Mohammad Shiblee   (Shiblee)
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Joined 25 April 2019


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Joined 25 April 2019
Mohammad Shiblee 29 MAY AT 18:20

हक़ीक़त कहीं के और फसाने कहीं के,
तक़ाज़े कहाँ हैं अब हमारे यकीं के...

यक़ीन है जो क़ामिल तो आगे बढ़ो फिर,
खुले हैं दरिचे क़ल्ब-ओ-फ़तीं के...

ख़ुदी है 'ख़ुदा' का ही राज़-ए-हक़ीक़त,
हैं 'मुन्किर-ए-ख़ुदी' में ये सज्दे जबीं के...

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Mohammad Shiblee 8 MAY AT 22:00

दिल में 'दाग़ों' की और कसरत हो गई,
इबादत में जब से 'ख़्यालों' की शिरकत हो गई...

रोनुमा इक 'शान-ए-वहदत' हो गई,
'बज़्म-ए-मातम' फिर 'बज़्म-ए-इशरत' हो गई...

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Mohammad Shiblee 7 MAY AT 22:29

Me to my brain : Ohk let's start studying


*Le brain 👇👇👇

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Mohammad Shiblee 6 MAY AT 22:04

'ऐ दुआ' फ़रियाद कर अर्श-ए-बरी को थाम के,
ख़ुदाया! रुख़ फ़ेर दीजिए गर्दिश-ए-अय्याम के...

सब के सताए हुए हैं दुनिया भर से ठुकराए हुए हैं,
ईलाही! ख़ाली मत लौटा दिजिएगा अब की जो हाथ फैलाए हुए हैं...

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Mohammad Shiblee 5 MAY AT 12:50

मय्यसर हो क़ुव्वत थोड़ी भी अगर तो नेकियों में लगा देना उसे,
क्यूँ मिन्नतें करना और पुकारना किसी और को जब किसी से कुछ नहीं होता...

Mayyasar ho Quwwat thodi bhi agar toh nekiyon mein lga dena use,
Kyun minnate krna or pukarna kisi or ko jb kisi se kuch nhi hota..

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Mohammad Shiblee 4 MAY AT 5:57

कितनी 'शादाबी' थी इन आरज़ी मकीनों में,
और फ़िर उठते जनाज़ों ने रंगत बदल दिए...

Kitni 'Shadabi' thi in Arzi makeeno mein,
Or fir uthte Janazo ne rangat badal diye...

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Mohammad Shiblee 30 APR AT 13:55

'चर्ख-ए-इस्यां' सर पे है और ज़ेरे क़दम 'बहर-ए-अलम',
चार सु है फ़ौज़-ए-ग़म! कर जल्द अब 'बहर-ए-करम'...

कशमश से 'ना उम्मीदी' की हुए हैं सब तबाह,
देख मत अमाल हमारे 'ईलाही' कर लुत्फ-ओ-करम के निगाह...

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Mohammad Shiblee 15 APR AT 9:46

फ़ितनागरों का राज है हर 'क़ल्ब-ए-रूहानी' पे सब तलक,
हालात सुधरने में अभी वक़्त लगेगा...

बस 'क़ैद-ए-क़फ़स' ज़ीस्त है इंसाँ की अभी तक,
ज़िंदानों से निकलने में अभी वक़्त लगेगा...

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Mohammad Shiblee 5 APR AT 18:06

ख़ुद को 'आइने' में चमकता देख ख़ुशफ़हमी में न पड़ जाना,
अधूरे किस्से दिखाने का हुनर हासिल है इसे...

Khud ko 'Aayine' me chamakta dekh khushfehmi me na padd jana,
Adhure qisse dikhane ka hunar haasil hai ise...

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Mohammad Shiblee 4 APR AT 15:57

Bhale hi! Mere Mukhalif ho jaye 'Nizaam-e-Tabayi' sab talak,

Hum Kal bhi apne 'Kirdar' se pehchane gye the or kal bhi apne 'Kirdar' se hi pehchane jayenge...

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