Munish K Attri   (Munish K Attri)
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Joined 29 September 2017


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Joined 29 September 2017
Munish K Attri 8 OCT AT 19:46

कलयुगी रावण मना रहे है ख़ूब जश्न दशहरे के नाम पर
कि अवगत हैं वो यहाँ फ़क़त पुतले जलाये जाते है रावण के नाम पर

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Munish K Attri 1 SEP AT 19:55

इश्क़ को इश्क़ की हद रहने दे ,
जब तलक रूहें न मिले,जिस्म पर्दे में रहने दे

इश्क़ में दिल पागल हो जाता है माना मग़र
दिमाग़ को तो अपने तू ठीक रहने दे

मुझे ख़ुदा ना बना तू इश्क़ में अपने
ये दर्जा माँ बाप का,उन्हीं का रहने दे

मैं कैसे डूब जाऊ मुकम्मल तुम में
मुझ को थोड़ा सा मेरा भी रहने दे

तू  चाँद आस्माँ का , तारों  से  याराना   रख
मैं बाशिंदा ज़मीं का,मुझे जुगनुओं का रहने दे

मैं भी पिघल गया तो हादसा हो जाएगा
'गर मैं पत्थर हूँ तो मुझे पत्थर रहने दे

इश्क़ फ़क़त इश्क़ देखता है माना मग़र
"मुनीष"कुछ लिहाज़ जमाने का भी रहने दे

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Munish K Attri 18 AUG AT 17:47

ਬੋਲ  ਕੇ  ਕੌੜੇ  ਬੋਲ , ਸੱਚ  ਲੁਕੋ  ਨੀ  ਹੋਣਾ
ਅੱਖੀਆਂ ਵਿਚੋਂ ਸੱਜਣਾ,ਪਿਆਰ ਲੁਕੋ ਨੀ ਹੋਣਾ

ਮੈਂ ਤਾਂ ਰਾਜ਼ੀ ਆ ਸਜਣਾ ਹਰ ਗੱਲ 'ਚ ਤੇਰੀ
ਪਰ ਤੈਥੋਂ  ਤੇਰੇ  ਦਿਲ ਨੂੰ  ਸਮਝਾ ਨੀ  ਹੋਣਾ

ਇਰਾਦਾ ਕਰ ਤਾਂ ਲਿਆ ਛੱਡਣ ਦਾ ਮੈਨੂੰ ਪਰ ਯਾਦ ਰੱਖੀਂ
ਦੂਰੀਆਂ  ਪਾ  ਕੇ  ਨਜ਼ਦੀਕੀਆਂ  ਨੂੰ  ਮਿਟਾ  ਨੀ  ਹੋਣਾ
 
ਜਾਂਦੀ ਵਾਰੀ ਸਜਣਾ,ਪਿੱਛੇ ਮੁੜ ਨਾ ਵੇਖੀ
ਮੈਥੋਂ ਰੋਕ ਨਹੀਂ ਹੋਣਾ, ਤੈਥੋਂ ਜਾ ਨੀ ਹੋਣਾ

ਬੜੀ ਡੂੰਘੀ ਆ ਨੀਂਹ ਪਿਆਰ ਮੇਰੇ ਦੀ, ਦਿਲ ਤੇਰੇ ਵਿਚ
ਢਾਹ ਕੇ ਮਹਿਲ ਮੇਰੇ ਨੂੰ ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਤੋਂ ਘਰ ਬਣਾ ਨੀ ਹੋਣਾ

ਸੌਖਾ ਕਿੱਥੇ ਹੋਵੇਗਾ ਤੇਰੇ ਲਈ ਕਹਿਣਾ ਅਲਵਿਦਾ ਮੈਨੂੰ
ਅੱਖੀਆਂ ਚੋਂ ਹੰਝੁ ਰੁੱਕਣੇ ਨੀ ਤੇ ਮੂਹੋ ਕੁਝ ਬੋਲ ਨੀ ਹੋਣਾ

ਮੈਨੂੰ ਭੁੱਲਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਵਿਚ ਤੂੰ ਪਲ-ਪਲ ਯਾਦ ਕਰੇਗਾ ਮੈਨੂੰ
ਤੇਰੀ ਸ਼ਾਇਰੀ ਚੋਂ "ਮੁਨੀਸ਼"ਮੈਂ ਮਰਨਾ ਨਹੀਂ ਤੇ ਯਾਦਾਂ ਚੋ ਮਿਟਾ ਨੀ ਹੋਣਾ

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Munish K Attri 12 AUG AT 19:45

बड़ी मासूम,भोली,नर्म-दिल,दरियादिल है वो,
किसी का दिल नही दुखाती

उसे चाहने वाले हर दीवाने को भर लेती है आगोश में
इतनी अच्छी है किसी का दिल नही ठुकराती

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Munish K Attri 14 JUL AT 19:04

