Rahul Desai   (© Rahul Desai)
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Joined 25 January 2018


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16 HOURS AGO

Defeat, it is just a small hurdle in your life to make it more striving and lively.

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17 SEP AT 10:58

पत्थरों में खिला वह फूल,
निशानी है इस बात की,
के उस बीज ने कभी
हार नहीं मानी,
और अपने हौसलों को
कभी टूटने नहीं दिया।

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15 SEP AT 15:09

हमने एक छोटासा आशियाना बनाया था,
खुशियों से भरा एक संसार सजाया था,
अपने सारे अरमान को हमने पूरा होते देखा था,
रूबरू नहीं मिलते जो,उन दोस्तों के साथ समय बिताया था,
हरदम भागती इस ज़िन्दगीसे कुछ पलों को चुराया था,
मिल ना सके जिन अपनों को,उनसे भी मुलाकात करता था,
हकीकत से कई सुंदर था वो ख्वाबों का आशियाना,
जहां समय मेरा था, लोग मेरे थे और खुशियां कदमों में थी।

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14 SEP AT 14:01

हर मन में बसे है कृष्ण
सारथी बनकर,
तू पुकार बस उनको अपना
अहंकार भूलकर।

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13 SEP AT 21:26

that Rays of light
which helps us to
overcome from the
Darkness of Failure.

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12 SEP AT 10:59

उसकी किरणों से,
उम्मीद की कलियां खिलाओ,
मिटा दो अंधकार नाउम्मीदों का,
एक किरण आशा की फैलाओ।

अपने सूरज को जगाओ,
उसकी किरणों से,
होंसले का एक फूल खिलाओ,
मिटा दो अंधकार भय का,
एक किरण आत्मविश्वास की फैलाओ।

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11 SEP AT 22:50

जन्नत हो तुम क्योंकि,
तुम स्वयं में ही अपनी खुशी ढूंढते हो,
तुम स्वयं को समय से पाते हो,
तुम स्वयं ही अपने दर्द का इलाज जानते हो,
तुम स्वयं ही हर दुख का सामना करते हो।

रहते नहीं तुम निर्भर किसी और पे,
अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए,
इसलिए मैं कहता हूं, जन्नत ही हो तुम।

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9 SEP AT 23:36

Feeling being content without any expectation

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8 SEP AT 11:52

शाम धीरे धीरे गुज़र,
भागती इस ज़िन्दगी में,
मानो तू ही अल्पविराम है।

डूबते सूरज की लालिमा में,
कुछ पल चैन के जीने है।

लहराती शीतल हवा में,
थके मन को ताज़ा करना है।

घर लौट रहे पंछियों की चहचहाहट में,
फिर से एक नई उम्मीद ढूंढ नी है।

ए शाम ज़रा धीरे गुज़र,
कल फिर उठकर मंजिल की ओर भागना है,
बहुत थका हूं में, थोड़ा आराम करना है।

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7 SEP AT 11:21

ऐसा भी आयेगा,
जब मजहब से पहले इंसानियत पूजी जाएगी,
भुलाकर हर नफरत इंसा इंसा से इंसा की तरह मिलेगा,
देकर सम्मान सबकी आस्था को,
एकता और शांति का सूरज फिर से निकलेगा।

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