Pratik Raj Mishra  
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Joined 26 May 2017


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Joined 26 May 2017
11 JUN AT 0:59

कुदरत में घुल गई इक कमाल की ख़ुशबू
आती है फूलों से तुम्हारे बाल की ख़ुशबू

बारिश के बाद मिट्टी से मुझको याद आते हैं
तेरे भीगे लब और तेरे गाल की ख़ुशबू

उलझने सुलझाने बैठा , तो उठा सवाल
क्या आती होगी विक्रम से बेताल की ख़ुशबू?

घर से दूर होकर भी घर मुझमें रहा है यूं
आती हो सूखे पत्तों से जैसे डाल की ख़ुशबू

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29 APR AT 13:54

एक बस तुझको ही खोना बाकी था
इस से बुरा और क्या होना बाकी था

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25 APR AT 12:40

बहुत बेचैनी भरी थी आज की शाम भी
तुमसे बात करनी थी और था काम भी

तुमसे दूर रह के मैं भला कैसे न रोता
ग़म-ए-हिज्र में तो रो दिए थे राम भी

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22 MAR AT 11:52

तनहाई से इश्क़ इतना कर रहे हैं
कि उनसे मिलने से तौबा कर रहे हैं

जो शख्स मेरी कभी सुनता ही नहीं है
इस बात का उसी से शिकवा कर रहे हैं

दीवारें मेरी सजी धजी सी रहती हैं
अपने कमरे को तेरे जैसा कर रहे हैं

तुम्हारी यादों को कागज़ पे उतर कर
बीते वक्त को हम फिर जिंदा कर रहे हैं

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19 MAR AT 23:07

खुद को safe हम इतना कर रहे हैं
कि सबसे मिलने से तौबा कर रहे हैं

अब शहर के सारे Gym भी बंद हैं, सो
स्वस्थ रहने के लिए योगा कर रहे हैं

आप घर बैठें हैं , आप ही तो Hero हैं
खुद के साथ सबकी रक्षा कर रहे हैं

जो लोग अब भी Travel कर रहे हैं वो
तमाम दुनिया में "कोरोना" कर रहे हैं

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10 MAR AT 12:35

दो गिले शिकवे दिल से निकाल , होली है
पत्थर नहीं अब फेकों गुलाल , होली है

इशारों पर तो चलती हैं बस मशीनें ही
गर जिंदा हो तो पूछो सवाल , होली है

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3 DEC 2019 AT 19:38

ये सोच सोच हम वक्त गुज़ार देते हैं
लोग क्यों अपनी ख्वाहिश मार देते हैं

और क्या उन्हें कभी इश्क़ नहीं हुआ
जो शादी के लिए इश्तिहार देते हैं ?

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31 AUG 2019 AT 19:46

गायब मेरे गांव की तितलियां थी सारी
उठनी तुझपे ही तो उंगलियां थी सारी

इस साल पहाड़ों पे बर्फ़ ही नहीं टिकी
शायद जलने लगी तुझसे वादियां थी सारी

इश्क़ में क्या हुआ किसी को क्या बताना
बातें जैसी भी थी हमारे दर्मियां थी सारी

करने लगी थी वो उस बूढ़े बगुले पे भरोसा 
बहुत नादान उस तालाब की मछलियां थी सारी

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15 JUL 2019 AT 21:23

कोशिश करने पर भी इनसे निकलती नहीं एक बूंद
मेरी आंखें हो गई हैं अब इस शहरी ज़मीन जैसी

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8 JUL 2019 AT 1:16

मैं लिखता हूं प्रेम पत्र

(कविता अनुशीर्षक में)

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