840
Quotes
6.1k
Followers
468
Following

Saket Garg (Saket Garg)

Blogger, Journalist, Writer, Social Activist
Saket Garg 19 JAN AT 1:00

बचपन में मिले सबसे प्यारे खिलौने सी हो तुम
जो बिछड़ जाओ तो जान जाने तक रोने सी हो तुम

जिसको खोने के डर से ही दिल काँप उठता है
मेरी सारी दौलत-शौहरत मेरे जमा सोने सी हो तुम

तुमसे बिछड़ चैन आये तो कैसे आये मुझे अब
इस घर के सबसे प्यारे उस मेरे वाले कोने सी हो तुम

नहीं आती नीन्द मुझे अब तुम्हारे बिना रातों को
जिस पर सिर रख सुकूँ मिले उस बिछोने सी हो तुम

तुम हो तो लबों पर मुस्कान है तुम नहीं तो नहीं
किसी भूखे को मिले भरे हुऐ पत्तल-दोने सी हो तुम

तुम्हारे होने से मैं अमीर ना होने से मैं बदनसीब
ख़ुद ख़ुदा की नेमत हर पल मेरे साथ होने सी हो तुम

हमसफ़र, हमसाया, हमनवां, हमराज़ भी तुम
रूहानी सा यह राब्ता है किसी जादू-टोने सी हो तुम

- साकेत गर्ग 'सागा'

-


Show more
75 likes · 14 comments · 4 shares
Saket Garg 18 JAN AT 0:58

उनसे होने लगा है इश्क़, क्या किया जाये
रोक लें ख़ुद को या अब होने दिया जाये

गालों की लाली है उनकी सुर्ख़ गुलाब सी
काँटो से डरें या ये ग़ुलाब चूम लिया जाये

नज़रें हैं चाँदनी में नहाई हुई झील उनकी
सूखे रहें या अब झील में नहा लिया जाये

दिखती हैं किसी हूर-ए-अदन सी हसीं वो
देखते रहें या उनको गले लगा लिया जाये

टपकती है मोहब्बत बातों से उनकी भी
टपकने दें या अब सीधा पूछ लिया जाये

सुना है इज़हार-ए-इश्क़ होता है अदब से
अदब में रहें या अब बेशर्म हो लिया जाये
- साकेत गर्ग 'सागा'

-


85 likes · 18 comments · 6 shares
Saket Garg 15 JAN AT 0:55

हमारा प्यार उन्हें एहसान लगने लगा है
लगता है उनका हमसे मन भरने लगा है

नहीं रहा कोई मोल हमारे अल्फ़ाज़ का
हम हारे अब उनका गुस्सा जीतने लगा है

लो उठ चलते हैं अब इस महफ़िल से भी
सू-ए-दार है जो हमारे इन्तेज़ार में लगा है

- साकेत गर्ग 'सागा'

-


Show more
100 likes · 8 comments · 3 shares
Saket Garg 14 JAN AT 17:25

सुनो!

मुझसे दूर तुम कभी
चली मत जाना ना
जो मैं चला जाऊँ
तुम बार-बार
हाँ! बार-बार
मुझे पकड़ लाना ना

तुम्हारे बिन
जी ना पाऊँगा मैं
ग़र ज़िन्दा रहा भी तो
ज़िन्दा रह ना पाऊँगा मैं
तुम्हें पता है ना तुम्हारे बिन
नाशाद हो जाऊँगा मैं

(पूरी कविता अनुशीर्षक/कैप्शन में पढ़ें...)

