Lockdown 2.0
D3(मुक्तक) #Poem01
मच्छर! तुम इंसानों से अच्छे हो,
तुम रक्त रूपी अमृत पी लो,
तुम सभ्य कभी नहीं हो पाओगे।
मानव की संधारित छवि को,
चोट डंक से नहीं पहुँचा पाओगे।
तुम मृत्यु के ग्रास में सुसज्जित,
जिरह करते-करते मर जाओगे।
रंजिश छल कपट बैरी दुनिया की,
माया रीत प्रीत समझ ना पाओगे।
तुम तो सिर्फ खून ही पीते हो,
लोग यहाँ विश्वास घात करते हैं,
अधर्म अंधविश्वास की पट्टी बाँधे,
मानवता को शर्मसार करते हैं।
तुम तो एक बार करोगें चूषण,
यहाँ बारम बार करते हैं दूषण।
तुम तो थोड़ा भिनभिना लेते हो,
काटने के पहले सतर्क करते हो।
कुछ लोग यहाँ पर खंजर घोंपे,
देख लगता रक्त की बगिया रोपे।
तुम तो अपना काम करते हो,
सतर्क इंसां तो तुम भी डरते हो।
मच्छर!तुम इंसानों से अच्छे हो।।- ✍️लिकेश ठाकुर
17 APR 2020 AT 18:19