बात मेरी नही कमबख्त इन्ही रातों की है।
मुलाकात मेरी नही इन्हीं जज्बातों की है।।
नींद का अचानक खुलना और फिर से ना आना।
सपनों का वो अनचाहा अंजाम तक आ जाना।।
आधी नींद के आगोश में बार-बार उनका नाम पुकारना।
नींद खुल जाने पर उनकी ख़्वाबों के लिए सो जाना।।
अधूरे अफसाने को सपनों की दुनियाँ में पूरा करना।
अनजान अंजाम के जज्बातों में कहीं गुम हो जाना।।
अंधेरी रातों में बिस्तर में चौक कर फिर बैठ जाना।
खुद की ख्वाबों का टूटा बिखरा मंजर देखना।।
जिंदगी का हाथ छूटना और नीन्द का फिर चला जाना।
उनके सपनों के लिए अपने सपनों की कुर्बानी देना।।
यकीन करो मेरे साथी, मेरे हमराही, ये सब है रातों का अफ़साना।।
और उनसे मुलाकात, जिंदगी को बना गई सपनों का एक फसाना।।
बात मेरी नही कमबख्त इन्ही रातों की है।
मुलाकात मेरी नही इन्हीं जज्बातों की है।।
- Pranshu Roy
2 JUL 2021 AT 6:15