Ravi kumar Rana   (रविकुमार राणा "ईश")
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Joined 24 December 2017


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24 JUN 2022 AT 12:33

"Goal Keeper"

Life is like football,
and situations is player.
and Dreams..
Dreams are goalkeeper,
only dreams can save your life,
otherwise you are lose
if situations hit the goals..

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23 JUN 2022 AT 14:03

"ख़ामोशी"

ज़िन्दगी में बार बार आनेवाला एक ऐसा रास्ता,
जहा पर आप
न किसी को कुछ कह सकते है
और
न ही किसी से कुछ पूछ सकते है.....

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23 JUN 2022 AT 9:24

"Tamasha"

Every day life is played
New "Role"
with
New character
New situations

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11 FEB 2019 AT 10:14

कहना था तुमसे मगर कुछ कह नहीं पाया,
जिक्र ए मोहब्बत मैं तुमसे कर नहीं पाया।

तुम हया फरमाती रही आंखों से इश्क़ की,
और मैं हाल-ए-दिल कभी कह नहीं पाया।

तुम जान गई थी मेरे नादां दिल की धड़कनें,
और मैं तुम्हारी मोहब्बत समझ नहीं पाया।

दिन महीने साल बीते जैसे मौज ए दरिया,
सावन में लगी वो आग मैं बुझा नहीं पाया।

नींदे सो गई पर रात जगती रही आंखों में,
पिछले कुछ महीनों से मैं रो भी नहीं पाया।

लम्हों के मयखाने में तुझे याद कर के मैं,
खुद को तनहा होते कभी रोक नहीं पाया।

क्या फायदा किसी और से कु़र्बत होने का,
जब पास रहकर भी तुझे जान नहीं पाया।

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8 OCT 2021 AT 18:26

"હરિ" નામની હોડીમાં બેઠાં હોવને તો
એટલો વિશ્વાસ જરૂરથી રાખજો,
હોડી 'ડગશે ખરી' પણ 'ડૂબે નહિ'.

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3 OCT 2020 AT 22:11

फूल सी हँसी अपने होठों पे सजा के रख।
ग़म तू ज़िन्दगी के यूँ दुनिया से छुपा के रख।

बख़्शी है निगाहें क़ुदरत ने ख़ूबसूरत सी,
ख़्वाब एक अच्छा सा इन में तू बसा के रख।

ले के फिरते हैं सब खंजर ही आस्तीनों में,
हसरतों भरा सीना अपना तू बचा के रख।

चाहे हो तेरी हस्ती आसमान से ऊँची,
अपना सर ख़ुदा के दर पे मगर झुका के रख।

एतबार है ग़र तुझको वो आएगी इक दिन,
अपने घर की चौखट को फूलों से सजा के रख।

सीखना है जो तुझको जीने का सलीक़ा तो,
मीठे बोल होंठों पर अपने तू सजा के रख।

©® रविकुमार राणा "ईश"

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7 SEP 2020 AT 8:35

टॉफ़ी दे कर भी मनाना अब है मुश्किल।
रोते बच्चे को हँसाना अब है मुश्किल।

जिन से पहरों बातें करते रहते थे हम,
उनसे नज़रें भी मिलाना अब है मुश्किल।

जीत आती थी जो तूफ़ानों से लड़कर,
वैसी कश्ती फिर बनाना अब है मुश्किल।

तेरे होने से था रौशन सारा आलम,
बिन तेरे ये घर सजाना अब है मुश्किल।

देख कर उसको धुआँ हो जाते थे ग़म,
उसके जैसा दोस्त पाना अब है मुश्किल।

बात रस्म-ए-ज़िंदगी की छोड़ भी दो,
रोते-रोते मुस्कुराना अब है मुश्किल।

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4 NOV 2019 AT 7:14

फ़र्ज़ मुझ को ज़िंदगी का ये निभाना होगा।
रोज़ी-रोटी के लिए अब शहर जाना होगा।

सुब्ह नौ से रात नौ तक मुस्कुराना होगा,
चेहरे पे अपने नक़ाब अब इक चढ़ाना होगा।

मैंने देखी है तिजारत रोज़गारी की याँ,
या'नी क़ाबिल हो के भी लक आज़माना होगा।

नौकरी ख़ैरात की मजबूरी बन जाती है,
सोचता हूँ इक नया रस्ता बनाना होगा।

ख़्वाब अपने गर हक़ीक़त में हैं करने तब्दील,
रात भर नींदों को आँखों में जगाना होगा।

आसमाँ को मेरे करना है जो रौशन, मुझको
पहले सूरज की तरह ख़ुद को जलाना होगा।

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29 SEP 2019 AT 10:49

चाहते हुए भी  मैं तुम को पा नहीं सकता।
और दर्द भी ये  सबको बता नहीं सकता।

आते-जाते  तेरी गलियों से तो गुज़रता हूँ,
पर तुझे मैं अब हाल-ए-दिल सुना नहीं सकता।

तेरे घर की चौखट को देख आँखें रोती हैं,
या'नी मैं खुशी से घर तेरे आ नहीं सकता।

ख़ुशबू तेरे आँगन की आज भी छू जाती है,
पर मैं फिर मुहब्बत के गुल खिला नहीं सकता।

अक्स माज़ी का दिल में बरक़रार है जब तक,
आइने में तब तक मैं मुस्कुरा नहीं सकता।

तू न महफ़िलों में अपनी बुला मुझे ऐ दोस्त,
झूठी मुस्कुराहट लेकर मैं आ नहीं सकता।

वक़्त जो गुज़रना था वो गुज़र चुका है अब,
वक़्त जो बचा है उसको गँवा नहीं सकता।

हाथ थाम कर ख़्वाबों का निकल गया घर से,
घर बसाना है या'नी घर मैं जा नहीं सकता।

जंग जारी है मेरी अब भी मुश्किलों के संग,
हार जाता हूँ मैं पर सर झुका नहीं सकता।

मैं चरागाँ लेकर अब आ खड़ा हूँ साहिल पे,
मेरे हौसलों को  तूफाँ  बुझा नहीं सकता‌।

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29 SEP 2019 AT 10:30

मैं चरागाँ लेकर अब आ खड़ा हूँ साहिल पे,
मेरे हौसलों को  तूफाँ  बुझा नहीं सकता‌।

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