लिखी जा रही हैं कई कविताएं 'प्रेम' पर
हर रोज ,शायद हर पल
पर क्या 'प्रेम' बचा है, 'प्रेम' कविताओं में
जा रह गया है महज़ शीर्षक बनकर
लापता है 'प्रेम',शायद 'प्रेम' कविताओं में
कविता होती है 'प्रेम' शीर्षक पर
और होती है बात उसमे
बेवफ़ाई की जुदाई की
प्रेम कविता में गम की बात
कोई वियोग में दुःखी
कोई मिलकर भी उदास
कही जिस्म चर्चा कही हवस की बात
चंद प्रेम कविताओं में मिलती है प्रेम की बात
फिर पढ़ी जाती हैं ऐसी कोई कविता
जब किसी ऐसे शख्स द्वारा
रखा हो जिसने कदम
नया नया किशोरावस्था में
तो बिठा लेता है हृदय में बात
कि प्रेम है गम का दूसरा नाम
और सोच लेता है प्रेम न करने की
क्या ये उम्र होती हैं, ये बात सोचने की,
पर उम्र के इस दौर में
मुश्किल होता है रोकना खुद को
फिर हो जाता है उसे प्रेम
ये प्रेम होता हैं महज़ एक आकर्षक
कहा जाता है जिसे प्रेम
इस प्रेम में सबकुछ होता है
सिर्फ वफ़ा नही,
जैसे किसी प्रेम कविता है सब कुछ होता है
सिर्फ प्रेम नही,

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Munish K Attri 7 JUL AT 19:51

तुम्हे देख कर मेरी पलकें झपकना भुल जाती हैं ,
इससे नाज़ुक और ऋजु सबूत क्या दू मोहब्बत का तुम्हें

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Munish K Attri 30 JUN AT 19:27

मेरी पीठ पीछे मुझ पर बेवफाई की गोलाबारी,
और सामने से मुझसे प्यार वाली बात भी करती है

फ़ितरत उसकी हू-ब-हू पड़ोसी देश सी है
वार और बनावटी प्यार दोनों साथ साथ करती है

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Munish K Attri 28 JUN AT 22:24

जिस बिन अपूर्ण है,पौरुष का सार
जिस बिन अपूर्ण है, ये संसार
जो है सृष्टि  का उपहार
जो है संसार की सृजनहार
जो है सर्वशक्तिमान
जो है सबसे महान
जो दानवो का संहार करे
जो दरिंदगी पर अंगार धरे
कठोर है जो फूल भी है
दुष्टो को करती धूल भी है
पर क्यो भूली है वो शक्ति अपनी
आओ उसका आवाहन करो
पाप के नाश के लिए
नारी अब तुम दुर्गा-काली रूप धरो
इस फूल को अब चिंगारी बनना होगा
चंडी बन पाप का नाश करना होगा
सबके सब भरसक प्रयास विफ़ल हुए
नारी को नारी का अब रक्षक बनना होगा
इस शक्ति को अपनी शक्ति स्मरण अब करनी होगी
अपने अस्तित्व की लड़ाई खुद ही लड़नी होगी
कांटो से होगी न बागबां से हिफ़ाज़त गुलशन की
कलियों की हिफ़ाज़त अब फूलों को ही करनी होगी

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Munish K Attri 25 JUN AT 19:34

कुछ जख्मों को अब तक 'हरा' रखा है
तेरे बाद दिल किसी से जुड़ने  न  दिया
मैंने  अब  तक  खुद  को तन्हा  रखा हैं

जो  तुम्हारा  है  तुम्हारा  ही  रहेगा  ताउम्र,
तुम्हारी सल्तनत किसी को नहीं सौंपी मैंने
दिल के सिंहासन पर ताज तुम्हारा रखा है,

हालत-ए-हिज्र  में  जूझ  रहा  हूँ  हयात-ओ-मौत  से ,
तमन्नाएँ,हसरतें,ख़्वाहिशें सब मर गई इंतज़ार में,मगर
तुम  लौट  आओगें , इस  उम्मीद  को  जिंदा  रखा हैं।

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Munish K Attri 21 JUN AT 20:30

मोहब्बत
एक वो जो हो जाती है
और एक वो जो की जाती है

मोहब्बत जो हो जाती हैं
बेवजह,निःस्वार्थ होती है
यथार्थ,वास्तविक होती हैं
ये बढ़ती रहती है वक़्त के साथ
हर तूफ़ान सहने में सक्षम होती हैं
जिस्मों तक सीमित नहीं
रूह से रूह तक होती हैं

मोहब्बत जो की जाती हैं
ये वास्तविक नही बनाबटी होती हैं
स्वार्थ और जरूरतों पर टिकी होती है
ये तब तक चलती है जब तक दोनों तरफ से,
पूर्ति हो रही हो एक दूसरे के जरूरतों की
ये शुरू में बेहद,फिर धीरे-धीरे कम होती है

बहुत कम लोग देखे हैं मैंने,
जिनको मोहब्बत हुई हो
अर्थात मैंने लोगो को,
मोहब्बत करते ज्यादा देखा है
शायद इसलिए कि,
जिंदगी की तेज रफ्तार में
हम सब कुछ समय से पहले चाहते है
संभवतः इसलिए नहीं कर पाते इंतज़ार
मोहब्बत होने का
और कर लेते है मोहब्बत
खुद ही ।।

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