M K Yadav   (M K Yadav)
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Joined 27 April 2018


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Joined 27 April 2018
20 DEC 2021 AT 12:41

सूट के ही ठाठबाट,
बाकी सब बाँट-छाँट।
दुनियां दीवानी करें,
प्रेम में भी मार-कांट।

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16 DEC 2021 AT 7:41

अगर जिंदगी हैं दो पल की
ना बीच भवँर में समाना रे।
आज नहीं तो कल मिलेगी
जीत को कहाँ ठिकाना रे।।

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15 DEC 2021 AT 18:31

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15 DEC 2021 AT 6:59

कही हक अपना कोई, बाँटता ही जाएं।
कही अपने ही अपनो को, कह दें पराएँ।
मोहब्बत की घड़त में ये, जगत जड़ा हैं।
फिर धूली भ्रम की क्यूँ, बढ़ती ही जाएं?

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6 DEC 2021 AT 12:13

सूरत हो या सीरत हो आखिर बदल जाती हैं
शब्द में वो ताकत हैं जो ताउम्र ठहर जाती हैं।

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25 NOV 2021 AT 9:00

मेरा विश्वास है कि हम
आस नहीं बिकने देंगे।
यकीन की इस नगरी में
न आसमां मिटने देंगे।

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28 OCT 2021 AT 8:52

शब्द नहीं गढ़ते, शब्दकार गढ़ते हैं।
हथौड़े की चोट से, मोती जड़ते हैं।

यहाँ ईमान कई, भले न बिके हो
पर सस्ते बड़े अधिकार बिकते हैं।

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15 OCT 2021 AT 7:53

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26 AUG 2021 AT 22:07

(आफत में अफगान)

मानवता का नाश देखा
खुल के हुआ विनाश देखा।
आतंक ढ़ंग पे नाच गया
उखड़ा सयुक्त गुबार देखा।

कास आस बच पाई हैं
अफगान तेरी इस रक्षा की।
सदियों जम के लूट लिया
औकात वही है भीक्षा की।

वर्षों तक तेरी कक्षा थी
पर रक्षा कहाँ बच पाई हैं।
सलामत रहा हो सर भले
पर कस के पूंछ खिंचाई हैं।

वे जल सपने बारूद बनें
अफ-जन ने मन में पाले थे।
किसका है अधिकार यहाँ
अधिकार को कौन संभाले थे।





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9 AUG 2021 AT 18:39

(घना गजब)

ले जाय कमाई महँगाई, खर्चा बढ़ता हाय!
जन मिल लाखों काम करें पर, चंद चमकते जाय।

चंदा बढ़कर चाँद बना, लूटे शिक्षा हाय!
सुन दालों के भाव भरे मन, निर्धन कैसे खाय।

पानी तक तैरे पैसों में, तेल हमें तल जाय।
बिजली का जो हाल सुना तो, चकरा के गिरजाय।

आधुनिक हुआ देश मगर लो, छत टपकती हाय!
मुफ्त बहे चाहें रक्त यहाँ, वक्त नहीं मिल पाय।

माँग रहा मजबूर सदा यूँ, कर्जा बढ़ता हाय!
जन लाखों मिल काम करें पर, चंद चमकते जाय।
(सरसी छंद)

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