Ravi kumar Rana   (रविकुमार राणा "ईश")
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Joined 24 December 2017


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Ravi kumar Rana 15 JUL AT 8:58

आँखों में मेरी अब मुहब्बत का वो पानी भी नहीं।
अच्छा हुआ मुझ पर किसी की मेह् रबानी भी नहीं।

तुमने बुझाया था जिसे इक दिन बड़ी बेदर्दी से,
वो शम्अ फिर मुझको मुहब्बत में जलानी भी नहीं।

पागल नहीं हूँ मैं जो अपने ख़्वाबों का सौदा करूँ,
जुल्फों में ढल जाए मिरी ऐसी जवानी भी नहीं।

आँखों से ओझल हो चुकी हैं नींदे मेरी ए ख़ुदा,
आँखों को अब आराम दे ऐसी कहानी भी नहीं‌।

साहिल को मैंने तिश्नगी में मरते देखा तो लगा,
अब पहले जैसी मौज-ए-दरिया में रवानी भी नहीं।

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Ravi kumar Rana 9 JUL AT 6:22

"ઈશ્વર"
જો છે તો એને કહેવાની કોઈ જરૂર નથી,
જો એ નથી તો કહેવાનો કોઈ અર્થ નથી.

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Ravi kumar Rana 22 JUN AT 11:20

मेरे साये में छुप कर संवारती है मुझे।
सपनों में आती हैं औ' पुकारती है मुझे।

झूम उठती है सांसे मिरी उसे देखकर,
जब वो अपनी आंखों में उतारती है मुझे।

दर्दो ग़म छू हो जाते हैं एक मुस्कान से,
शरबती आंखों से जब वो देखती है मुझे।

हर वक्त वो नजरों से शरारतें करती है,
लगता है जैसे बरसों से जानती है मुझे।

हसरतें बढ़ने लगती हैं उसकी आगोशी में,
वो लबों को चुम कर जब सराहती है मुझे। 

उसकी आंखों में महफूज़ है मुहब्बत मिरी,
क्या कहूं यारो वो कितना चाहती है मुझे।

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Ravi kumar Rana 20 JUN AT 16:28

कुछ ख्वाब वक्त नहीं जिंदगी मांग लेते हैं।

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Ravi kumar Rana 20 JUN AT 8:15

शहर की इमारतें छांव तो देती हैं मगर
एक पेड़ की तरहां ठंडक नहीं दे पाती।

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Ravi kumar Rana 17 JUN AT 9:47

तसव्वुर ए निगाह में जब तुम्हारा चेहरा नज़र आता है,
तो मैं तुम्हारी मस्ती भरी निगाहों में कही खो जाता हूं।
मेरे होठों को छू कर जब तुम ग़म का बार उतारती हों, 
तो मैं तुम्हारी अल्हड़ मुस्कुराहटों में कही खो जाता हूं।

सियाह रातों में तुम दबे पांव मेरे ख्वाबों में आती हो
करवट बदलती है सांसे, जब तुम्हें महसूस करता हूं।
हाथ पकड़ कर तुम मुझे नींद से कहीं दूर ले जाती हो
सारे ग़म भुलाकर मैं तुम्हारे साए में चलता रहता हूं।

तुम मुझे ख्वाबों से भरे कोई गुलशन में ले आती हो
तन्हा पेड़ की ठंडी छांव में बैठकर हम मुस्कुराते हैं।
हथेली पर मेरी अपना नाम लिखकर गुनगुनाती हो
मैं तुम्हारी रानाईयो में खो कर तुम्हारा हों जाता हूं।

चांदनी की एक बूंद तुम्हारे होठों पर आ गिरती हैं, 
तुम्हारे नाज़ुक होठों को ओर नाज़ुक कर जाती है।
उन नाज़ुक होठों पर जब मेरी उंगलियां फिरती हैं,
तुम्हारी पलकें झुकती है आंखें शरारत कर जाती है।

ख्वाबों की वादियों से अरमानों के फूल चुन कर
अक्सर तुम्हारे रेश्मी गेसुओं में सजाया करता हूं।
कुर्बत के पल खिलते हैं, तुम्हारी सांसे शर्माती हैं
जुल्फों को सुलझा कर तुम्हारी धड़कनें सुनता हूं।

मेरी सहमी हुई जीस्त तुम्हारी गोद में आराम पाती है,
मैं तुम्हारी खामोश निगाहों को पढ़ते हुए सो जाता हूं।
हल्की सी एक किरण पलकों पे आ गिरती हैं और मैं,
सुब्हा होते ही चीखती हयातों के बीच खो जाता हूं।

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Ravi kumar Rana 14 JUN AT 18:25

