वो नादान बचपन एक अलग ही ज़माना था.....
जहां बाबा का हाथ पकड़कर चलते थे और,,
मां के दुलार का बहाना था.....
फर्क ज्यादा कहूं या कम इस बात का पता लगाना था,,
पहले पापा के संग खाते थे खाना और.....
अब भी खा लेते है कभी कभी,,
बस फर्क इतना आ गया कि पहले थाली थी एक हमारी अब......
बातें भी करते हैं कभी कभी,,
मां के दुलार से भरा वो बचपन सब गलतियां गिनाने में जाता था......
बड़े हुए तब समझ आया कितना अच्छा था बचपन तभी सभी,,
उस नादान बचपन की बात ही अलग है.....
जो अब दिखता है कभी कभी,,
जो अब दिखता है कभी कभी।।-
8 NOV 2025 AT 5:48