- साकेत गर्ग 'सागा'

-


Show more
99 likes · 16 comments · 4 shares
Saket Garg 14 JAN AT 13:50

साजन-साजन जलती लौ, साजन-साजन ठंडी छाँव
साजन दौड़ते शहर सा, साजन ठहरा सा एक गाँव

- साकेत गर्ग 'सागा'

-


Show more
93 likes · 11 comments · 3 shares
Saket Garg 12 JAN AT 21:47

पिताजी पर लिख पाऊँ, ऐसे अल्फ़ाज़ कहाँ से लाऊँ
मेरी जेब तो आज भी, उनके दिये सिक्कों से भरती है

- साकेत गर्ग 'सागा'

-


Show more
130 likes · 42 comments · 4 shares
Saket Garg 10 JAN AT 1:56

लड़की नहीं ऐसा लगता है
कोई 'नर्स' पटाई है मैंने
सुबह से ही शुरू हो जाती है
वो 'डोज़' देने

सुबह 'गुड मॉर्निंग' से पहले
"कब सोये थे" का सवाल होता है
और फ़िर जवाब सुन 'लेट' सोने से
तबियत ख़राब होने का 'बखान' होता है

फ़िर 'लेक्चर" होता है
एक घण्टे का 'हैल्दी नाश्ते' के ऊपर
मैं करना चाहूँ भले ही 'मॉर्निंग लव' की बात
'हेल्थ' की 'सीटी' ही मारता है उसका 'कूकर'

फ़िर बैठ कर दिन भर का मेरा
'डाइट चार्ट' बनाती है
क्या खाना है कितना खाना है कैसे खाना है
याररररर! वो यह सब कुछ बताती है

(पूरी कविता अनुशीर्षक/कैप्शन में पढ़ें...)

- साकेत गर्ग 'सागा'

-


Show more
104 likes · 38 comments · 3 shares
Saket Garg 9 JAN AT 20:26

आतिश-ज़नो से कहो आग लगा आयें किसी महल में
सुना है ग़रीब की झोंपड़ी में आज ठंड बहुत है

- साकेत गर्ग 'सागा'

-


Show more
101 likes · 13 comments · 3 shares
Saket Garg 9 JAN AT 2:32

बयाँ-ए-सरापा करूँ, तो कैसे करूँ
होश आये पहले, तब तो तय करूँ

लिखूँ आफ़रीन, या लिखूँ मैं हसीन
कोई हर्फ़ याद आये, तो नज़र करूँ

हुआ दीदार, रूह ज़ख़्मी-ज़ख़्मी है
बीमारी पता चले, तब तो दवा करूँ

यक़ीन नहीं है, लिखी है लक़ीरों में
यक़ीन आये यह, तब तो दुआ करूँ

जिस्म पर छाया है, रंग-ए-लम्स यूँ
इरतेआश कम हो, तो आराम करूँ

है आफ़ताब वो, या वो 'वो' मेहताब
समझ आये यह, तो एहतराम करूँ

देखा है आदम, या देखा मैंने ख़ुदा
ज़ाहिर हो ये बात, तो हासिल करूँ

नया मेहमाँ है, रहने आया है घर में
अगर हो इजाज़त, तो शामिल करूँ

- साकेत गर्ग 'सागा'

-


Show more
79 likes · 15 comments · 2 shares
Saket Garg 7 JAN AT 20:14

ग़र सोचते रहियेगा, करियेगा कब
उनसे इश्क़ आज है, कहियेगा कब

सफ़्हे पड़े हैं दिल के, खाली-खाली
हाल-ए-दिल अपना, लिखियेगा कब

कब तक बसर करोगे, यूँ तन्हा-तन्हा
ज़िन्दगी दिन चार है, समझियेगा कब

लब लगे हैं तुम्हारे, मुस्कुराने गाहे-बगाहे
इश्क़ में अब खुलके, मुस्कुराईयेगा कब

सुना है इश्क़ में बढ़ जाता है, नूर चेहरे का
हमें चेहरे का बढ़ता नूर, दिखाईयेगा कब

चुपके-चुपके लिखने लगे हो, तुम ग़ज़ल 'सागा'
अपनी लिखी कोई ग़ज़ल हमें, सुनाईयेगा कब

- साकेत गर्ग 'सागा'

-


100 likes · 44 comments · 7 shares
YQ_Launcher Write your own quotes on YourQuote app
Open App