Megha Garg   (© Megha Garg "फ़लक")
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Joined 14 March 2019


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Joined 14 March 2019
15 DEC 2021 AT 18:46










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21 NOV 2021 AT 21:19

जो नकली इश्क़ जताकर मासूम दिल दुखाते हैं,
उनके हिस्से उनके ख़ुद के मेहबूब नहीं आते हैं।।

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21 OCT 2021 AT 13:00











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22 SEP 2021 AT 19:42

'मैं' और 'मैं'
का मिल कर
"हम" हो जाना,
उनपर से मात्राओं
व अनुस्वार
का बोझ
हटाने के साथ
ही दर्शाता है
जीवन की
कठिनाइयों का
सरलता में
विस्तृत हो जाना !

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16 SEP 2021 AT 17:52

एक
हादसा
मेरे साथ भी
हुआ ज़िन्दगी में,
ज़्यादा चोट
नहीं आई
दिल में थोड़ी टूटन
के साथ
तनिक याददाश्त
ऊपर नीचे हुई
और मैं बचपना
भुला बैठी !

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15 SEP 2021 AT 20:00

╔════════════════════════╗
मोहब्बत महज़ रिया-कारी, सबने इक ही सबब से देखा,
जिसने भी निग़ाह की मेरी तरफ़ सिर्फ़ मतलब से देखा।।
╚════════════════════════╝

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13 SEP 2021 AT 14:58

बन्धन की
चारदीवारी में
प्रेम कभी
फल-फूल
नहीं सकता,
प्रेम के
पूर्ण विकास हेतु
स्वतंत्रता का
खुला आकाश
नितान्त
आवश्यक है।

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5 SEP 2021 AT 12:35

बाख़ुदा कुछ और ही नज़ारा होता,
दिल ग़र पत्थर का हमारा होता।।

डूबती ही नहीं अफ़्कार में आँखें,
बेवफ़ाओं से दिल ना हारा होता।।

बेपरवाही को देते तवज़्ज़ो हम भी,
दरिया ना आँखों में उतारा होता।।

गैरों की बे-नियाज़ियाँ होती बेअसर,
ज़रा ग़ौर से ख़ुद को निहारा होता।।

पीना नहीं पड़ता आब - ए - अश्क़,
लबों को मुस्कुराना ग़वारा होता।।

ग़ैरों का मोहताज़ नहीं "फ़लक",
ख़ुद ही ख़ुद का सहारा होता।।

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8 MAY 2021 AT 9:32

कर के ज़ुस्तज़ू-ए-इश्क़ दिल ने मिरे क़माल कर दिया,
पी ने मिरी हयात का हर इक मौसम बर्शगाल कर दिया।।

ख़स्तगी लबरेज़ रुख़ से हटा कर साया-ए-तारीकियाँ,
बे-सम्तियों से खुश्क चहरे पे नूर-ओ-ज़माल कर दिया।।

मिरी चश्म-ए-तर को तल्ख़ी-ए-दौराँ से रूबरू करा के,
शख़्सियत निखारी मिरी ओ मुझे बे-मिसाल कर दिया।।

खल्वतों की आदि मुझ शिकस्ता-दिल का हमसफ़र बन,
ख़ुशनुमा मिरी ज़िन्दगी का माह-ओ-साल कर दिया।।

बेवफ़ाई के आलम में मो'तबर बनके इक नादाँ दिल का,
तब्बसुम से भर मिरी उदासियों का इंतिक़ाल कर दिया।।

अश्क़ों की तलबगार मिरी आँखों में सपने नए भर के,
दर्द-ओ-ग़म का मिरे नज़दीक आना मुहाल कर दिया।।

और कितना कहे अर्ज़-ए-हाल अपना ज़माने से "फ़लक",
मेहबूब के इश्क़ ने मुझ काफ़िर को निहाल कर दिया।।

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9 APR 2021 AT 16:13

:-)
ख़ुशियों में मुस्कुराने को हमें हुज़ूम-ए-हज़ार मिला ,
ग़म की बारी आई तो नदारद हर इक यार मिला ।।

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