Madhusudan Singh   (madhureo.com)
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Joined 25 May 2017


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Madhusudan Singh YESTERDAY AT 7:04

नजरो के सामने दुश्मन,
लहुलुहान बदन,
लड़े तबतक
जबतक
तन में
साँसें
धन्य है वो कोख
जिसने जन्म दिया उस लाल को
जो सदैव,नित्य प्रतिपल,
मौत से टकराते,
किसी के पति
किसी के पिता,
किसी के पुत्र
वे भी
दिल में अपनों की यादें लिए
मातृभूमि के रक्षार्थ
मारते मारते
मर जाते
यूँ ही शहीद
नही कहलाते।

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Madhusudan Singh 3 AUG AT 13:09

चन्द्रगुप्त को चाणक्य और
सभी चाणक्य को चन्द्रगुप्त नही मिलते,
धनवान बहुत हैं जमाने में
थोड़ा कम या ज्यादा
प्रभु कृष्ण के जैसे
मगर
सभी को सुदामा नही मिलते।

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Madhusudan Singh 2 AUG AT 17:00

कितना फर्क पड़ जाता है,
पापा के होने और नही होने से,
हैं, तो बिंदास हम,
नही होने से
शोकाकुल परिवार
सिर पर जिम्मेवारियों का बोझ बढ़ जाता है,
और संग में मौन हो जाती हैं
माँ के हाथों की चूड़ियाँ
सदा के लिए,
जिसकी खनक
अक्सर सुनाई पड़ती
झाड़ू लगाते,रोटियाँ सकते
तथा सिर सहलाते हुए,पापा के होने से,
और पापा के नही होने पर भी
पुत्र के हँसने पर
माँ
जरूर मुस्कुराती होगी,
मगर पुत्र को उस मुस्कुराहट में अंतर
जरूर नजर आती होगी।


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Madhusudan Singh 1 AUG AT 18:44

खुद से जब युद्ध होगी
हार में भी जीत होगी,
बह जाएंगे सारे गम,
जैसे बहते तृण,
शाख तथा जीर्ण दीवारें
जलजले संग,
छटेगा तिमिर
टूटेगा हर व्यूह,
होगी सुबहां
अन्तर्मन विशुद्ध होगी,
खुद से जब युद्ध होगी,खुद से जब युद्ध होगी।

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Madhusudan Singh 31 JUL AT 22:31

सहलाऊँ तो पसर जाता है,
गोद में मेरे सिमट जाता है,
कहने को इंसान तुम
भावनाएं सब समझता है गन्नू मन्नू,
पशु होकर भी प्रेम करता है गन्नू-मन्नू।
कोमल हैं पग मगर
वक्त के साथ लात मारते हो तुम,
सिंग नही तेरे मगर,
जख्म गहरे दे जाते हो तुम,
खुर हैं शख्त संग सिंग भी नुकीले मगर,
कभी भी जख्मी नही करता है गन्नू मन्नू,
पशु होकर भी प्रेम करता है गन्नू-मन्नू।
गन्नू-मन्नू कौन,तुम हैरान मत होना,
बछड़ा है गाय का,परेशान मत होना,
पशुता का मतलब क्या,तुमने समझाए,
एक रंग तेरे कई रंग तुम दिखाए मगर,
रंग कई फिर भी ना बदलता रंग गन्नू मन्नू,
पशु होकर भी प्रेम करता है गन्नू-मन्नू।
पशु होकर भी प्रेम करता है गन्नू-मन्नू।

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Madhusudan Singh 31 JUL AT 19:45

