Sakhi Bansal❦   (The Phoenix🍁)
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Joined 14 January 2019


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19 SEP AT 15:59

कहां से आता धूप में कुछ रंग
उनकी चुनरी के सारे ही रंग पीले हैं

आज बारिशें भी सोच कर होंगी
होंठ भीगे है, आंख नम-ओ-बाल गीले हैं

नहीं गाती ये कोयल की वो शर्मिंदा है
मेरे महबूब के सारे ही सुर सुरीलें हैं

शराब से भला होगा मुझे नशा अब क्यूं
की उनके होंठ मयकशी से भी नशीले हैं

रात महताब नही आया छत पे पूनम थी
उनके बाब-ए-दिद दो चांद नीले नीले हैं

नही जो मरते छुरी से, खंजर से, तलवारों से
वो ज़रा दूर रहें कि उनके नाख़ून भी नुकीले हैं

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17 SEP AT 20:46

शाम भारी है, दिल खाली है, रूह बोझल है बोहोत
वो जो सुकून दे मुझको, आंख से ओझल है बोहोत

मैं उसको कैसे मनाऊं, बुलाऊं, कैसे बताऊं उसको
वो सता ले मुझको जी भर के, पर कैसे सताऊं उसको

उसने दिल्लगी की थी मैं क्यों दिल लगा बैठी
कसक ऐसी थी कि मैं उस के पास जा बैठी

वो कहे लाख दफा कायनात हूं मैं उसके लिए
मुझे पता है बस इक आदात हूं मैं उसके लिए

सिलसिला ये भी खतम होना है, होगा इक दिन
मेरे वजूद पे ज़ख्म होना है, होगा इक दिन

मगर फिल्हाल तुम मेरे हो, मेरी आगोश रहो
कुछ नही और बस बिछड़ने तक खामोश रहो

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17 SEP AT 5:29

तुम रू-ब-रू मिले
जब जब भी देखा आइना
तुम हू-ब-हू मिले

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17 SEP AT 0:41

कबसे धूप निकली है, चलो कुछ रात तो करें
ज़हन में कितनी चुप्पी है, चलो कुछ बात तो करें

कभी तुम मेरे दर आओ, कभी मैं तेरी चौखट पे
कुछ गुंजाइश रहे तो रहे, चलो मुलाकात तो करें

मिज़ाज ठीक है मेरा, तुम्हारी तबियत कैसी है
अकेले कैसे जिंदा हैं, कुछ मालूमात तो करें

क्यूं फ़रार ना हो हम, या मर जाएं ज़हर खा के
हो इश्क़ मशहूर अपना भी, कोई वारदात तो करें

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16 SEP AT 5:28

वो तेरी बज़्म में
जागने के ज़माने थे
तेरी जुल्फें थी बिखरी
और मज़बूत मेरे शाने थे
आगाज़ था वो मोहब्बत का
पर इन्तेहा हो गई
जब खबर ये हुई
अभी तूफ़ान और आने थे

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14 SEP AT 23:12


वो फकीरों को खाना खिलाती रहेगी
और प्यासों को पानी पिलाती रहेगी
इस बेरहम ज़माने में रहमदिल है वो
पगली हमेशा यूंही जज़्बाती रहेगी

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13 SEP AT 2:07

मैंने मोहब्ब्त में बस एक शर्त रखी
की मोहब्ब्त में कभी कोई शर्त ना रखना

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12 SEP AT 17:26

तस्वी पे मेरा नाम दोहराती रहेगी
हिज्र की रातें घटाती रहेगी
में तेरी मोहब्ब्त का सदका मांगता हूं
कब तलक अना से हसरत को हारती रहेगी

क्या हमेशा दर्द-ए-दिल को दबाती रहेगी
अपनी ख्वाइशों को दरिया में डुबाती रहेगी
कभी तो शोर कर और चीख उठ
कब तक खामोशी से काम चलाती रहेगी

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11 SEP AT 1:24

वो बनके फिज़ा खिलखिलाती रहेगी
मेरे कानों में कुछ गुनगुनाती रहेगी
गम-ए-हिज्र है पर जुदा नही है वो
वो ज़हन में यकसर मुस्कुराती रहेगी

वो नूर-ए-नज़र तिलस्माती रहेगी
वो बन के सितारा टिमटिमाती रहेगी
मैं जाऊं जहां भी मेरे साथ है वो
वो शब-ए-महताब काएनाती रहेगी

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9 SEP AT 21:27

हथेली से किस्मत मिलाती रहेगी
मेरा नाम वो लिख कर मिटाती रहेगी
कभी किसी मोड़ पर रूबरू तो मिल
बस तस्वीर ही आज़माती रहेगी

तुफान आएंगे पर जगमगाती रहेगी
उफक पार ही झिलमिलाती रहेगी
मेरे नसीब में नहीं उसकी रोशनी
मेरे लबों पे वो सरसराती रहेगी

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