Munish K Attri   (Munish K Attri)
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Joined 29 September 2017


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Joined 29 September 2017
Munish K Attri 12 MAY AT 22:12

जनसंख्या वृद्धि का ग्राफ बढ़ता जा रहा
और इंसान अकेलेपन में धस्ता  जा रहा

दरिंदगी रुक नही रही बेटियों पर यहा,
अभियान बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ चलता जा रहा

गज़ब की राजनीति , गज़ब के नेता है
पिछले वादे अधूरे, नए करता जा रहा

माँ-बाप के तीन बेटे  एक  से  बढ़कर एक
बुढ़ापा फिर भी लाचारी में कटता जा रहा

सब बैठे तो थे साथ में कुछ वक्त बिताने को
पर  हाथ में  सबके मोबाइल चलता जा रहा

कुछ तो निवारण होगा इस समस्या का "मुनीश"
डूब  कर खुद  में  ही  इंसान  जो मरता जा रहा

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Munish K Attri 8 APR AT 18:47

देशभक्ति में मिलावट सियासत की बढ़ी है
सियासत  वालो को  सियासत  की पड़ी है

गिराने में लगे हैं सब एक दूसरे को यहाँ
देश की राजनीति किस मोड़ पर खड़ी है

ऐलान-ए-चुनाव  क्या  हुआ  यहाँ
सरहद पर देखो गतिविधियां बढ़ी है

शहरों से उठ रही युद्ध की आवाज़ों से
सरहद  पर  गांवों में  बेचैनियां  बढ़ी है

नेता सब  के सब हमारे , है दूध के धुले
वोट किसको डालू,सोच सोच में पड़ी है

"नेता जी" सा नेता मिलेगा इस देश को एक दिन
माँ भारती के चरणों में मेरी दुआएं पड़ी है ।

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Munish K Attri 22 JAN AT 20:04

जब झुर्रियां पड़ जाएगी,तब भी यूँ ही चूमा करूंगा तुम्हे
मै मेरी ख्वाहिशों को मरने और तुम्हे बूढ़ी नहीं होने दूँगा

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Munish K Attri 21 JAN AT 19:16

मैं तुम्हारा हूँ , मुझे इसका एहसास दिलाया कर
मुझसे ज्यादा मुझपर, तू अपना हक जताया कर

बात जो भी कहूँ,आसानी से न माना कर
नख़रे दिखाया कर , मुझे खूब सताया कर

अकेलापन खा न जाए हर पल पाकर अकेला मुझे
ख़ल्वत में ख़लल डालकर ,मेरी तन्हाईयाँ भगाया कर

मगरूर , गुस्सैल लहज़े को मेरे, हवा में उड़ाया कर
अपनी शरारती,नटखट बातों से मुझे खूब हंसाया कर

मेरी अनकही सुना कर , ज़ुबां पर न जाया कर
देखकर आँखों में, मेरी प्यास समझ जाया कर

थोड़ा नासमझ हूँ मैं , इश्क़ के मामले में
आँखों से पिलाकर मुझे इश्क़ सिखाया कर

सीने में दफन है मेरे बारूद मोहब्बत का
बन कर शरर मेरे इर्द-गिर्द मंडराया कर

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Munish K Attri 20 JAN AT 19:05

वो जो मेरी "जिंदगी" थी ना,किसी ओर की हो गई
अब मेरी "मौत" मेरी हो जाए, तो कमाल हो जाए

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Munish K Attri 19 JAN AT 18:58

जब तक जिंदा हूँ मुझे अपने दरिया-ए-इश्क़ में डूबा रहने दे
कि जब लाश हो गया तो खुद ही आ जाऊँगा किनारे पर तैर कर

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Munish K Attri 18 JAN AT 19:35

उम्र की उस स्थिति में आ गया हूँ
कि बुढापे में किसी बच्चे सा हो गया हूँ
चाहता हूँ कि कोई संभाले मुझे बच्चे की तरह
पर किसी के पास वक़्त नही,व्यर्थ जो हो गया हूँ

छोटा हो गया हूँ इतना कि घुटनों पर चलता हूँ
बड़ा हूँ इतना कि कदमों पर चला नही जाता
जिंदगी ने मुझे कितना  लाचार  बना दिया
अब निवाला भी उठाकर खाया नही जाता

पर ये मेरी पीड़ा का कारण नही,
दुख इतना सा है कि,,,,,

एक उम्र गुजार दी मैंने जिनका जीवन सवारने में,
आज मेरी उस औलाद से मेरा बुढ़ापा उठाया नही जाता

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Munish K Attri 17 JAN AT 18:42

धूप अगरबत्ती करके , चंद रुपये चढ़ा आता हूँ
टेक कर माथा,सब ख्वाहिशें अपनी बता आता हूँ

पुरुषार्थ से बच जाऊ,चमत्कार की उम्मीद जगाने जाता हूँ
भगवान पूजन के नाम पर मंदिर फ़क़त माँगने जाता हूँ

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Munish K Attri 16 JAN AT 18:43

मैं तुम हो जाऊँ
तुम मैं हो जाओ
तू मुझको जिये
मैं तुझको जियूँ
कुछ न दिखे हमको
एक दूसरे के सिवा
तू आईना देखे
तो मुझको सँवारे
मैं आईना देखूं
तो तुझको सँवारु

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Munish K Attri 15 JAN AT 19:25

तृप्त हो जाए फ़क़त बूंद से,कभी समुंदर भी कम पड़ जाए
"मुनीष" ये तिश्नगी-ए-इश्क़ , इसे कौन समझ पाए ।

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