तेरा दीदार मात्र
मिलन की आस काफी,
जिंदगी बिताने को,
तुम मिल जाते तो क्या बात होती,
कितनी मुहब्बत तुमसे
पता जर्रे जर्रे को,
काश
समझ जाते तुम,तो क्या बात होती।
तेरा करीब आना,
मैं कुछ कहूँ और तेरा मुस्कुराना,
उंगलियों का स्पर्श मात्र
बदहवास
खड़ा
वह जगह
फर्श या अर्श,
बेखबर
मानो बच्चे जैसे,
महक उठती गालियाँ,
खिल उठते पुष्प
चप्पे चप्पे,
मन में उठती भावनाएं
जैसे समंदर में उठते निरंतर लहरें,
काश!
तेरा करीब आना,
उंगलियों का स्पर्श,
ख्वाब नही यथार्थ होती,
तो क्या बात होती,
नित्य प्रतिपल का इंतजार,
नजरों का मिल जाना काफी
रूह मिल जाते तो क्या बात होती,
खिल उठते पुष्प जर्रे जर्रे,
तुम मिल जाते तो क्या बात होती।

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Madhusudan Singh 30 JUL AT 19:40

मिलन की ललक,
मैं धरती तूँ फलक,
क्या खिलेंगे पुष्प,
बताओ ना प्रिये
क्या आएगा मधुमास।
थे होठ बुदबुदाए,
नजरें मिली,
वे भी,
सुनकर मुस्काए,
बढ़ते कदम उनके
थम जाने को बेताब जैसे,
उमड़ता इधर भी,
प्रेम का सैलाब जैसे,
जर्रा जर्रा पुष्पित,
उग आए,चंपा,चमेली,पारिजात,
तपते ममरुस्थल जहाँ तृण ना ही गाछ,
सोचा न था ऐसे आएगा मधुमास।
सोचा न था,
ऐसे आएगा मधुमास।


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Madhusudan Singh 29 JUL AT 7:04

अपनी खूबसूरती का इम्तिहान ले रहे हैं,
कातिल हैं
कुछ नही,
सिर्फ जान ले रहे हैं।


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Madhusudan Singh 27 JUL AT 22:35

चिड़ियों द्वारा बच्चों को दाने खिलाना,
बछड़े को छोड़
गाय का
दूर नही जाना,
माँ की ममता,पिता का त्याग,
छल और स्वार्थ से परे,
तेरा सानिध्य जैसे प्रेम का पारावार,
माना प्रेम उन्मुक्त
हर बन्धनों से
कैसे आजाद करूँ खुद को
इन क्रन्दनों से,
बरसती आँखें, चीखते सेज,
अधरें मौन,चेहरा निस्तेज,
आज भी वो अनछुई महक
साँसों से टकराते,
चिहुँक उठते दिन में भी,
तुम्हें भूल नही पाते,
अनगिनत ख्यालात मन में आते,
मगर शब्द बन पन्नो पर सजने से पहले,
आहिस्ता आहिस्ता बिखर जाते,
क्या लिखूँ
कैसे लिखूँ,
तुम्ही बताओ
कितना लिखूँ,
क्या,अब भी तुम में पढ़ने का वही
अरमान है क्या?
कैसे कहूँ,
कभी आकर देखना,
तुम बिन तन में शेष प्राण है क्या?
कभी आकर देखना,
तुम बिन तन में शेष प्राण है क्या?






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Madhusudan Singh 27 JUL AT 22:25

जब खुद की नही
किसी और की फिक्र सताए
समझना प्यार है,
जब काँटो पर चलकर लहूलुहान हो पैर
और लब मुस्कुराए
समझना प्यार है,
जब पास हो कोई
फिर भी ख्वाब
उसी की आए
तो समझना प्यार है,
प्रेम त्याग है
समर्पण है,
प्रेम अपरिभाषित,
अपरिमित,
छल और स्वार्थ से परे,
प्रेम सत्य का दर्पण है,
प्रेम जैसे दिनकर की किरणें,
प्रेम जैसे कल कल बहते झरने,
प्रेम जैसे टिप-टिप बरसते बादल,
क्यों ना हो खेत,अरण्य या धराधर,
प्रेम जैसे स्वच्छंद बहती हवाएँ,
प्रेम माने तुम,
जैसे कोई शिवालय,
प्रेम माने तुम,जैसे कोई शिवालय।



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