JUL AT 22:45

चित्र
जो कभी नही खिंचे हमने साथ में
आज भी छपे है सबसे गहरे रंगों में...!!

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Sandhya Jain 23 JUL AT 16:43

समयरेखा के पार
ठहरावों के बीच
कमर पर हाथ रखकर
नाचता है प्रेम...

तो तुम
संसार की इस गति में कैसे ढूंढ लोगे, कहो!

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Sandhya Jain 7 JUL AT 10:10

जितने भी दिल जले
और जो नग़मे लिखे गए
हर ज़बान में
हर दिल पर निशान छोड़ गए..
असरात कम हुए इनके तो
बस बेजुबानों के दर्द के आगे...!!

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Sandhya Jain 21 JUN AT 0:01

सिरफ़िरे आदेशों वाले
कुर्सियों के दफ्तर में
एक जोड़ा चप्पल
और एक जोड़ा हौसला
घिसते घिसते
आकार बदल कर
या तो रूद्ध हो जाते है
या विरुद्ध हो जाते है...

इस देश के दिन ही है ऐसे कि
मुँह जिनके बड़े हो
कान उन नेताओं के अवरुद्ध हो जाते है।

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Sandhya Jain 5 JUN AT 9:38

कुछ औरतें एक अंगूठी से खुश हो जाती हैं
और कुछ एक अंगीठी से...।

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