राणा माधवेन्द्र प्रताप सिंह   (©माधवेन्द्र प्रताप सिंह "रोशन")
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Joined 19 October 2017


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Joined 19 October 2017

पड़ोसी  देश  के हमलों से सब तैयार बैठे  थें ।
जमीं में, जल में, जंगल में, लिए हथियार बैठे  थें ।।
कि एक छोटे विषाणु पर कोई जादू न चल पाया ।
सुना  था  हमने  दुनिया  में बड़े ऐय्यार बैठे थें ।।

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जल प्रपात
( अनुशीर्षक में पढ़ें )

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कितने तकलीफ में था, मैं तुम्हें मालूम नहीं ।
बारहा दर्द दिया, दर्द में ढाला है मुझे ।।
ये वक्ती आंधियां, मुझको डरा नहीं सकतीं ।
ज़लज़लों में रहा, तूफ़ान ने पाला है मुझे ।।

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लॉक डाउन में वक्त का सही उपयोग
(In caption 👇)

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विकल उर की वेदना निस्सीम हो कर,
अश्रु बन किस भाँति आयी मन से पूछो ।
प्रेम का आगाज़ माधव ने बताया,
प्रेम का अंजाम वृंदावन से पूछो ।।

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अइते पटिदारी अलगवलस,
हमके जियत नरक देखवलस,
दूर भईल जे रहल करीबी,
का भाई सजनी, ना हो गरीबी ।।

दरसन जेकर प्यास बढ़ावे,
हमरे हिय के अगन मिटावे,
अधर सुधा हित प्रेम सयानी,
ए सखि साजन ना सखि पानी ।।

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ज्ञान गीता ग्रहण हित ज्यों पार्थ होना है जरूरी,
बुद्ध से पहले हमें सिद्धार्थ होना है जरूरी ।।

"जिस प्रकार गीता जैसे पुराण का होना अर्जुन के तत्कालीन युद्ध विरक्ति का परिणाम है, ठीक वैसे ही बुद्ध होना दूसरा चरण है प्रथम सिद्धार्थ होना पड़ेगा, निकलना पड़ेगा अपने अंदर की चारदीवारी से, खोलना पड़ेगा ज्ञान चक्षु, खोजना पड़ेगा दुःख का उद्गम, तलाशनी पड़ेगी आनंद की अक्षरता, जब इनका आविर्भाव अंतस में होगा तब बुद्ध कहलायेंगे, तो पहले सिद्धार्थ बनिये ।"

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दर्द से गम से भर गया है दिल,
बहुत आगे निकल गया है दिल ।।

आप अब दूर से ही बात करें,
इन सहारों से डर गया है दिल ।।

वो जिसे दिलनशीं कहा मैंने,
कई हिस्सों में कर गया है दिल ।

लौट आये हैं फिर वादे लेकर
क्या करें हम कि मर गया है दिल ।।

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