Prasoon Vyas   (प्रसून व्यास)
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Corporate Banker by profession.
Technically, Not a poet or writer.
Joined 2 September 2016


Corporate Banker by profession.
Technically, Not a poet or writer.
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1 MAY AT 17:26

मैने ना कभी काशी देखा ना कभी काबा देखा,
मगर शमशान के सामने निकलता जनाज़ा देखा..

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24 APR AT 12:43

मौसम इतना गर्म हो चुका है के,
कुछ लोग अपना घर जला बैठेंगे...

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18 APR AT 13:24

बचा के रखता हूँ मैं अपने आँसू इसलिए
के कल फिर किसी की मौत की ख़बर आनी है..

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7 JAN AT 11:38

पहले लिखता था तो लोग शरमा जाते थे,
अब लिखूंगा तो वे लोग शर्मिंदा होने लगेंगे...

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27 SEP 2020 AT 9:14

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12 AUG 2020 AT 8:53

तेरा यूँ रूख़सत हो जाना कोई राहत की बात नहीं थी,
मगर शायरी को कुछ लोग और भी बूढ़ा समझने लगेंगे..

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8 JUL 2020 AT 9:38

आईने खत्म हो रहें हैं दुनिया में आजकल,
खर्च करने वाले अब इंसान ही ख़रीद लेते हैं...

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7 JUN 2020 AT 18:37

तल्खियों को समेटकर कहीं फेंक दिया है मैने,
बिखरा हुआ घर आखिर किसे अच्छा लगता है...

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2 JUN 2020 AT 12:34

वक्त इस कदर अपना हो चुका है मेरा,
फरेबी पर भी अब वाहवाही मिलने लगी है..

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16 MAY 2020 AT 22:46

भूखे बच्चों के आगे वो मज़बूर हो गई,
पत्थर की वो आँखें आज मज़दूर हो गई..

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