Pratik Raj Mishra  
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Joined 26 May 2017


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Pratik Raj Mishra 16 JUN AT 20:29

पहले जब भी कभी बुरे हालात होते थे
कोई फिक्र नहीं थी , पापा साथ होते थे

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Pratik Raj Mishra 10 JUN AT 16:25

मेरे छत पे सीलन सीलन रहती है
शायद मेरे ऊपर वाला रोता है

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Pratik Raj Mishra 21 MAY AT 12:04

आलू पाया जाता है , सबके रसोईघर में
फिर चाहे हो वो शुद्ध शाकाहारी
या हो कोई बड़ा मांसाहारी

अगर कुछ न हो खाने को, तब भी बन जाता है
कुछ न कुछ , आलू से
जैसे सबका पेट भरना हो इसकी ज़िम्मेदारी

खास होकर भी ये कितना आम होता है
इसे नहीं मिलती कभी इज्ज़त
पनीर या मांस जितनी
जबकि आलू बिन रसोईघर
शायद चल न पाए ठीक से
एक पूरे दिन

मैं बाज़ार से खरीदे आलू घर लाकर
फैला देता हूं किचन में
ये सोचते सोचते
की कितना एक सा हाल है
आलू और औरत का

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Pratik Raj Mishra 16 MAY AT 0:06

शराब की बोतलों पे
बत्तियां लगाकर
और कुछ रंग चढ़ाकर
वो उनमें बना देती है
एक पूरा ब्रम्हांड

मेरी छोटी बहन को
बड़ी आदत है
मेरी बुरी आदतों को
खूबसूरत अंत देने की

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Pratik Raj Mishra 15 MAY AT 1:08

एक पल कि सही
खुशी तो मिलेगी
उस दो दिन के भूखे
तीन साल के बच्चे को
जो रोज़ घूमता है चार मोहल्ले
अपने पांच दोस्तों के साथ
उठता है प्लास्टिक की छह बोतलें
फिर तलाशता है सातवें को
शाम के आठ बजे तक...

ये सोचते सोचते मैंने
निकाले जेब में पड़े नौ नोट
दस रुपए के
और डाल दिए
कूड़ेदान में

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Pratik Raj Mishra 15 MAY AT 0:46

गणित की कक्षा में
वो लड़का खाता है डांट
जब लिख देता है
1+1 = 1
गलती उसकी भी नहीं
उसने देखा है
1 अपनी मां और
1 अपने पापा को
जो जब भी जुड़ते हैं
बन जाता है
1 पूरा परिवार

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Pratik Raj Mishra 15 MAY AT 0:31

वो सबको मेरा किस्सा सुनाता है
जिसको मेरी दास्तां नहीं मालूम

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Pratik Raj Mishra 1 MAY AT 1:39

बच्चे भी रोए और रोए पागल भी
हमारे साथ रोए थे कुछ बादल भी

जिनके चेहरे हमेशा ढके ही रहे
रोए बहुत उन औरतों के आंचल भी

वो कहते भी थे कि हम नहीं रोए
और फैला था उसका काजल भी

उसने पैरों पे बांध जब आज़ाद किया
कैदी सी रोई तब उसकी पायल भी

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Pratik Raj Mishra 30 APR AT 0:41

वो

(पूरी कविता अनुशीर्षक में)

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Pratik Raj Mishra 29 APR AT 10:48

ज़मीं को तेरे हुस्न के जैसा सजा देता
ख़ुदा ज़ुल्फ़ें तेरी देखता फसलें बना देता

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