Manish Anand   (Yogi)
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Joined 25 February 2018


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Manish Anand YESTERDAY AT 17:35

हज़रात! हज़रात! हज़रात!
सभी मुल्क वासी ध्यान दें...

चुनाव निकट है, समस्या विकट है।
लोग आएंगे,आपको बहकाऐंगे,
कुछ खरीदेंगे, कुछ बहलाएंगे-फुसलाएंगे।
ज़नाब! आप डटे रहना,
धर्म की तरह, शोहार्द पर भी अड़े रहना।
देखना, ध्यान ना भटक जाऐ,
ज़रा सी ऊँच-नीच पर भीड़ ना भड़क जाऐ।

दंगे यूँ ही तो नहीं भड़कते,
खाली आसमान से बारूद यूँ ही तो नहीं बरसते।
किसीका तो होता होगा इस नुकसान से फ़ायदा,
वरना जान तो दोनों तरफ जाती है,
साज़िश ना होती तो आम लोग आपस में ना लड़ मरते।

कानपूर में क्या हुआ, किसने देखा?
लखनव वालों को उस मसले से क्या?
जो हुआ चलो बुरा हुआ, पर किसने किया?
अब तुम कहोगे उसका नाम और वो कहेंगे तुमने किया।

मशला हुआ तो शांति की बात क्यों नहीं निकली?
पता तो करिये ये "दंगे" की बात कैसे निकली?
देखिये तो ज़रा रुक कर, क्या नुकसान हुआ?
ये सब होने के बाद, फायदे की बात किसकी निकली?

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Manish Anand 20 MAR AT 22:29

इन बाज़ारू रंगों में ना रंग मोहे, रंग दे अपनी यारी में
पानी सा है यार तेरा, घुल जाएगा तेरी ख़ुमारी में।

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Manish Anand 19 MAR AT 23:18

There is a piece of you
on my little finger
and yet I crave for you.
I wonder if I'll ever
be satisfied, even if I'll
get hold enough of you.

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Manish Anand 19 MAR AT 15:31


हवा ने अपने गुमान में चराग़ ना जलने दिया,
धुआँ ख़ूब लड़ा, हर क़तरा अपना हवा में बिखेर दिया।

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Manish Anand 18 MAR AT 18:35

Within no time we became
ultimate partners in crime.
I would romance with her
in best of my mood and worst.
Her wet hairs were irresistible,
they gave wings to my fantasies
and for those moments
I could have ignored the world.
We left our love mark everywhere.
Be it when I tucked her
against those walls or pressed her
against the study table,
she moaned blissfully in colours.

(Read full piece in caption)

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Manish Anand 18 MAR AT 12:10

Of every toxic
addiction killing her,
"reading" revives her
like a nectar.

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Manish Anand 16 MAR AT 22:58

रात के 11 बजे हमने खाना खाया और मैं "नाईट वॉक" के नाम पर छत पर चला गया। छत पर एक खूबसूरत लड़की पहले से टहल रही थी, जिसके खुले बाल मानो मुझे ही बांधने को मचल रहे थे। अब चूंकि ताला अभी-अभी मैंने बाहर से खोला था, तो ये सोच कर अटपटा लगा की "वो यहाँ कैसे पहुंची?" और इस से पहले उसे कभी देखा भी नहीं था।

खैर, मैं उसकी तरफ बढ़ा तो वो मुझे देख मुस्कुराई। (मुस्कान ऐसी की जान ले ले।) अभी भी यक़ीन नहीं हो रहा था अपनी आँखों पर। मग़र दिल ने अपना काम कर दिया था, हमेशा की तरह बिना पूछे ही मचल गया था। मैंने भी मुस्कुरा दिया और हम दोनों के क़दम ठहर गऐ।

"तुम्हारी आँखे बहुत खुबशुरत हैं।", मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा।

(Continue reading in caption)

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Manish Anand 16 MAR AT 10:24

Friend: Bro! I want you to meet my dad. 😑
Me: Now what am I? Your girlfriend? 😂
Friend: Yaar! the other day he was saying, I'm the worst child. 😣
Me: I bet he said that. 😂
Friend: Not so funny bro, I'm hurt. 😥
Me: So now you want me to advocate for you? 😅
Friend: No bro! I want to prove him wrong. 😂
Me: 😒

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Manish Anand 15 MAR AT 16:00

मेरे कमरे की दीवारें अब बगावती हो गई हैं,
मुझसा बेरंग हो अब मुझे ही चिढ़ाने लगी हैं।

मैं खोया था दूसरे दिन "किन्हीं" ख्यालों में,
टकटकी लगाए इनके "पार" ताक रहा था,
कहने लगीं, "तुम यहाँ होकर भी नहीं होतेे"।

मुझसे रहा ना गया, मैंने झल्ला कर कहा,
"तुम्हारे बीच रहता हूँ, ये काफ़ी नहीं क्या?
तुम भी नहीं समझते, मैं अकेला ही भला!"

मैं उठा ही था, की जोरों से बिलखने लगीं,
एक ने पूछा, "कहो ना, कुछ हुआ है क्या?"
दूसरे ने कहा, "हम तुम्हारे दुश्मन तो नहीं।"
तीसरा तो बस "मौन" ही खड़ा देखता रहा,
चौथा चींखा, "बस! अब और नाटक नहीं"।

मैं रुका और देखा, दो दीवार बुढ्ढे हो चले थे,
और बाकी दो मुझसे "उम्मीद" लिये खड़े थे।

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