आफतों के  दौर में हूं,  आफतों से  गुज़रने दो मुझे,
शाम का परवाना हूं मैं शम्अ के साथ जलने दो मुझे।

टूटा है दिल मेरा अक्सर  इश्क़ से दोस्ती करने के बाद,
जब लिखा हो दर्द लकिरो में तो फिर दर्द सहने दो मुझे।

कर लिया है सौदा मैंने रात की नींदों से इन आंखों का,
ख्वाब में जागेगी राते अब से,  खुद में उतरने दो मुझे।

हैं यकीं खुद पर मुझे मैं वक़्त की चाल को सुलझाऊंगा,
तोड़ दूंगा बंदीशो को एक दिन,  खुद से लड़ने दो मुझे।

जीत कर नाकामियों से, खुद को जीना सिखाऊंगा यहां,
ग़म के सागर पार होंगे अपने अश्कों में बहनें दो मुझे।

आज निकला हूं मैं घर से, आशियाना बनाने के लिए,
खुद को मैं संभाल लूंगा रेत बनकर बिखरने दो मुझे।

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Ravi kumar Rana 6 JUN AT 10:50

हवा पानी ज़मीं और नीला आसमां,
आदमी से कुछ कह रहे हैं आज।
वक़्त के रहते कदर कर लो हमारी,
कहीं टूट ना जाए तुम्हारा घर बार।

खुदा ने बख्सीं है ज़मीं तुझे सोच,
आखिर तूने ज़मीन का क्या किया?
खेतों की हरियाली चाहिए थी उसे,
ओर तुने उसे मकानों से बेच दिया।

तो फिर सुन धरती की आहटो को,
वो मुझे फ़रियाद कर के रो रही है।
कायनात क़यामत में तब्दील हो गई,
ये दुनिया कैसी तरक्की कर रही है।

समंदर साहिलों से बिछड़ने लगें हैं,
नदियों का दामन सुखा जा रहा है।
बारिशे सैलाब में तब्दील होने लगी,
और हवा का झुंड कहर ढा रहा है।

जहां होनी चाहिएं थी हसीं वादियां,
वहां पर बड़ी बड़ी इमारतों के घेरे हैं‌।
कैसे पहुंचेगी रोशनी मेरे फुल तक,
मौला हर तरफ़ इमारतों के मेले हैं।

आदमी मसरूफीं से मरने लगा और
सरकारें सियासत में अंधी हो रही है।
धरती कह रही है अंबर से कि देखो,
ये दुनिया अच्छी तरक्की कर रही है।

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Ravi kumar Rana 2 JUN AT 22:36

नज़्म : एक पत्ता
मैं  शाख  से  गिरा  एक पत्ता हूं,
जो आज  ज़मीं  पे  आ  गिरा है।
नहीं हैं  किसी को  ज़रूरत मेरी,  
मेरा वजूद मिट्टी में  जा मिला हैं।

किस से जाकर शिकायत करूं मै,
कौन समझेगा यहां मेरी बात को।
की टूटा हूं भरी बारीश में शजर से,
कौन मानेगा सच ये मेरी बात को।

बारिश थम गई थी,  रात छाई थी,
शाखो से गीरती बूंदें देख रहा था।
हर बूंद मुझे किचड़ में डांट रही थी,
क्यां हो रहा है ये मैं समझ रहा था।

रात सो ग‌ई सुब्हा ने आंखें खोली, 
किसी बच्चे का पांव पड़ा मुझ पर।
हाथ में पत्थर लेकर ऊपर उछाला,
शजर से एक बेर आ गिरा मुझ पर।

बच्चे ने उस बेर को होले से उठाया,
हाथ में लेकर के पानी से नहलाया।
आ गया समझ क्यों टूटा बारिश में,
बेर से दोस्ती का रिश्ता निभाया था।

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Ravi kumar Rana 2 JUN AT 6:56

सर पे हाथ रखकर दुआएं देती है मां।
पल्लू में छुपाकर बला हर लेती हैं मां।

देखा करती है राह मेरी दिन भर यूं ही,
घर आता हूं तो हाल मेरा पुछती है मां।

होती है बगावत तो रुठ जाती है मुझसे,
मेरे अश्कों को देख कर रो पड़ती है मां।

लड़ते-लड़ते जब हार जाता हूं खुद से, तो
सीने से लगा कर सहारा देती है मां।

मेरे बिखरे ख्वाबों को आशाएं देती हैं,
सो जाऊं मैं भूखा तो भूखी रहती है मां।

उसकी हर दुआ में फिक्र रहती है मेरी,
मैंने माना साया खुदा का होती है मां।

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